पिछले दो-तीन दिनों में भारत-पाकिस्तान के बीच ट्रैक-टू वार्ता का दावा करने वाली कई मीडिया रिपोर्ट्स सामने आई हैं। अब इन खबरों पर भारत के विदेश सचिव विक्रम मिस्री ने प्रतिक्रिया दी है। उन्होंने सेशल्स में न्यूज एजेंसी एएनआई द्वारा किए गए एक सवाल के जवाब में कहा कि उन्होंने वो मीडिया रिपोर्ट देखी हैं और वो उनके बारे में जानते हैं।

विक्रम मिस्री ने कहा, “इस तरह के दर्जनों कार्यक्रम दुनिया भर में दर्जनों जगहों पर कई तरह के विषयों पर होते रहते हैं। इसलिए इन कार्यक्रमों में कुछ भी नया या कुछ भी खास नहीं है। दूसरी बात, जहां तक हमारा संबंध है, ये निजी कार्यक्रम हैं जो निजी पक्षों द्वारा आयोजित किए जाते हैं। जहां तक हमारा संबंध है, इनमें कुछ भी आधिकारिक नहीं है।”

उन्होंने कहा कि इन कार्यक्रमों का भारत सरकार से कोई संंबंंध नहीं है। इन यात्राओं में भारत सरकार की कोई आधिकारिक भागीदारी, कोई आधिकारिक समर्थन या संलिप्तता नहीं है।

‘ऐसे कार्यक्रमों में हिस्सा लेने वाले अपना दृष्टिकोण रखते हैं’

विक्रम मिस्री ने कहा कि भारत से जो कोई भी इन कार्यक्रमों में भाग ले रहा है, चाहे वे रिटायर्ड डिप्लोमैट्स हों, रिटायर्ड मिलिट्री अधिकारी हों या सिविल सोसाइटी के सदस्य हों, वे जब ऐसे कार्यक्रमों में भाग लेते हैं, तो वे अपनी ओर से बोलते हैं। वे किसी भी तरह से भारत सरकार के दृष्टिकोण का प्रतिनिधित्व नहीं करते हैं और न ही कर सकते हैं।

राम माधव के किया खंंडन

इससे पहले एक मीडिया संस्थान ने अपनी रिपोर्ट में दावा किया था कि बीजेपी के नेता राम माधव भारत-पाकिस्तान के बीच कोलंबो में हुई ट्रैक-टू वार्ता में शामिल हुए थे। राम माधव ने इस रिपोर्ट को पूरी तरह से गलत बताया था।

उन्होंने कहा कि यह कोई ‘ट्रैक-2’ बातचीत नहीं थी। यह IISS की सालाना ‘साउथ एशिया डायलॉग’ थी, जिसमें भारत, श्रीलंका, अमेरिका, ब्रिटेन, अफगानिस्तान और पाकिस्तान के विद्वान शामिल हुए थे। पहले भी अधिकारी इस बातचीत में शामिल होते रहे हैं। इतने सारे देशों के साथ कोई ‘ट्रैक-2’ बातचीत नहीं होती।

उन्होंने कहा, “मैं दो दिन चली इस बातचीत में शामिल नहीं हुआ था। मुझे एक सेशन में बोलने के लिए बुलाया गया था, मैंने बोला और चला आया। एक ऐसी बात को बेवजह तूल दिया जा रहा है जिसका कोई मतलब नहीं है।”

ट्रैक-2 वार्ता क्या होती?

ट्रैक-2 वार्ता दो देशों के बीच अनौपचारिक कूटनीतिक बातचीत होती है। इसमें सरकार के नुमाइंंदे भाग नहीं लेते। आमतौर पर ऐसे कार्यक्रमों में रिटायर्ड डिप्लोमैट्स हों, रिटायर्ड मिलिट्री अधिकारी, शिक्षाविद्, थिंक-टैंक और पूर्व नौकरशाह हिस्सा लेते हैं। ऐसी बातचीत का मकसद दो देशों के बीच विश्वास, तनाव कम करना और समाधान के सुझाव देना होता है।