नई दिल्ली स्थित अफगानिस्तान दूतावास ने 15 अगस्त को “विजय दिवस” ​​मनाया। यह तालिबान द्वारा देश पर कब्जा करने के पांच साल पूरे होने का प्रतीक था। तालिबान शासन के संबंध में भारत के रुख में इन पांच वर्षों में काफी बदलाव आया है।

17 अगस्त 2021 को नई दिल्ली ने काबुल से अपने पूरे दूतावास को जल्दबाजी में खाली करा लिया था। अब भारत खुलेआम इस्लामी शासन के साथ व्यापार कर रहा है। हालांकि उसने उसे आधिकारिक राजनयिक मान्यता नहीं दी है।

भारतीय राजनयिकों और लगभग दो दर्जन विदेशी राजनयिकों की उपस्थिति में आयोजित “विजय दिवस” ​​समारोह इस बात का नया संकेत था कि भारत-तालिबान संबंध अब धीरे-धीरे परदे के पीछे से निकलकर सार्वजनिक रूप से सामने आ रहे हैं।

जहां भारतीय अधिकारियों ने इसे “सतर्कतापूर्ण हस्तक्षेप” बताया है। वहीं अन्य लोगों ने इसकी आलोचना करते हुए इसे “अवसरवादी” करार दिया है। हम इस स्थिति तक कैसे पहुंचे? मानवाधिकार और महिला शिक्षा पर भारत के घोषित रुख के लिए इसका क्या अर्थ है? और सुरक्षा संबंधी चिंताओं का क्या? आइए हम विस्तार से बताते हैं।

भारत अपनी भागीदारी क्यों बढ़ा रहा है?

जहां दुनिया के अधिकांश देश तालिबान से दूरी बनाए हैं। वहीं भारत ने इस कट्टरपंथी इस्लामी समूह के साथ राजनयिक आदान-प्रदान तेज कर दिया है।

तालिबान के विदेश मंत्री अमीर खान मुत्ताकी ने अक्टूबर 2025 में नई दिल्ली का एक महत्वपूर्ण दौरा किया था। लगभग उसी समय से अफगान दूतावास तालिबान के नियंत्रण में आ गया है। तालिबान द्वारा नियुक्त प्रभारी मुफ्ती नूर अहमद नूर दिल्ली में कई महत्वपूर्ण आयोजनों में शामिल रहे हैं। प्रधानमंत्री का स्वतंत्रता दिवस भाषण, राष्ट्रपति भवन में राष्ट्रपति का स्वागत समारोह और यहां तक ​​कि नॉर्वे दूतावास में एक राजनयिक स्वागत समारोह भी। आखिर इन सबके पीछे क्या कारण है?

2001 में तालिबान के पतन के बाद भारत ने कई वर्षों तक अफगानिस्तान में निवेश किया। 2021 में अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडेन द्वारा देश से अमेरिकी सैनिकों की वापसी की घोषणा के कुछ ही हफ्तों के भीतर अशरफ घनी के नेतृत्व वाली सरकार गिर गई।

बीते महीनों और वर्षों में भारतीय सरकार इस निष्कर्ष पर पहुंची कि आधिकारिक मान्यता दिए बिना आधिकारिक भागीदारी के स्तर को बढ़ाना आवश्यक था अन्यथा उसका 2-3 अरब डॉलर का निवेश व्यर्थ हो जाता। यह निवेश अफगानिस्तान के लोगों के लिए था और इसका उद्देश्य देश में किसी प्रकार का प्रभाव और दबदबा स्थापित करना था।

इसका एक प्रमुख कारण यह है कि तालिबान का संरक्षक और सहयोगी पाकिस्तान अब एक घातक शत्रु बन गया है। दोनों पक्षों के बीच विवादित सीमा पर कई झड़पें हो चुकी हैं। नई दिल्ली के लिए तालिबान और पाकिस्तान के बीच बिगड़े संबंध एक अवसर के रूप में सामने आए हैं।

भारत की भागीदारी को गति देने वाला एक अन्य कारक चीन है। बीजिंग ने अफगानिस्तान में पुलों का निर्माण शुरू कर दिया है और प्राकृतिक संसाधनों पर नजर गड़ाए हुए है। अमेरिका, यूरोप और पश्चिम द्वारा छोड़े गए खालीपन को भरते हुए।

रूस भी तालिबान के साथ संपर्क में है। वह एकमात्र ऐसा देश है जिसने तालिबान के साथ राजनयिक संबंध स्थापित किए हैं। दिल्ली तालिबान के मुद्दे पर मॉस्को के साथ मिलकर काम कर रही है और चीनी प्रभाव पर नजर रख रही है।

नई दिल्ली ने दिसंबर 2021 में ही अफगानिस्तान को दवाओं की खेप भेजकर गंभीर संकेत देना शुरू कर दिया था। सरकार का मकसद तालिबान शासन को अफगान जनता से अलग दिखाना था। इसके पीछे नए अफगानिस्तान के लिए एक रास्ता खोलना और बातचीत में अपनी पैठ बनाना था।

क्या सुरक्षा संबंधी कोई चिंताएं हैं?

नई दिल्ली इस सरल सिद्धांत पर काम करती रही है कि अफगानिस्तान की धरती का इस्तेमाल भारत विरोधी गतिविधियों और आतंकवादी समूहों को समर्थन देने के लिए नहीं किया जाना चाहिए।

संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की 1267 प्रतिबंध समिति की 10 अगस्त की रिपोर्ट में कहा गया है, “अफगानिस्तान से उत्पन्न आतंकवादी खतरा काफी हद तक अपरिवर्तित रहा। अफगानिस्तान में कई आतंकवादी समूहों की सक्रियता पड़ोसी देशों और मध्य एशियाई क्षेत्र के लिए एक स्थायी खतरा बनी हुई है। इस्लामिक स्टेट इन इराक एंड द लेवांत-खुरासान (आईएसआईएल-के) से निपटने और अन्य आतंकवादी समूहों को नियंत्रित करने के लिए वास्तविक अधिकारियों द्वारा किए गए प्रयासों के बावजूद, अधिकारी आतंकवादी समस्या को दबाने में असमर्थ रहे।” रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि अफगानिस्तान में अल-कायदा आतंकवादी समूह की स्थिति और ताकत में कोई बदलाव नहीं आया है।

नई दिल्ली को इस बात से राहत मिली होगी कि रिपोर्ट में लश्कर-ए-तैयबा और जैश-ए-मोहम्मद जैसे भारत विरोधी आतंकी समूहों का कोई जिक्र नहीं है, लेकिन वह अपनी आशंकाएं भी जता रही है। अब तक, नई दिल्ली की भागीदारी “सीमित” रही है और तालिबान ने संकेत दिया है कि वे भारतीय चिंताओं को संभालने में उचित रवैया अपनाएंगे। काबुल में भारतीय राजनयिकों को दी गई सुरक्षा ने भारतीय सरकार को कुछ हद तक आश्वस्त किया है।

नमाज के बाद नूर ने 21 मिनट का भाषण दिया जिसमें उन्होंने कई सुरक्षा चिंताओं को संबोधित किया। उन्होंने कहा, “पिछले पांच सालों की महत्वपूर्ण उपलब्धियों में से एक पवित्र शरिया का कार्यान्वयन, देश की सुरक्षा और स्वतंत्र निर्णय लेने की क्षमता को मजबूत करना, साथ ही स्थिरता को सुदृढ़ करना रहा है। यह सुरक्षा न केवल अफगानों के लिए आवश्यक है, बल्कि क्षेत्र और विश्व के साझा हितों की भी पूर्ति करती है। एक शांतिपूर्ण, स्थिर और जिम्मेदार अफगानिस्तान क्षेत्रीय संपर्क, व्यापार, निवेश और आर्थिक सहयोग के लिए नए अवसर पैदा करता है, साथ ही साझा सुरक्षा खतरों को रोकने में रचनात्मक भूमिका निभाता है।”

जब वह बोल रहे थे तो मंच पर लगी स्क्रीन पर लिखा था, “विजय से क्षेत्रीय आर्थिक संपर्क की ओर”। संदेश यह था कि अफगानिस्तान आर्थिक गतिविधियों का केंद्र है, न कि आतंकी समूहों का अड्डा।

नूर ने कहा, “अफगानिस्तान का इस्लामी अमीरात मानता है कि अफगानिस्तान का भूगोल नकारात्मक प्रतिस्पर्धा का मैदान नहीं होना चाहिए, बल्कि संपर्क, सहयोग और साझा समृद्धि का सेतु होना चाहिए। इसलिए, अफगानिस्तान क्षेत्रीय आर्थिक और पारगमन सहयोग का विस्तार करने, व्यापार को सुगम बनाने और पारस्परिक हितों पर आधारित संबंधों को मजबूत करने के लिए अपने व्यावहारिक प्रयास जारी रखे हुए है।” इसे भारत और पाकिस्तान के लिए एक संदेश के रूप में देखा गया, जो अफगानिस्तान में लंबे समय से प्रभाव के लिए संघर्ष कर रहे हैं।

लेकिन अधिकारों से जुड़े मुद्दों का क्या?

अगस्त 2021 से भारत ने अफगानिस्तान को पर्याप्त मानवीय सहायता प्रदान की है। जिसमें 50,000 मीट्रिक टन गेहूं, 445 टन से अधिक आवश्यक जीवन रक्षक दवाएं, टीके और आपदा राहत सामग्री शामिल हैं, जिसमें बाढ़ और भूकंप के लिए तम्बू और खाद्य सामग्री शामिल हैं।

लेकिन मानवाधिकारों का महत्वपूर्ण मुद्दा महिलाओं के पढ़ने और काम करने का अधिकार था, लेकिन अल्पसंख्यकों के अधिकार अब न तो तालिबान की और न ही भारत की सार्वजनिक रूप से घोषित ‘रेड लाइन’ का हिस्सा हैं।

अंतरराष्ट्रीय मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, सत्ता पर पुनः अधिकार प्राप्त करने के बाद से इस्लामी समूह देश की 22 मिलियन महिलाओं के अधिकारों का हनन कर रहा है। 12 वर्ष से अधिक उम्र की लड़कियों के लिए स्कूल में प्रवेश पर रोक लगा रहा है। पुरुष साथी के बिना यात्रा को प्रतिबंधित कर रहा है और एक ऐसा कानून ला रहा है जो बाल विवाह को कानूनी स्वीकृति प्रदान करता है।

नई दिल्ली में आयोजित अफगानिस्तान के “विजय दिवस” ​​के स्वागत समारोह में केवल कुछ ही महिलाएं उपस्थित थीं। इनमें एक भारतीय महिला राजनयिक (विदेश मंत्रालय में अफगानिस्तान, पाकिस्तान और ईरान की निदेशक स्नेहा दुबे), कुछ भारतीय महिला पत्रकार और विदेशी राजनयिकों की पत्नियां और परिवार के सदस्य शामिल थे, जो लगभग 200 लोगों की भीड़ का हिस्सा थे।

तालिबान द्वारा सत्ता पर कब्जा करने के कुछ ही समय बाद, संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद ने एक प्रस्ताव पारित किया, जिसमें अफगानिस्तान में मानवाधिकारों और महिलाओं के अधिकारों को बनाए रखने की आवश्यकता पर बल दिया गया था। भारत की बारी-बारी से अध्यक्षता में पारित 30 अगस्त के इस प्रस्ताव में मांग की गई कि अफगान क्षेत्र का उपयोग आतंकवाद के लिए नहीं किया जाना चाहिए और संकट का राजनीतिक समाधान वार्ता के माध्यम से निकाला जाना चाहिए।

दिसंबर 2022 में भारत ने उन खबरों पर चिंता व्यक्त की कि तालिबान ने अफगानिस्तान में महिलाओं के विश्वविद्यालयों में प्रवेश पर प्रतिबंध लगा दिया है। उसने सुरक्षा परिषद के प्रस्ताव का हवाला देते हुए काबुल में एक समावेशी सरकार के गठन की अपनी मांग को दोहराया, जो अफगान समाज के सभी पहलुओं में महिलाओं और लड़कियों के समान अधिकारों को सुनिश्चित करे।

अब भारतीय पक्ष ने महिलाओं के अधिकारों और मानवाधिकारों से संबंधित उन पुरानी रूढ़ियों पर जोर नहीं दिया है। उसने भारत द्वारा वित्तपोषित परियोजनाओं पर विकास सहयोग को आगे बढ़ाने और चिकित्सा उपचार, व्यापार और यहां तक ​​कि शिक्षा के लिए भारत आने वाले अफगानियों के लिए वीजा जारी करने पर सहमति जताई है।

हालांकि, यह चुप्पी बहुत कुछ कहती है। भारत का तालिबान के साथ रणनीतिक संबंध लगभग पूर्ण हो चुका है। दिल्ली, मुंबई और हैदराबाद स्थित अफगान दूतावासों में अब तालिबान द्वारा नियुक्त राजनयिक तैनात हैं। उन्हें केवल आधिकारिक राजनयिक मान्यता प्राप्त नहीं है। जब तक यह मान्यता नहीं मिल जाती, दिल्ली स्थित दूतावास के मुख्य ध्वज पर पुराने अफगान गणराज्य का तिरंगा ही लहराता रहेगा।

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