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चीन के साथ एलएसी पर तनाव: कैसी कूटनीतिक घेरेबंदी की है भारत ने

भारत के खिलाफ चीन कई तरह की कूटनीतिक साजिश कर रहा है। दक्षिण एशिया में खुलकर दखल के मौके तलाश रहा चीन अब भारत के बिना क्षेत्रीय मंच बनाकर दबाव की नई रणनीति पर काम शुरू किया है। हालांकि, नेपाल और अफगानिस्तान का रुख अभी इस मंच के पक्ष में नहीं है।

भारत के साथ चीन का रवैया पड़ोसी वाला नहींं। भारत को इसका मुकाबला करना होगा। विशेषज्ञों लेफ्टिनेंट जनरल (सेवानिवृत्त) एचएस पनाग (बाएं) और पी स्टॉबडन, पूर्व राजदूत (दाएं) का ऐसा मानना है।

सामरिक तैयारियों के साथ कूटनीतिक कवायद भी। चीन के साथ सीमा पर तनाव के मुद्दे पर भारत को कई देशों का समर्थन मिलने लगा है। पांच रफाल विमानों के अंबाला आने के बाद सामरिक स्तर पर वायुसेना को मजबूती मिलने की उम्मीद जताई जा रही है। थल सेना और नौसेना की ओर से तैयारियों की खबरें आई हैं। इन सामरिक तैयारियों के बीच भारत की चीन की कूटनीतिक घेरेबंदी के प्रयासों के नतीजे में दुनिया के कई देश भारत के साथ आए हैं। इस तरह के कूटनीतिक नतीजे की जरूरत महसूस की जा रही थी, क्योंकि भारत के पड़ोसी मुल्कों को अपने पाले में करने की कोशिश के तहत दक्षिण एशिया में चीन ने क्षेत्रीय मंच का शिगूफा छोड़ा है।

कौन हैं सात बड़े देश
हथियार आपूर्तिकर्ता करने वाले दुनिया के चार बड़े देशों- रूस, अमेरिका, फ्रांस, आस्ट्रेलिया, कनाडा, जापान और इजरायल से भारत राजनीतिक और कूटनीतिक स्तर पर लगातार बात कर रहा है। विदेश मंत्री एस जयशंकर ने रविवार को इजरायल के विदेश मंत्री गाबी असाकेंजी से बात की। इससे पहले रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने अपने इजरायली समकक्ष बेंजामिन गेंट से बात की थी। जयशंकर ने अमेरिकी विदेश मंत्री माइक पोम्पियो और राजनाथ सिंह ने अमेरिकी रक्षा मंत्री मार्क एस्पर से बात की थी, जबकि राष्ट्रीय रक्षा सलाहकार अजीत डोभाल ने डोनाल्ड ट्रंप प्रशासन के सलाहकार रॉबर्ट ओ ब्रायन से बात की। सीडीएस जनरल बिपिन रावत ने अमेरिकी जनरल मार्क ए मिले से बात की। फ्रांसीसी रक्षा मंत्री फ्लोरेंस पर्ले ने भारत के साथ एकजुटता का भरोसा दिया था।

चीन की चाल
भारत के खिलाफ चीन कई तरह की कूटनीतिक साजिश कर रहा है। दक्षिण एशिया में खुलकर दखल के मौके तलाश रहा चीन अब भारत के बिना क्षेत्रीय मंच बनाकर दबाव की नई रणनीति पर काम शुरू किया है। हालांकि, नेपाल और अफगानिस्तान का रुख अभी इस मंच के पक्ष में नहीं है। चीन ने कुछ दिन पहले पाकिस्तान के अलावा दक्षिण एशिया के दो अन्य देशों नेपाल और अफगानिस्तान के साथ कोविड-19 संकट के बहाने डिजीटल बैठक की थी। इस बैठक में चीन के विदेश मंत्री वांग यी ने पाकिस्तान के साथ अपनी दोस्ती की मिसाल देते हुए नेपाल और अफगानिस्तान से भी सहयोग बढ़ाने को कहा था। इसके मद्देनजर भारत ने सतर्कता बरतनी शुरू कर दी है। भारत ने बांग्लादेश, नेपाल, भूटान, श्रीलंका और अफगानिस्तान जैसे देशों में अपना राजनयिक संपर्क बढ़ाया है।

बुनियादी ढांचे के निर्माण के सवाल
‘सेंटर फॉर न्यू अमेरिकन सिक्योरिटी’ की ताजा रिपोर्ट के मुताबिक, ‘एलएसी के पास भारत जब बुनियादी ढांचा विकास की अपनी महत्त्वाकांक्षी परियोजनाएं पूरी कर लेगा तो भारतीय सैनिक रणनीतिक रूप से महत्त्वपूर्ण इलाकों में बिना किसी अड़चन से आजादी से आ-जा सकेंगे। चीन इस कवायद को रोकना चाहता है।’ रिपोर्ट के मुताबिक, ‘भारत ने लंबे समय तक बड़े पैमाने पर विकास कार्यों से दूरी बनाए रखी थी। शुरू में भारत का यह मानना था कि अगर वह सीमा की अपनी तरफ बुनियादी ढांचे का विकास करता है तो संघर्ष की स्थिति में चीनी सैनिकों को भारतीय इलाके में अतिक्रमण में सहूलियत होगी। लेकिन अब ऐसा लग रहा है कि भारत उस दलील से पीछे हट रहा है। अंतरराष्ट्रीय सीमा और वास्तविक नियंत्रण रेखा के दोनों ही तरफ बुनियादी ढांचे के विकास के लिए जो भी निर्माण कार्य हो रहे हैं, उसका प्राथमिक उद्देश्य किसी संघर्ष की स्थिति में सैनिकों और फौजी साजोसामान को सीमा तक पहुंचाना है।’

दौलत बेग ओल्डी तक सड़क

भारत ने 255 किलोमीटर लंबी ‘दरबुक-श्योक-दौलत बेग ओल्डी’ (डीएसडीबीओ) सड़क का काम पूरा कर लिया है। यह सड़क पहाड़ी इलाकों से गुजरती हुई समुद्र तल से 5000 मीटर की ऊंचाई पर लद्दाख क्षेत्र में स्थित दुनिया के सबसे ऊंचे रनवे तक जाती है। इस सड़क को लेकर ही चीनी सेना ने बवाल काटाा था, जिसके बाद 15 जून को झड़प की नौबत आई। भारत ने डीएसडीबीओ रोड समेत हाल में जो भी निर्माण किए हैं, उसे चीन के रणनीतिकार भारत की रणनीतिक बढ़त का प्रयास मानते हुए रोड़े अंटकाने में लगे हैं। दौलत बेग को जोड़ने वाली डीएसडीबीओ रोड का निर्माण कार्य पूरा होने से लद्दाख के इलाके में भारत की स्थिति मजबूत हुई है।

क्या कहते हैं जानकार

चीन की सैन्य कार्रवाई से इसकी राजनीतिक मंशा झलकती है- भारत पर अपनी इच्छा को थोपना। इसकी बलपूर्वक कूटनीति के वांछित परिणाम नहीं मिले हैं। बड़ी शक्ति के लिए नाक कटना हार के समान है। अगर भारत नरम नहीं पड़ता तो चीन के लिए सीमित युद्ध एक मजबूरी बन जाएगा।
-लेफ्टिनेंट जनरल (सेवानिवृत्त) एचएस पनाग

जिस तरह चीन अपने आक्रामक रवैए से अमेरिका, ब्रिटेन, ताइवान, आस्ट्रेलिया, वियतनाम और जापान जैसे देशों को दुश्मनी की ओर धकेल रहा है उससे साफ है कि चीन जल्द ही अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अलग-थलग पड़ जाएगा। भारत के लिए यह जरूरी है कि अपनी सामरिक-कूटनीतिक क्षमता को तेजी से बढ़ाए।
– पी स्टॉबडन, पूर्व राजदूत

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