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भारत का एकमात्र संस्कृत दैनिक ‘सुधर्मा’ बंद होने के कगार पर, केंद्र से मांगी मदद

इस अखबार की अभी 3,000 प्रतियां निकलती हैं और इसकी वार्षिक सदस्यता शुल्क महज 400 रुपए है।

Author नई दिल्ली | June 12, 2016 4:32 PM
सुधर्मा की शुरुआत संस्कृत विद्वान कालेले नदादूर वरदराजा आयंगर ने वर्ष 1970 में की थी। उन्होंने इसकी शुरुआत संस्कृत भाषा को अधिकाधिक लोगों तक पहुंचाने के लिए की थी।

मौजूदा समय में देश का एकमात्र संस्कृत दैनिक होने का दावा करने वाला ‘सुधर्मा’ गंभीर वित्तीय संकट से गुजर रहा है, जिस कारण अखबार के सामने अस्तित्व का संकट पैदा हो गया है। अगले महीने यह अखबार अपने 46 वर्ष पूरे कर लेगा। मैसूर से निकलने वाले दैनिक के संपादक ने केन्द्र से सहायता मांगी है लेकिन अब भी जवाब मिलना बाकी है। इस अखबार की अभी 3,000 प्रतियां निकलती हैं। अखबार के संपादक संपत कुमार ने बताया, ‘हम लोगों को मदद चाहिए। इस अखबार का वार्षिक सदस्यता शुल्क महज 400 रुपए है और प्रतियों की बिक्री में कमी आई है। हम लोगों ने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी, मानव संसाधन विकास मंत्री स्मृति ईरानी ओर गृह मंत्री राजनाथ सिंह को लिखा है लेकिन अब तक कोई जवाब नहीं मिला है।’

अब उन लोगों ने समाचार पत्र में एक अपील प्रकाशित की है जिसमें आम लोगों से चन्दा मांगा गया है। अपील में कहा गया है, ‘इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों के आज के दौर में अखबारों को जिन्दा रखना चुनौतीपूर्ण रहा है। हमारे पाठक और शुभचिंतक बिक्री को बढ़ाने और अखबार के पाठकों की संख्या में वृद्धि को लेकर तमाम तरीके के सुझाव दे रहे हैं और अपने विचार रख रहे हैं।’ इसमें साथ ही कहा गया, ‘हम लोगों ने अखबार को नया स्वरूप देने और सुधर्मा पत्रिका (अर्धवार्षिक) को निकालने के बारे में सोचा है। इसके लिए हम लोगों को वर्तमान समय के मुद्रण उपकरण और अन्य सामानों की जरूरत पड़ेगी।’

सुधर्मा द्वारा की गई अपील में कहा गया है, ‘हम लोग आयातित एकल रंग की ऑफसेट मशीन खरीद रहे हैं। इसकी अनुमानित लागत 20 लाख रुपए होगी। इस सपने को साकार करने के लिए हम लोगों को आपकी मदद की जरूरत होगी। हम लोग आप से चन्दा देकर मदद करने का आग्रह कर रहे हैं। बहुत अधिक लोगों तक भाषा को पहुंचाने के लिए कृपया हमारी मदद करें।’ कुमार ने कहा, ‘हमारे लिए सुधर्मा आय सृजन का साधन नहीं है। यह पत्रकारिता और संस्कृत को लेकर हमारे जुनून का फल है।’ सुधर्मा की शुरुआत संस्कृत विद्वान कालेले नदादूर वरदराजा आयंगर ने वर्ष 1970 में की थी। उन्होंने इसकी शुरुआत संस्कृत भाषा को अधिकाधिक लोगों तक पहुंचाने के लिए की थी।

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