देश में पेपर लीक की समस्या एक बड़ा मुद्दा बन चुकी है। हाल ही में नीट यूजी परीक्षा लाखों अभ्यर्थियों को दोबारा एग्जाम देने की नौबत आई है। वहीं, सीबीएसई के मूल्यांकन और परीक्षा प्रणाली पर भी सवाल उठ चुके हैं।
यह पहली बार नहीं है जब देश में किसी परीक्षा का पेपर लीक हुआ हो। यह कई दशकों पुरानी समस्या है। लेकिन बड़ा सवाल यह है कि ऐसे मामलों में दोषियों को सजा कितनी बार मिल पाती है। इंडियन एक्सप्रेस ने पिछले 20 वर्षों के 45 बड़े पेपर लीक मामलों की पड़ताल की। जांच में सामने आया कि इनमें से केवल दो मामलों में ही दोष साबित हो सके हैं। अधिकांश मामले आज भी अदालतों में लंबित हैं, जबकि कई मामलों में जांच की रफ्तार पूरी तरह धीमी पड़ चुकी है।
हैरानी की बात यह है कि एक पेपर लीक मामले के आरोपी आज उत्तर प्रदेश में विधायक तक बन चुके हैं।
इंडियन एक्सप्रेस ने अपनी पड़ताल के दौरान 2002 से 2025 तक के रिकॉर्ड का विश्लेषण किया। इस दौरान 27 भर्ती परीक्षाएं, 18 उच्च शिक्षा प्रवेश परीक्षाएं और कई बोर्ड परीक्षाएं विवादों में रहीं। पड़ताल में सामने आया कि 2002 से 2025 के बीच पेपर लीक से जुड़े मामलों में 1,658 लोगों को गिरफ्तार किया गया। 925 लोगों के खिलाफ आरोपपत्र दाखिल किए गए। हालांकि, केवल 18 लोगों को दोषी ठहराया जा सका, जबकि 32 लोग बरी हो गए। 43 आरोपी अब भी न्यायिक प्रक्रिया का सामना कर रहे हैं।
इन सभी मामलों में एक बात समान रही कि वरिष्ठ अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई बेहद सीमित रही। गौर करने वाली बात यह है कि इन परीक्षाओं में करीब 3.86 करोड़ उम्मीदवारों ने आवेदन किया था। ये अभ्यर्थी अच्छी नौकरी, प्रतिष्ठित कॉलेज में प्रवेश या बेहतर शैक्षणिक भविष्य की उम्मीद लेकर परीक्षा में बैठे थे। लेकिन पेपर लीक की घटनाओं ने लाखों युवाओं के सपनों और भविष्य को प्रभावित किया।
इंडियन एक्सप्रेस की पड़ताल में यह भी सामने आया कि परीक्षा रद्द होने के बाद दोबारा परीक्षा आयोजित करने में औसतन 183 दिन लग जाते हैं। कई मामलों में अभ्यर्थियों को चार-चार साल तक इंतजार करना पड़ा।
इंडियन एक्सप्रेस द्वारा विश्लेषण किए गए 45 मामलों में से 23 मामले भाजपा शासित राज्यों से जुड़े थे, जबकि 14 मामले कांग्रेस शासित राज्यों के थे। शेष मामले अन्य राज्यों से संबंधित थे। सबसे ज्यादा 11 मामले उत्तर प्रदेश से सामने आए। दूसरे स्थान पर राजस्थान रहा, जहां सात मामले दर्ज हुए, जबकि गुजरात तीन मामलों के साथ तीसरे स्थान पर रहा।
इनमें से अधिकांश मामलों में मुकदमे वर्षों से लंबित हैं। कई आरोपी जमानत पर बाहर हैं, जबकि कुछ मामलों में जांच एजेंसियां क्लोजर रिपोर्ट तक दाखिल कर चुकी हैं।
बदलती तकनीक और बढ़ती चुनौतियां
पेपर लीक मामलों में एक और पैटर्न सामने आया है। समय के साथ अपराधियों ने नई-नई तकनीकों का इस्तेमाल शुरू कर दिया है जिससे जांच एजेंसियों के सामने नई चुनौतियां खड़ी हो गई हैं। शुरुआती दौर में फैक्स के जरिए प्रश्नपत्र भेजे जाते थे। बाद में ब्लूटूथ और डिजिटल संचार तकनीकों का इस्तेमाल शुरू हुआ। अब रिमोट एक्सेस सॉफ्टवेयर और अन्य आधुनिक तकनीकें भी सामने आ चुकी हैं। यहां तक कि कुछ मामलों में प्रिंटिंग प्रक्रिया और वितरण तंत्र को भी प्रभावित करने के आरोप लगे हैं।
जिन दो मामलों में हुई दोषसिद्धि
जिन मामलों में दोषसिद्धि हो सकी, वे दोनों रेलवे भर्ती बोर्ड (RRB) से जुड़े थे। वो दोनों मामले इस प्रकार हैं–
पहला मामला: 2002 रेलवे भर्ती बोर्ड पेपर लीक
18 अगस्त 2002 को आयोजित प्रोबेशनरी असिस्टेंट स्टेशन मास्टर परीक्षा में एक लाख से अधिक उम्मीदवार शामिल होने वाले थे। लेकिन परीक्षा से एक दिन पहले ही पेपर लीक होने की सूचना मिलने पर परीक्षा रद्द कर दी गई। इसके बाद नई परीक्षा एक साल बाद आयोजित की गई।
करीब 23 साल बाद, 21 जुलाई 2025 को अहमदाबाद की विशेष सीबीआई अदालत ने इस मामले में अहम फैसला सुनाया। अदालत ने सात रेलवे अधिकारियों और एक आरपीएफ कांस्टेबल को दोषी ठहराते हुए पांच साल के कठोर कारावास और पांच लाख रुपये के जुर्माने की सजा सुनाई। फिलहाल सभी दोषी जमानत पर हैं और उनकी याचिकाएं गुजरात हाई कोर्ट में लंबित हैं।
दूसरा मामला: 2010 आरआरबी पेपर लीक
यह मामला 2010 में आयोजित असिस्टेंट लोको पायलट और असिस्टेंट स्टेशन मास्टर भर्ती परीक्षा से जुड़ा था। करीब पांच लाख अभ्यर्थियों ने परीक्षा में हिस्सा लिया था। पेपर लीक की पुष्टि होने के बाद परीक्षा रद्द कर दी गई और जुलाई 2011 में दोबारा आयोजित की गई।
इस मामले में तत्कालीन आरआरबी मुंबई अध्यक्ष सत्येंद्र मोहन शर्मा, उनके बेटे और आठ अन्य लोगों को दोषी ठहराया गया। सभी को पांच साल के कठोर कारावास और 7.87 लाख रुपये के जुर्माने की सजा सुनाई गई। हालांकि, बाद में 2 फरवरी 2024 को तेलंगाना हाई कोर्ट ने सत्येंद्र मोहन शर्मा को जमानत दे दी।
हालांकि, इन दो मामलों में दोषसिद्धि हो गई, लेकिन आज भी कई बड़े पेपर लीक मामले ऐसे हैं जिनकी जांच वर्षों बाद भी अधूरी है और मुकदमे अदालतों में लंबित हैं।
CAT 2003 पेपर लीक मामला
23 नवंबर 2003 को CAT परीक्षा आयोजित की गई थी। इसमें 1.25 लाख से अधिक अभ्यर्थियों ने हिस्सा लिया था। लेकिन पेपर लीक होने के कारण परीक्षा रद्द करनी पड़ी और फरवरी 2004 में दोबारा आयोजित की गई।
इस मामले में सीबीआई ने मुख्य आरोपी रंजीत डॉन को गिरफ्तार किया था। इसके अलावा कुमार सुमन सिंह और इंद्रजीत कुमार समेत अन्य नाम भी जांच के दायरे में आए। घटना के बाद शुंगलू समिति का गठन किया गया जिसने परीक्षा प्रणाली की कमियों की जांच की और कई महत्वपूर्ण सुधारों की सिफारिश की।
दूसरा मामला: 2006 रेलवे ग्रुप-डी पेपर लीक
फरवरी 2006 में रेलवे ग्रुप-डी भर्ती परीक्षा आयोजित की गई थी। हालांकि, पेपर लीक होने के कारण जुलाई 2006 में परीक्षा दोबारा करानी पड़ी। इस परीक्षा में करीब 16 लाख उम्मीदवारों ने हिस्सा लिया था।
इंडियन एक्सप्रेस की पड़ताल के मुताबिक, 2012 से 2026 के बीच यह मामला अदालत में 142 बार सूचीबद्ध हुआ, लेकिन मुकदमा कभी गवाहों के बयान से आगे नहीं बढ़ सका।
इस मामले की सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि इसके दो आरोपी आज उत्तर प्रदेश में विधायक हैं। इनमें बेदी राम और विपुल दुबे शामिल हैं। बेदी राम का नाम रेलवे भर्ती पेपर लीक से जुड़े पांच मामलों में सामने आ चुका है। इसके अलावा मध्य प्रदेश लोक सेवा आयोग (MPPSC) और पुलिस भर्ती परीक्षा लीक से जुड़े मामलों में भी उनका नाम सामने आया था।
वहीं, विपुल दुबे वर्तमान में निषाद पार्टी के विधायक हैं। उनके खिलाफ गैंगस्टर एक्ट समेत कई मामले दर्ज बताए जाते हैं।
11 जुलाई 2024 को दोनों आरोपियों के खिलाफ गैर-जमानती वारंट जारी किया गया था। इसके बाद 26 जुलाई 2024 को आरोप तय किए गए। हालांकि, मामला अब भी अदालत में लंबित है और अभी तक कोई अंतिम फैसला नहीं आया है।
इस मामले पर बेदी राम ने कहा था कि उनके खिलाफ दर्ज सभी मामले पुराने और झूठे हैं। वहीं, विपुल दुबे का कहना था कि उनके खिलाफ फर्जी मुकदमा चलाया जा रहा है।
तीसरा मामला: 2015 यूपीपीसीएस प्रीलिम्स पेपर लीक
29 मार्च 2015 को यूपीपीसीएस प्रारंभिक परीक्षा आयोजित की गई थी। इसमें करीब 2.5 लाख अभ्यर्थियों ने हिस्सा लिया था। लेकिन पेपर लीक की वजह से परीक्षा दो महीने बाद दोबारा करानी पड़ी।
जांच में सामने आया कि तीन आरोपियों ने समय से पहले ही सीलबंद प्रश्नपत्र खोल दिया था। यह घटना लखनऊ के एक परीक्षा केंद्र में हुई थी। आरोप था कि परीक्षा शुरू होने से करीब एक घंटे पहले प्रश्नपत्र खोला गया और उसकी तस्वीरें भी ली गईं।
यह मामला राजनीतिक रूप से भी काफी चर्चित रहा क्योंकि उस समय उत्तर प्रदेश में अखिलेश यादव की सरकार थी। विपक्ष ने भर्ती प्रक्रिया में अनियमितताओं के आरोप लगाए थे।
बाद में इलाहाबाद हाई कोर्ट ने उत्तर प्रदेश लोक सेवा आयोग (UPPSC) के तत्कालीन अध्यक्ष अनिल यादव की नियुक्ति को रद्द कर दिया था। मामले की जांच सीबीआई को सौंप दी गई थी। हालांकि, एक दशक से अधिक समय बीत जाने के बावजूद जांच अभी तक किसी निर्णायक नतीजे तक नहीं पहुंच सकी है।
चौथा मामला: 2016 समीक्षा अधिकारी/सहायक समीक्षा अधिकारी परीक्षा
समीक्षा अधिकारी (RO) और सहायक समीक्षा अधिकारी (ARO) परीक्षा 27 नवंबर 2016 को आयोजित की गई थी। लेकिन पेपर लीक होने के बाद 20 सितंबर 2020 को दोबारा परीक्षा करानी पड़ी। यानी अभ्यर्थियों को करीब चार साल तक इंतजार करना पड़ा।
बताया जाता है कि पेपर लीक की शुरुआत लखनऊ के एक परीक्षा केंद्र से हुई थी। सीबी-सीआईडी ने सितंबर 2018 में अपनी क्लोजर रिपोर्ट दाखिल की थी, लेकिन जनवरी 2020 में विशेष न्यायिक मजिस्ट्रेट ने उसे खारिज कर दिया और दोबारा जांच के आदेश दिए।
इसके बाद जांच एजेंसी ने फिर क्लोजर रिपोर्ट दाखिल की, लेकिन मामला अब भी अदालत में लंबित है और अंतिम निष्कर्ष सामने नहीं आया है।
2017 हिमाचल प्रदेश बोर्ड पेपर लीक
इस मामले में एक स्कूल प्रिंसिपल और कुछ अन्य अधिकारियों पर पेपर लीक कराने के आरोप लगे थे। एफआईआर भी दर्ज की गई थी। हालांकि, कुछ महीनों बाद पुलिस ने जांच के बाद क्लोजर रिपोर्ट दाखिल कर दी और मामला बंद कर दिया गया।
NEET-UG 2024 पेपर लीक
NEET-UG 2024 परीक्षा 5 मई 2024 को आयोजित की गई थी। इसमें 23.33 लाख अभ्यर्थियों ने हिस्सा लिया था।
पेपर लीक विवाद सामने आने के बाद मामले की जांच शुरू हुई। आरोप था कि प्रश्नपत्र पटना और झारखंड के हजारीबाग से लीक हुआ था। 2024 के अंत तक 46 लोगों के खिलाफ आरोपपत्र दाखिल किए जा चुके थे। फिलहाल यह मामला पटना की विशेष सीबीआई अदालत में लंबित है और सुनवाई जारी है।
राजस्थान वरिष्ठ अध्यापक भर्ती परीक्षा पेपर लीक (2021)
राजस्थान की वरिष्ठ अध्यापक भर्ती परीक्षा पेपर लीक मामले में अदालत की टिप्पणियां काफी महत्वपूर्ण मानी गईं। 28 अगस्त 2025 को सुनवाई के दौरान जस्टिस समीर जैन ने कहा था कि राजस्थान लोक सेवा आयोग (RPSC) में बड़े स्तर पर भ्रष्टाचार मौजूद था और आयोग के भीतर के कई लोग इस पूरे प्रकरण में शामिल थे।
अदालत ने टिप्पणी की थी कि केवल बाहरी लोग ही नहीं, बल्कि आयोग के सदस्य भी कथित भ्रष्टाचार में शामिल पाए गए। मामले में बाद में आरपीएससी सदस्य रामू राम राइका को गिरफ्तार किया गया था। हालांकि, वह फिलहाल जमानत पर हैं। इसके अलावा आयोग की दो अन्य सदस्य मंजू शर्मा और संगीता आर्या ने अपने पदों से इस्तीफा दे दिया था।
पेपर लीक और अपराधियों के नए तरीके
इंडियन एक्सप्रेस की पड़ताल में सामने आया है कि पेपर लीक मामलों में इस्तेमाल की जाने वाली कानूनी धाराएं भी कई बार आरोपियों को राहत दिलाने का कारण बन जाती हैं। ज्यादातर मामलों में आईपीसी की धारा 420, 467, 468 और 120बी के तहत केस दर्ज किए जाते हैं। इन्हें सामान्य आपराधिक धाराएं माना जाता है जिसके चलते आरोपियों को अपेक्षाकृत आसानी से जमानत मिल जाती है।
एक केंद्रीय जांच एजेंसी से जुड़े अधिकारी ने बताया कि केवल कुछ राज्यों में ही ऐसे मामलों में मनी लॉन्ड्रिंग कानूनों का इस्तेमाल किया गया है। उत्तर प्रदेश में भी कुछ मामलों में गैंगस्टर एक्ट लगाया गया था।
कर्नाटक पीयूसी केमिस्ट्री पेपर लीक (2016) मामले में भी जांच से जुड़ी गंभीर कमियां सामने आई थीं। इस मामले में 19 लोगों को गिरफ्तार किया गया था और कुछ वरिष्ठ अधिकारियों को कथित मास्टरमाइंड माना गया था। हालांकि, मई 2024 में अदालत ने सभी आरोपियों को बरी कर दिया। अदालत ने अपने फैसले में जांच की कई खामियों की ओर इशारा किया था।
बदलती तकनीक, बदलते तरीके
पेपर लीक के तरीकों में भी समय के साथ बड़ा बदलाव आया है। इंडियन एक्सप्रेस से बातचीत में एक अधिकारी ने बताया कि 2000 के दशक की शुरुआत में पेपर लीक अपेक्षाकृत सीधे तरीकों से किया जाता था। 2002 के रेलवे भर्ती बोर्ड (RRB) पेपर लीक मामले में रेलवे के कुछ अधिकारियों पर अपने पद का दुरुपयोग कर प्रश्नपत्र लीक कराने के आरोप लगे थे। उस दौर में फैक्स जैसी तकनीकों का इस्तेमाल किया जाता था।
वहीं, 2013 में दिल्ली, हरियाणा और उत्तर प्रदेश में सामने आए एसएससी परीक्षा लीक मामलों में अपराधियों ने डिजिटल तकनीक का सहारा लिया। स्कैन किए गए प्रश्नपत्रों को मैसेजिंग एप के जरिए एक स्थान से दूसरे स्थान तक भेजा गया। इसके अलावा ब्लूटूथ डिवाइस के माध्यम से परीक्षार्थियों तक उत्तर पहुंचाने की भी कोशिश की गई।
इसी तरह, 2024 में उत्तर प्रदेश पुलिस कांस्टेबल भर्ती परीक्षा पेपर लीक मामले में एक संगठित नेटवर्क के इस्तेमाल के आरोप सामने आए। जांच में पता चला कि प्रश्नपत्रों के परिवहन में इस्तेमाल किए जा रहे सीलबंद बॉक्सों के साथ छेड़छाड़ की गई थी। टीसीआई ट्रांसपोर्ट कंपनी ने इस खेल को अंजाम दिया था। आरोप है कि बॉक्सों को इस तरह खोला गया कि ऊपर लगी सील सामान्य दिखाई देती रही और किसी को संदेह नहीं हुआ।
अब हालात यह हैं कि कुछ मामलों में आरोपी टीम व्यूअर जैसे सॉफ्टवेयर का इस्तेमाल कर रहे हैं। इन तकनीकों की मदद से बाहर बैठे लोग अभ्यर्थियों के कंप्यूटर को दूर से नियंत्रित कर सकते हैं और परीक्षा प्रक्रिया को प्रभावित कर सकते हैं।
परीक्षा केंद्रों के भीतर से भी हुई गड़बड़ियां
इंडियन एक्सप्रेस की पड़ताल में यह भी सामने आया कि कई मामलों में पेपर लीक की शुरुआत परीक्षा केंद्रों के भीतर से हुई। यानी समस्या केवल बाहरी नेटवर्क तक सीमित नहीं है बल्कि कई बार अंदरूनी स्तर पर भी मिलीभगत देखने को मिली है। 2015 की यूपीपीसीएस परीक्षा इसका प्रमुख उदाहरण मानी जाती है। आरोप था कि परीक्षा शुरू होने से करीब एक घंटे पहले ही प्रश्नपत्र की तस्वीर खींच ली गई थी।
इसी तरह, 2022 की बिहार पीएससी प्रारंभिक परीक्षा में भी गंभीर अनियमितताओं के आरोप लगे। जांच में सामने आया कि कुछ अभ्यर्थियों को कथित तौर पर अलग कमरों में बैठाकर लीक हुए प्रश्नपत्र हल करवाए गए थे।
एक वरिष्ठ अधिकारी ने इंडियन एक्सप्रेस से बातचीत में कहा कि प्रिंटिंग प्रेस और प्रश्नपत्रों की ढुलाई की प्रक्रिया वर्तमान परीक्षा व्यवस्था की सबसे कमजोर कड़ियों में से एक बन चुकी है। उनका मानना है कि जब तक इन चरणों को पूरी तरह सुरक्षित नहीं बनाया जाएगा तब तक पेपर लीक जैसी घटनाओं पर पूरी तरह रोक लगाना मुश्किल होगा।
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