क्या आपने कभी सोचा है कि जब आप सुबह अपने घर का नल खोलते हैं या खेत में ट्यूबवेल का स्विच ऑन करते हैं तो जो पानी बाहर आता है, वह असल में कितना पुराना है? वैज्ञानिक कहते हैं कि भारत के कई इलाकों में आज हम जमीन से जो पानी खींच रहे हैं, उसे प्रकृति ने हजारों साल पहले सहेजकर वहां छिपाया था। यानी वह पानी राजा-महाराजाओं के दौर का या उससे भी पुराना एक ‘टाइम कैप्सूल’ है। डरावना सच यह है कि जिस खजाने को भरने में प्रकृति को सदियां लग गईं, उसे हम इंसानों ने चंद दशकों में ही खाली करने की कगार पर पहुंचा दिया है।
भारत दुनिया में भूजल (Groundwater) का सबसे बड़ा उपभोक्ता है। हम अमेरिका और चीन, दोनों के कुल इस्तेमाल को मिलाकर भी उससे ज्यादा भूजल अकेले जमीन से खींच लेते हैं। केंद्रीय भूमि जल बोर्ड (CGWB), नीति आयोग और संयुक्त राष्ट्र (UN) की लेटेस्ट रिपोर्ट्स की मानें तो भारत एक बेहद खतरनाक मोड़ यानी ‘जल दिवालियापन’ (Water Bankruptcy) की ओर बढ़ रहा है।
आइए इस विस्तृत विश्लेषण में समझते हैं कि भारत में भूजल की वास्तविक स्थिति क्या है, कौन से राज्य इस संकट के केंद्र में हैं और इस अदृश्य आपदा से बचने के रास्ते क्या हैं।
आंकड़े बोलते हैं
- भारत में भूजल के संकट को समझने के लिए देश और दुनिया की तीन विश्वसनीय संस्थाओं के डेटा को देखते हैं:
केंद्रीय भूमि जल बोर्ड (CGWB) की रिपोर्ट: जमीन के भीतर का सच
भारत सरकार के जल शक्ति मंत्रालय और केंद्रीय भूजल बोर्ड द्वारा जारी National Compilation on Dynamic Ground Water Resources of India, 2024 रिपोर्ट के अनुसार भूजल भारत के पेयजल, कृषि और उद्योगों का प्रमुख स्रोत है। देश की लगभग 62% सिंचाई, 85% ग्रामीण पेयजल तथा 50% शहरी जलापूर्ति भूजल पर निर्भर है। रिपोर्ट के अनुसार भारत में कुल वार्षिक भूजल रिचार्ज 446.90 BCM, उपयोग योग्य भूजल 406.19 BCM तथा कुल भूजल दोहन 245.64 BCM है। देश में भूजल दोहन का औसत स्तर 60.47% दर्ज किया गया है।
रिपोर्ट के अनुसार देश के 73.39% आकलन क्षेत्र सुरक्षित (Safe) श्रेणी में हैं जबकि 11.13% क्षेत्र अत्यधिक दोहन (Over-Exploited) की श्रेणी में हैं। दिल्ली, हरियाणा, पंजाब, राजस्थान और तमिलनाडु जैसे राज्यों में भूजल पर अधिक दबाव देखा गया है। रिपोर्ट में वर्षा जल संचयन, कृत्रिम भूजल रिचार्ज, अटल भूजल योजना, जल शक्ति अभियान तथा वैज्ञानिक जल प्रबंधन जैसे उपायों को बढ़ावा देने पर बल दिया गया है ताकि भविष्य में जल संकट को कम किया जा सके और भूजल संसाधनों का सतत इस्तेमाल सुनिश्चित हो सके।
वार्षिक निकासी: भारत में हर साल लगभग 247.22 BCM (Billion Cubic Meter) भूजल निकाला जाता है।
निकासी की दर (Stage of Extraction): राष्ट्रीय स्तर पर भूजल दोहन की औसत दर 60.63% है। इसका सीधा मतलब है कि अगर प्रकृति जमीन के नीचे 100 लीटर पानी डालती है तो हम उसमें से 60 लीटर से ज्यादा निकाल लेते हैं।
कृषि का दबाव: सबसे चौंकाने वाला तथ्य यह है कि निकाले गए कुल भूजल का 87% हिस्सा केवल और केवल कृषि (सिंचाई) में इस्तेमाल होता है। घरेलू उपयोग में केवल 11% और उद्योगों में 2% पानी जाता है।
अति-दोहित क्षेत्र (Over-exploited Units): देश के कुल 6762 मूल्यांकन ब्लॉकों (तालुका/मंडल) में से लगभग 11% ब्लॉक ‘Over-exploited’ की कैटिगिरी में हैं यानी इन इलाकों में पानी रीचार्ज होने की रफ्तार से कहीं ज्यादा रफ्तार से निकाला जा रहा है।
नीति आयोग की चेतावनी: 60 करोड़ लोग संकट में
नीति आयोग ने 2018 में आई अपने Composite Water Management Index (CWMI) में साफ तौर पर कहा था कि भारत अपने इतिहास के सबसे गंभीर जल संकट से गुजर रहा है।
इस रिपोर्ट के अनुसार, देश की 60 करोड़ आबादी गंभीर से अत्यधिक जल तनाव (High to Extreme Water Stress) का सामना कर रही है। देश के 20 से अधिक बड़े शहरों (जिनमें दिल्ली, बेंगलुरु, चेन्नई और हैदराबाद शामिल हैं) में भूजल का स्तर ‘जीरो’ के करीब पहुंच चुका है या बहुत ज्यादा नीचे चला गया है। नीति आयोग का अनुमान है कि अगर वर्तमान प्रवृत्ति जारी रही तो देश में पानी की मांग उपलब्ध आपूर्ति से दोगुनी हो जाएगी जिससे देश की जीडीपी में 6% तक की गिरावट आ सकती है।
संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट: ‘टिपिंग पॉइंट’ के करीब भारत
संयुक्त राष्ट्र विश्वविद्यालय (UNU-EHS Interconnected Disaster Risks Report) ने 2023 में भारत के भूजल संकट पर एक वैश्विक चेतावनी जारी की:
इस रिपोर्ट के अनुसार, भारत अपने भूजल दोहन के ‘टिपिंग पॉइंट’ (Tipping Point) के बेहद करीब है। टिपिंग पॉइंट वह अवस्था होती है जिसके बाद जलभृतों (Aquifers) का वापस अपने पुराने स्वरूप में लौटना असंभव हो जाता है।
पिछले पांच दशकों में भारत में गहरे बोरवेलों की संख्या 10 लाख से बढ़कर 2 करोड़ (20 मिलियन) से अधिक हो गई है। संयुक्त राष्ट्र का कहना है कि उत्तर-पश्चिमी भारत के कुछ हिस्सों में भूजल का यह स्तर हमेशा के लिए खत्म हो सकता है। भारत में भूजल जीवन, कृषि और अर्थव्यवस्था का आधार है। 2024 की रिपोर्ट बताती है कि देश में अधिकांश क्षेत्र सुरक्षित हैं लेकिन कुछ राज्यों में भूजल का अत्यधिक दोहन गंभीर समस्या बन चुका है। इसलिए वर्षा जल संचयन, भूजल संरक्षण और वैज्ञानिक जल प्रबंधन को बढ़ावा देना समय की सबसे बड़ी जरूरत है।

संकट का भूगोल: राज्यवार तुलना
- भारत के हर हिस्से में पानी का संकट एक जैसा नहीं है। कुछ राज्य पानी की प्रचुरता के बावजूद संकट में हैं तो कुछ अपने भूगोल और गलत कृषि नीतियों के कारण रेगिस्तान बनने की राह पर हैं।
पंजाब: ‘हरित क्रांति’ की भारी कीमत
पंजाब में भूजल दोहन की दर 150% से ज्यादा है। इसका मतलब है कि पंजाब अपनी रीचार्ज क्षमता से डेढ़ गुना ज्यादा पानी जमीन से निकाल रहा है।
हरित क्रांति के बाद पंजाब को देश का ‘अन्नदाता’ बनाया गया लेकिन इसके लिए धान (Rice) जैसी फसल को चुना गया जिसमें बड़ी मात्रा में पानी लगता है। एक किलो चावल उगाने के लिए लगभग 3000 से 5000 लीटर पानी की जरूरत होती है। मुफ्त बिजली और न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) की गारंटी ने किसानों को गहरे से गहरा बोरवेल खोदने के लिए मजबूर किया।
हरियाणा और राजस्थान: रेगिस्तान बनने का खतरा
हरियाणा में भूजल दोहन की दर 100% को पार कर चुकी है। पिछले एक दशक में हरियाणा के कई जिलों में जलस्तर औसतन 5 से 7 मीटर नीचे चला गया है। वहीं राजस्थान का भूगोल स्वाभाविक रूप से शुष्क है लेकिन इसके 302 ब्लॉकों में से 214 ब्लॉक ‘अति-दोहित’ श्रेणी में आ चुके हैं। यहां इंदिरा गांधी नहर के बावजूद भूजल पर निर्भरता कम नहीं हुई है।
दक्षिण भारत (तमिलनाडु और कर्नाटक): पथरीली जमीन का संकट
बेंगलुरु जैसे शहरों में पानी का संकट हर साल गर्मियों में सुर्खियों में रहता है। दक्षिण भारत की जमीन ‘कठोर चट्टानी’ (Hard Rock Aquifers) है। यहां उत्तर भारत के मैदानी इलाकों की तरह रेतीली या जलोढ़ मिट्टी नहीं है जो पानी को सोखकर नीचे रख सके। यहां की चट्टानों में पानी सीमित मात्रा में होता है जिसे एक बार निकाल लिया जाए तो रीचार्ज होने में सैकड़ों साल लगते हैं।
पूर्वी और पूर्वोत्तर भारत: मात्रा पर्याप्त, गुणवत्ता खराब
बिहार, पश्चिम बंगाल, असम और ओडिशा जैसे राज्यों में भूजल की मात्रा (मात्रात्मक दृष्टि से) अभी भी सुरक्षित श्रेणी (50% से कम दोहन) में है। यहां प्रचुर बारिश और गंगा-ब्रह्मपुत्र जैसी नदियां हैं। लेकिन यहां संकट ‘गुणवत्ता’ का है। पश्चिम बंगाल और बिहार के कई जिलों के भूजल में आर्सेनिक (Arsenic) और फ्लोराइड की मात्रा खतरनाक स्तर पर है जिससे यह पानी पीने योग्य नहीं रह गया है।

भूजल खत्म होने के मुख्य कारण
- आखिर हम इस स्थिति में पहुंचे कैसे? यह संकट प्राकृतिक से ज्यादा इंसान की बनाई हुई है…
दोषपूर्ण फसल चक्र (Faulty Crop Patterns): भारत के जिन इलाकों में बारिश कम होती है (जैसे पंजाब, हरियाणा, पश्चिमी उत्तर प्रदेश, और महाराष्ट्र का मराठवाड़ा), वहां गन्ना और धान जैसी फसलें उगाई जा रही हैं। यह सीधे तौर पर पानी का निर्यात करने जैसा है।
मुफ्त बिजली की राजनीति: कई राज्यों में किसानों को कृषि के लिए मुफ्त या अत्यधिक सब्सिडी वाली बिजली दी जाती है। इससे ट्यूबवेल दिन-रात चलते रहते हैं क्योंकि पानी निकालने के लिए किसी तरह का पैसा नहीं चुकाना पड़ता।
शहरीकरण और कंक्रीटीकरण: शहरों में तालाबों, झीलों और आर्द्रभूमियों (Wetlands) को पाटकर इमारतें बना दी गई हैं। जब पूरी जमीन कंक्रीट की हो जाएगी तो बारिश का पानी जमीन के भीतर रिसकर (Percolate) कैसे जाएगा?
पारंपरिक जल प्रणालियों की उपेक्षा: भारत के गांवों में कभी कुएं, बावड़ियां और जोहड़ (तालाब) पानी के मुख्य स्रोत हुआ करते थे जो भूजल को स्टोर रखते थे और पानी खत्म नहीं होने देते थे। नल और बोरवेल आने के बाद हमने इन पारंपरिक ढांचों को कचरे का डिब्बा बना दिया।
समाधान: हम इसे कैसे रोक सकते हैं?
- नीति आयोग और संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट्स स्पष्ट करती है कि हमारे पास अब हाथ पर हाथ धरे बैठने का समय नहीं है। अगर हमें अपनी आने वाली पीढ़ियों को प्यासा नहीं रखना है तो कड़े और जरूरी कदम उठाने होंगे:
A.कृषि में क्रांतिकारी बदलाव (Agricultural Reforms)
फसल विविधीकरण (Crop Diversification): किसानों को धान और गन्ने की जगह बाजरा, रागी, ज्वार (Millets), दालें और तिलहन उगाने के लिए प्रोत्साहित करना होगा। इन फसलों को पानी की बहुत कम जरूरत होती है और ये जलवायु परिवर्तन के प्रति अधिक लचीली हैं। हरियाणा सरकार की ‘मेरा पानी-मेरी विरासत’ योजना (जो धान न उगाने पर किसानों को प्रोत्साहन राशि देती है) इसका एक अच्छा उदाहरण है।
सूक्ष्म सिंचाई (Micro-Irrigation): पारंपरिक रूप से खेतों को पानी से भर देने (Flood Irrigation) की जगह ड्रिप (टपक सिंचाई) और स्प्रिंकलर (फव्वारा सिंचाई) को अनिवार्य किया जाना चाहिए। इससे पानी की खपत में 40-50% की कमी आती है और फसल की पैदावार भी बेहतर होती है।
B. वर्षा जल संचयन (Rainwater Harvesting)
भारत में हर साल पर्याप्त बारिश होती है लेकिन हम उसका केवल 8% से 10% ही संचित कर पाते हैं। बाकी पानी बहकर समुद्र में चला जाता है या बाढ़ का कारण बनता है।
शहरी क्षेत्रों में: हर नए और पुराने भवन के लिए ‘रूफटॉप रेनवाटर हार्वेस्टिंग’ को कानूनी रूप से अनिवार्य और क्रियान्वित किया जाना चाहिए।
ग्रामीण क्षेत्रों में: खेतों की मेड़बंदी, चैक डैम का निर्माण और गांवों के पुराने तालाबों को गहरा करना आवश्यक है।
C. सरकारी योजनाएं और उनकी जमीनी हकीकत
सरकार ने इस दिशा में कुछ महत्वपूर्ण कदम उठाए हैं जिन्हें और गति देने की आवश्यकता है:
अटल भूजल योजना (Atal Bhujal Yojana): यह योजना देश के 7 सबसे अधिक जल-तनाव वाले राज्यों (गुजरात, हरियाणा, कर्नाटक, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, राजस्थान और उत्तर प्रदेश) के 8,220 गांवों में लागू है। इसका मुख्य उद्देश्य सामुदायिक भागीदारी के माध्यम से भूजल का प्रबंधन करना है।
अमृत सरोवर मिशन (Amrit Sarovar Mission): इस मिशन के तहत देश के हर जिले में कम से कम 75 अमृत सरोवरों (तालाबों) का निर्माण या पुनरुद्धार किया जा रहा है। अब तक हजारों तालाब पुनर्जीवित किए जा चुके हैं जो स्थानीय स्तर पर भूजल स्तर को सुधार रहे हैं।
मनरेगा (MGNREGA) का एकीकरण: सरकार ने ‘नेशनल इनिशिएटिव ऑन वॉटर सिक्योरिटी’ के तहत जल-तनाव वाले ब्लॉकों में मनरेगा के तहत होने वाले कार्यों का एक बड़ा हिस्सा (लगभग 65%) जल संरक्षण, तालाबों की खुदाई और कूप निर्माण पर केंद्रित करने का निर्देश दिया।
D. ‘सर्कुलर वॉटर इकोनॉमी’ (अपशिष्ट जल का पुनर्चक्रण)
इस कॉन्सेप्ट के तहत, शहरों से निकलने वाले सीवेज और गंदे पानी को साफ करके (Treat) उसे उद्योगों, पार्कों और कृषि में दोबारा इस्तेमाल किया जाता है। इससे ताजे पानी और भूजल पर निर्भरता काफी हद तक कम हो जाती है। चेन्नई और इंदौर जैसे शहरों ने इस दिशा में बेहतरीन मॉडल पेश किए हैं।
भूजल की स्थिति में लगातार सुधार
जल शक्ति मंत्रालय द्वारा जारी Dynamic Groundwater Resources Assessment, 2025 के अनुसार भारत में भूजल की स्थिति में लगातार सुधार हो रहा है। वर्ष 2025 में देश का कुल वार्षिक भूजल रिचार्ज 448.52 बिलियन क्यूबिक मीटर (BCM), उपयोग योग्य भूजल 407.75 BCM तथा कुल भूजल दोहन 247.22 BCM आंका गया है। देश में भूजल दोहन (Stage of Ground Water Extraction) 60.63% है। कुल 6762 आकलन इकाइयों में से 73.14% सुरक्षित (Safe), 11.21% अर्द्ध-गंभीर (Semi-Critical), 2.97% गंभीर (Critical), 10.8% अत्यधिक दोहन (Over-Exploited) तथा 1.88% लवणीय (Saline) श्रेणी में हैं। यह वर्गीकरण भूजल संरक्षण और प्रबंधन के लिए प्राथमिकता वाले क्षेत्रों की पहचान करने में सहायक है।
रिपोर्ट के अनुसार सरकार ने जल शक्ति अभियान, जल संचय जन भागीदारी, अटल भूजल योजना, मनरेगा, NAQUIM (राष्ट्रीय जलभृत मानचित्रण कार्यक्रम) तथा मिशन अमृत सरोवर जैसी योजनाओं के जरिए वर्षा जल संचयन, कृत्रिम भूजल रिचार्ज और सामुदायिक भागीदारी को बढ़ावा दिया है।
इन प्रयासों के परिणामस्वरूप वर्ष 2017 से 2025 के बीच देश का वार्षिक भूजल रिचार्ज 432 BCM से बढ़कर 448.52 BCM हो गया है जबकि सुरक्षित क्षेत्रों का प्रतिशत 62.6% से बढ़कर 73.14% और अत्यधिक दोहन वाले क्षेत्रों का प्रतिशत 17.2% से घटकर 10.8% रह गया है। इससे स्पष्ट होता है कि वैज्ञानिक जल प्रबंधन, जनभागीदारी और सरकारी योजनाओं के कारण भारत में भूजल संरक्षण की स्थिति धीरे-धीरे बेहतर हो रही है।
क्या भूजल पर संकट है?
क्या भारत में भूजल खत्म हो रहा है? इसका सीधा जवाब है- हां, यह बहुत तेजी से खत्म हो रहा है। लेकिन अभी भी इसे पूरी तरह नष्ट होने से बचाया जा सकता है। भूजल एक अदृश्य संसाधन है; जब तक नल से पानी आ रहा है, हमें लगता है कि सब कुछ ठीक है। लेकिन जब यह खत्म होगा तो संकट अचानक और भयावह होगा। पानी का यह संकट कोई तकनीकी समस्या नहीं है बल्कि यह हमारे प्रबंधन और व्यवहार की विफलता है।
अब समय आ गया है कि हम पानी को एक ‘अनलिमिटेड फ्री गिफ्ट’ समझने के बजाय एक ‘सीमित राष्ट्रीय संपत्ति’ समझें। प्रति बूंद अधिक फसल (More Crop Per Drop) और हर घर में जल संचयन को केवल नारा नहीं बल्कि देश के हर नागरिक की ड्यूटी बनना होगा। नहीं तो अगला विश्व युद्ध पानी के लिए होगा- यह कहावत भारत के संदर्भ में सच साबित हो सकती है।
