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ISRO: भारत 5 मई को लॉन्च करेगा GSLBF-9 कम्युनीकेशन सैटेलाइट

भारत संचार उपग्रह जीसैट-9 को अपने भारी रॉकेट भूस्थैतिक उपग्रह प्रक्षेपण यान (जीएसएलवी-एफ09) के जरिए पांच मई को प्रक्षेपित करेगा।
Author चेन्नई | April 28, 2017 23:50 pm
भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) के अनुसार, जीसैट-9 संचार उपग्रह का प्रक्षेपण दक्षिण एशियाई देशों के कवरेज के साथ कू-बैंड में अलग-अलग संचार अनुप्रयोगों को उपलब्ध कराने के उद्देश्य से किया जा रहा है।

भारत संचार उपग्रह जीसैट-9 को अपने भारी रॉकेट भूस्थैतिक उपग्रह प्रक्षेपण यान (जीएसएलवी-एफ09) के जरिए पांच मई को प्रक्षेपित करेगा। भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) के अनुसार, जीसैट-9 संचार उपग्रह का प्रक्षेपण दक्षिण एशियाई देशों के कवरेज के साथ कू-बैंड में अलग-अलग संचार अनुप्रयोगों को उपलब्ध कराने के उद्देश्य से किया जा रहा है। इसरो के अनुसार, “जीसैट-9 का निर्माण इसरो के मानक आई-2के बस के करीब किया गया है, जिसका भार 2,230 किलोग्राम है। उपग्रह की मुख्य संरचना घनाकार है, जो एक केंद्रीय सिलेंडर के चारों तरफ बना है, जिसका मिशन आयु 12 साल से ज्यादा है। जीएसएलवी रॉकेट स्वदेशी क्रायोजेनिक इंजन के साथ उड़ जाएगा और इसे आंध्र प्रदेश के श्रीहरिकोटा के सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र के द्वितीय लांच पैड से प्रक्षेपित किया जाएगा।

इसरो के अध्यक्ष एएस किरण कुमार ने बताया था कि सैटेलाइट की इस योजना में पाकिस्तान को शामिल नहीं किया गया है। इस सैटेलाइट का फायदा पाकिस्तान के अलावा बाकी के सभी पड़ोसी देशों को मिलेगा। प्राप्त जानकारी के अनुसार श्रीहरिकोटा अंतरिश्र केंद्र से इस सैटेलाइट जीएसएटी-9 को जीएसएलवी-09 के जरिए लांच किया जाएगा। इस सैटेलाइट को इस प्रकार बनाया गया है कि यह 12 साल तक अपने मिशन पर सक्रिय रह सके। अध्यक्ष ने बताया कि पाकिस्तान इस योजना में शामिल नहीं होना चाहता। आपको बता दें कि इस सैटेलाइट की घोषणा पीएम नरेंद्र मोदी ने साल 2014 में की थी, जिसे उन्होंने पड़ोसी देशों के लिए गिफ्ट बताया था।

कांठमांडू में 2014 में हुए सार्क सम्मेलन में इस सैटेलाइट को लांच करने की घोषणा की गई थी। इसका नाम पहले सार्क सैटेलाइट रखा गया था लेकिन जब पाकिस्तान ने इस योजना में शामिल होने से इंकार कर दिया तब इसका नाम साउथ एशिया सैटेलाइट नाम किया गया। बता दें इस सैटेलाइट को बनाने के पीछे का मकसद आपदा सहायता और दक्षिण एशियाई देशों के बीच संपर्क बढ़ाना है। इसमें शामिल सभी देशों को डीटीएच और आपदा के समय इस सैटेलाइट की मदद से जानकारी एक दूसरे के साथ साझा करने में मदद मिलेगी।

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