श्रीलंका के कृषि मंत्रालय के सचिव डीपी विक्रमसिंघे ने भारत को एशिया की खाद्य सुरक्षा का आधार बताया। उन्होंने शुक्रवार को कहा कि दोनों देशों के बीच सहयोग से श्रीलंका अपनी कृषि नीतियों को मजबूत कर सकता है। भारत एशिया की खाद्य सुरक्षा के लिए एक महत्त्वपूर्ण देश है। उन्होंने जलवायु परिवर्तन के प्रभावों पर चिंता जताई और कानूनी ढांचे के माध्यम से कृषि-वानिकी को नियमित करने की आवश्यकता पर बल दिया।

सचिव ने कहा, कृषि-वानिकी के बारे में एक नया सिद्धांत है क्योंकि भारत और श्रीलंका में हम इसे लंबे समय से उपयोग करते आ रहे हैं लेकिन इसे एक अवधारणा के रूप में नियमित करना चाहते हैं। दोनों देशों की नीति बनाना चाहते हैं इसलिए हम भारत और अन्य प्रतिभागियों के अनुभव लेने आए हैं। इस अनुभव से किसानों की मदद के लिए श्रीलंका में कृषि-वानिकी को एक नया आधार देने में मदद मिलेगी।

उन्होंने कहा, कृषि में नया क्या कर सकते हैं? हमें यहां इतनी सारी चीजें मिली हैं, इतने सारे विचार और इतने सारे दस्तावेज। इसलिए अब अपनी मौजूदा कृषि-वानिकी को नियमित करने और इसे किसी कानूनी ढांचे में डालने के लिए कुछ करने की कोशिश कर रहे हैं।

श्रीलंका में कृषि उत्पादन और भारत से आयात की स्थिति पर उन्होंने कहा, हम अपनी आवश्यकताओं के लिए कुछ सब्जियां तथा अन्न उगा रहे हैं, खासकर धान। हमारे पास धान पर्याप्त मात्रा में है। हम कुछ सब्जियां, फल और कुछ अन्य फसलें भी पैदा कर रहे हैं, जैसे काला चना, हरा चना। लेकिन शेष हम भारत से आयात करते हैं। श्रीलंका अपनी आवश्यकता का 50 फीसद मक्का भारत से प्राप्त कर रहा है। 80 फीसद प्याज, आलू, कुछ अनाज जैसे काला चना, कुछ मूंगफली हम यहां से ले रहे हैं। भारत एशिया की खाद्य सुरक्षा के लिए एक महत्त्वपूर्ण देश है। भारतीय भंडार हमारे लिए अहम है। श्रीलंका के लिए भारतीय बाजार तक पहुंचना आसान है। साथ ही भारतीय कीमत एशिया के अन्य प्रतिस्पर्धियों से कम है।

उत्पादन में चुनौतियां के बारे में जानकारी देते हुए सचिन ने कहा, हम कुछ हद तक उत्पादन कर रहे हैं। यह देश की जलवायु और अन्य कारकों पर निर्भर करता है। कभी-कभी हमें कुछ फसलों में बड़ा उत्पादन मिलता है। कभी-कभी हम जलवायु समस्याओं के कारण अपना उत्पादन खो देते हैं। उस अवधि में, हम अपनी कमी भारत से पूरी करते हैं। भारत-अमेरिका व्यापार समझौते के बारे में सचिव ने कहा, अभी इस व्यापार समझौते के बारे में ज्यादा जानकारी नहीं है। यह भारत और अमेरिका का आंतरिक मामला है क्योंकि एक सरकारी अधिकारी के रूप में मेरे पास इस समझौते के बारे में व्याख्या करने या कुछ करने का कोई अधिकार नहीं है।

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