नोएडा में हुए मजदूर विरोध प्रदर्शनों के मामले में गिरफ्तार किए गए करीब हर 10 में से 8 लोगों को जमानत मिल चुकी है। हालांकि, जिन लोगों को जमानत नहीं मिली है, उन सभी के खिलाफ एक समान आरोप लगाया गया है। यानी प्रदर्शन के पीछे कथित साजिश में उनकी भूमिका।
पुलिस ने इसके सबूत के तौर पर पढ़ी गई किताबों, व्हाट्सअप पर भेजे गए संदेशों और गाजा तथा एनआरसी के विरोध प्रदर्शनों में भागीदारी का भी हवाला दिया है। एक मामले में पुलिस ने ‘आंदोलनजीवी’ शब्द का भी इस्तेमाल किया।
जिन लोगों की जमानत अर्ज़ी खारिज कर दी गई, उनमें एक्टिविस्ट, एक पूर्व पत्रकार और दिल्ली यूनिवर्सिटी के एक ग्रेजुएट शामिल हैं। इनमें से बाद के दो लोगों को कड़े ‘नेशनल सिक्योरिटी एक्ट‘ (NSA) के तहत हिरासत में लिया गया है, जिसके तहत बिना मुकदमे के एक साल तक हिरासत में रखा जा सकता है।
13 मई को, प्रदर्शनों के हिंसक होने के करीब एक महीने बाद, उत्तर प्रदेश सरकार ने लखनऊ के 60 वर्षीय पूर्व पत्रकार सत्यम वर्मा और पश्चिम बंगाल के दुर्गापुर की 25 वर्षीय दिल्ली विश्वविद्यालय स्नातक आकृति चौधरी के खिलाफ एनएसए लगाया।
पुलिस का आरोप है कि वर्मा ने प्रदर्शनों की पूरी साजिश रची। पुलिस ने इसकी वजह बताते हुए कहा कि वह आरडब्ल्यूपीआई (Revolutionary Workers Party of India) के सदस्य थे, उन्होंने “नई पीढ़ी को विद्रोही संगठन में कैडर के रूप में शामिल होने के लिए उकसाने वाला छद्म लेखन” किया और वह “मजदूर बिगुल अखबार के प्रकाशक और लेखक” थे।
एनएसए लगाते समय उत्तर प्रदेश सरकार ने नोएडा फेज-2 थाने के प्रभारी की रिपोर्ट का हवाला देते हुए कहा कि इस “संस्था और प्रकाशन” को “नोएडा में हुए दंगे के पीछे मुख्य साजिशकर्ता” के रूप में निर्णायक रूप से पाया गया है।
पुलिस की रिपोर्ट में आरोप लगाया गया, “आप जैसे अतिसक्रिय लोगों की अतार्किक, जिद्दी, हिंसक और घृणित विचारधारा के कारण ही ऐसी परिस्थितियां पैदा होती हैं और सार्वजनिक अशांति फैलती है। ऐसे आंदोलनजीवी लोग ही इन परिस्थितियों के निर्णायक योजनाकार हैं।”
वर्मा के वकील ने सत्र अदालत में दलील दी, “आवेदक का कोई आपराधिक इतिहास नहीं है। 60 साल के अपने लंबे और प्रतिष्ठित जीवन में, जो सार्वजनिक सेवा के लिए समर्पित रहा है, उन पर कभी किसी आपराधिक अपराध का आरोप नहीं लगा… लगातार हिरासत में रहने से आवेदक के स्वास्थ्य और प्रतिष्ठा को गंभीर और अपूरणीय नुकसान हो रहा है।”
वहीं, अदालत के रिकॉर्ड के अनुसार, चौधरी पर “ऐसी खास विचारधारा के समर्थकों” में शामिल होने का आरोप लगाया गया, जो अपने उद्देश्यों को हिंसक तरीकों से हासिल करने में विश्वास रखते हैं।
उत्तर प्रदेश सरकार ने एनएसए लगाने के दौरान आरोप लगाया कि वह दिल्ली के करावल नगर में एक सह-आरोपी द्वारा चलाए जा रहे “पुस्तकालय” में शामिल हुई थीं और उन्होंने “प्रस्तावित हिंसक आंदोलन के लिए रणनीति तैयार की थी।”
सरकार ने “Great Martyrs of the Indian Revolution” नामक एक किताब बरामद होने का भी दावा किया और इसे “विवादित साहित्यिक कृति” बताया।
सरकार ने चौधरी पर आरडब्ल्यूपीआई की सदस्य होने का आरोप लगाया और कहा कि यह संगठन “कई सीएए-एनआरसी विरोध प्रदर्शन स्थलों” पर मौजूद रहा है और “गाजा विरोध प्रदर्शनों” में भी इसकी भूमिका रही है।
सरकार ने कहा, “आरडब्ल्यूपीआई एक ऐसे प्रदर्शन फ्रेंचाइजी के रूप में काम करता है, जो समय और परिस्थिति के अनुसार किसी भी मानवीय या मजदूर मुद्दे को अपना आधार बना लेता है – चाहे वह नोएडा में मजदूरों का पगार हो, या फिर दिल्ली में वायु प्रदूषण, मुंबई में एलपीजी की कीमतें और गाजा में फिलिस्तीनी नागरिक हो।”
चौधरी के वकील ने सत्र अदालत में कहा, “आरोपी एक मेधावी छात्रा हैं। उन्होंने 10वीं कक्षा में 95 प्रतिशत और 12वीं कक्षा में 97 प्रतिशत अंक हासिल किए हैं। आधुनिक इतिहास में एमए करने के बाद उन्होंने यूजीसी नेट परीक्षा पास की और फिलहाल शोध की तैयारी कर रही हैं… आरोपी गरीब और असहाय लोगों के उत्थान के लिए सामाजिक कार्यकर्ता के रूप में काम करती हैं और झुग्गी-बस्तियों में रहने वाले छोटे बच्चों और निरक्षर लोगों को मुफ्त शिक्षा देती हैं… आरोपी के खिलाफ कोई सबूत नहीं है और उनका कोई पिछला आपराधिक रिकॉर्ड भी नहीं है।”
वर्मा की एनएसए के तहत हिरासत को चुनौती देने वाली याचिका सुप्रीम कोर्ट में लंबित है, जबकि चौधरी की याचिका इलाहाबाद हाई कोर्ट में लंबित है।
अदालतों ने क्या पाया
जमानत से वंचित किए गए और अभी भी जेल में बंद पांच अन्य आरोपी कार्यकर्ता आदित्य आनंद, मनीषा चौहान, रूपेश रॉय, सृष्टि गुप्ता और हिमांशु ठाकुर हैं। निचली अदालतों ने ऐसे प्रथम दृष्टया सबूतों का हवाला दिया, जिनसे प्रदर्शन से जुड़ी साजिश, लोगों को उकसाने या प्रदर्शनकारियों को जुटाने में उनकी “सक्रिय भूमिका” दिखाई देने का दावा किया गया।
‘व्हाट्सअप ग्रुप’
आरोप है कि आनंद ने प्राइवेट कंपनियों के कर्मचारियों को हिंसक विरोध-प्रदर्शन के लिए उकसाया और अपने घर पर सह-आरोपियों के साथ मिलकर साजिश रची।
बचाव पक्ष ने कहा कि आरोपी “एक इंजीनियर” हैं और उनका “कोई आपराधिक इतिहास नहीं” है। बचाव पक्ष ने सक्रिय भूमिका से जुड़े किसी भी सबूत से इनकार किया।
अदालत ने “प्राप्त आंकड़ों” का हवाला देते हुए कहा कि आरोपी उन लोगों में शामिल थे, जिन्हें एक व्हाट्सअप ग्रुप का “एडमिन” पाया गया। आरोप है कि यह समूह हिंसा को अंजाम देने में मदद करने के उद्देश्य से बनाया गया था।
‘सक्रिय भागीदारी’
आरोप है कि चौहान मुख्य साजिशकर्ताओं में शामिल थीं और उन्होंने प्रदर्शन के लिए अन्य लोगों को नोएडा बुलाया। वहीं, रॉय पर मजदूरों को जुटाने और उन्हें उकसाने के लिए व्हाट्सअप ग्रुप्स चलाने का आरोप लगाया गया।
बचाव पक्ष ने कहा कि “शांतिपूर्ण प्रदर्शन संवैधानिक रूप से संरक्षित अधिकार है” और केवल किसी प्रदर्शन में शामिल होना अपने आप में आपराधिक साजिश नहीं माना जा सकता। अदालत ने फैसला दिया कि “आरोपी की सक्रिय भागीदारी… रिकॉर्ड पर मौजूद सामग्री से प्रथम दृष्टया दिखाई देती है।”
‘सह-आरोपियों के बयान’
आरोप है कि गुप्ता उस भीड़ का हिस्सा थीं, जिसने पुलिस पर लाठियों और पत्थरों से हमला किया, वाहनों में आग लगाई, फैक्ट्रियों में तोड़फोड़ की और सड़कों को जाम किया। अभियोजन पक्ष ने उन्हें पहले से बनाई गई साजिश के तहत लोगों को उकसाने वाली बताया।
बचाव पक्ष ने कहा कि उनका “कोई पिछला आपराधिक इतिहास नहीं” है और सोशल मीडिया पर एक पोस्ट के कारण उन्हें झूठे मामले में फंसाया गया है। इसके बावजूद, निचली अदालत ने जमानत देने से इनकार करते हुए सह-आरोपियों के बयानों का हवाला दिया।
‘मामले की गंभीरता’
आरोप है कि ठाकुर लाठियों, डंडों, ईंटों और पत्थरों के साथ एक इलेक्ट्रॉनिक्स कंपनी में घुसे। वहां उन्होंने नारे लगाए और जान से मारने की धमकी दी। बचाव पक्ष ने कहा कि इस मामले में न तो कोई प्रत्यक्षदर्शी है, न CCTV फुटेज और न ही कोई बरामदगी हुई है। अदालत ने कहा कि “जिन लोगों का संबंधित कंपनियों के साथ कोई प्रत्यक्ष रोजगार संबंध नहीं है, उनकी स्थिति अलग होती है।” अदालत ने आरोपी की बताई गई “विशिष्ट और सक्रिय भूमिका” तथा “मामले की गंभीरता” का हवाला देते हुए जमानत देने से इनकार कर दिया।
यह भी पढ़ें: Express Investigation: ‘अगर पुलिस मेरे बेटे को दोबारा उठा ले तो क्या होगा?’, कर्ज और डर से जूझ रहे हैं नोएडा के प्रदर्शन में शामिल मजदूर
नोएडा में फैक्ट्री कर्मचारियों ने इस साल अप्रैल के महीने में विरोध प्रदर्शन किया था। पुलिस प्रदर्शन में शामिल लोगों की तलाश कर रही थी। इसमें से दो लोगों को पुलिस ने उनके घर के पास से पकड़ा, एक को काम की तलाश करते समय और एक को पूरी सब्जी लेने के लिए घर से बाहर निकलते समय। लेकिन जमानत, कोर्ट के चक्कर और जेल में मुलाकातों के लिए परिवारों द्वारा लिए गए कर्ज को चुकाने के लिए संघर्ष कर रहे हैं। कुछ तो घर से बाहर निकलने से भी डरते हैं। पूरी खबर पढ़ने के लिए यहां पर करें क्लिक
