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दावा: 40 साल पुराने हथियार की बदौलत सीमा पर डटे हैं जवान, 2008 से कार्बाइन खरीद की हर कोशिश फेल! मोदी सरकार में भी लटकी 824 करोड़ की खरीद

वर्तमान में पूर्वी लद्दाख में चीन के साथ तनाव के बीच , रक्षा मंत्रालय सैन्य साजोसमान की खरीद की प्रक्रिया को तेज कर दिया है। इसमें संयुक्त अरब अमीरात से 11 करोड़ डॉलर के काराकल 93,895 5.56x45mm कार्बाइन का ऑर्डर शामिल है।

Indian Army, Defense Newsकार्बाइन को पैदल सेना का एक बुनियादी हथियार माना जाता है। रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि भारती सेना 2008 से कार्बाइन खरीदने की कोशिश कर रही है लेकिन अभी तक यह संभव नहीं हो पाई है।

भारतीय जवान सीमा पर 40 साल पुराने हथियार की बदौलत सीमा पर डटे हैं। पिछले 12 साल से कार्बाइन खरीद की हर कोशिश अब तक फेल हुई है। न्यूज वेबसाइट द वायर की रिपोर्ट में यह दावे किए गए हैं। रिपोर्ट के अनुसार 1980 के दशक के मध्य से, भारतीय सेना बिना किसी कार्बाइन के काउंटर-इंसर्जेंसी ऑपरेशंस पर लगातार तैनात है। कार्बाइन को पैदल सेना का एक बुनियादी हथियार माना जाता है। रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि भारती सेना 2008 से कार्बाइन खरीदने की कोशिश कर रही है लेकिन अभी तक यह संभव नहीं हो पाई है। मौजूदा समय में सीक्यूबी कार्बाइन की 4.50 लाख यूनिट की जरूरत है।

वर्तमान में पूर्वी लद्दाख में चीन के साथ तनाव के बीच , रक्षा मंत्रालय सैन्य साजोसमान की खरीद की प्रक्रिया को तेज कर दिया है। इसमें संयुक्त अरब अमीरात से 11 करोड़ डॉलर के काराकल  93,895 5.56x45mm कार्बाइन का ऑर्डर शामिल है। रक्षा मंत्रालय ने डिफेंस प्रोक्योरमेंट प्रोसीजर -2016 के अनुसार, कार्बाइन कॉन्ट्रैक्ट पर हस्ताक्षर के बाद 17 महीने के भीतर या अगस्त 2019 तक, हथियारों की डिलीवरी की जानी थी।

लेकिन एक साल बीतने के बावजूद अभी तक कार्बाइन, जिसकी बहुत जरूरत है, के करार की पुष्टि या खत्म करने संबंधी निर्णय रक्षा मंत्रालय और साउथ ब्लॉक स्थित आर्मी हेडक्वार्टर्स के बीच अनिश्चितता में है। काराकल की CAR.816 CQB कार्बाइन को ऑस्ट्रेलियाई थेल्स द्वारा बनाए गए F90 के मुकाबले चुना गया था। इसके बाद, दोनों कारबाइनों का दिल्ली छावनी में राजपूताना राइफल्स रेजिमेंटल सेंटर में परीक्षण किया गया था। इसमें जिसमें ओएफबी के एम्युनेशन का प्रयोग किया गया था।

रिपोर्ट में इंड्रस्टीज से जुड़े सूत्रों के हवाले से बताया गया है कि 7.5 इंच लंबी बैरल के साथ 3.3 किलोग्राम वजन और 500 मीटर की प्रभावी फायरिंग रेंज वाली CAR861 की कीमत 1,150 डॉलर प्रति कार्बाइन थी। वहीं , प्रतिद्वंद्वी F90 की कीमत लगभग 1,250 डॉलर प्रति यूनिट थी। कश्मीर में राष्ट्रीय राइफल्स में सेवारत एक दो-स्टार अधिकारी ने कहा कि दशकों से कारबाइन की निरंतर कमी ने सीओआईएन के संचालन में सेना की परिचालन क्षमता पर प्रतिकूल प्रभाव डाला है।”

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