भारत जनसंख्या विस्फोट की ओर बढ़ रहा है…पिछले कई दशकों से भारत की जनसंख्या को लेकर बार-बार एक ही चिंता दोहराई जाती रही है। लेकिन 2024 में जारी सैंपल रजिस्ट्रेशन सिस्टम (SRS) की नवीनतम रिपोर्ट इस बहस को एक नए मोड़ पर ले जाती है। रिपोर्ट के अनुसार भारत की कुल प्रजनन दर (Total Fertility Rate-TFR) घटकर 1.9 पर पहुंच गई है। यह केवल एक सांख्यिकीय बदलाव नहीं बल्कि भारतीय समाज, अर्थव्यवस्था, परिवार संरचना और भविष्य की जनसंख्या संरचना में आ रहे गहरे परिवर्तन का संकेत है।

1971 में भारत की कुल प्रजनन दर 5.2 थी। इसका मतलब था कि औसतन एक भारतीय महिला अपने जीवनकाल में पांच से ज्यादा बच्चों को जन्म देती थी। आज यह संख्या 1.9 रह गई है। पांच दशकों में यह गिरावट भारत के जनसांख्यिकीय इतिहास की सबसे बड़ी घटनाओं में से एक है। SRS की रिपोर्ट में कई अलग-अलग पहलुओं पर जानकारी दी गई है। लेकिन इससे पहले यह जानना जरूरी है कि आखिर टीएफआर होती क्या है, इसके मायने क्या हैं और क्यों इसका कम होना देश मे चिंता की एक बड़ी वजह है।

यह बदलाव अचानक नहीं आया। 1967 में शुरू हुए परिवार नियोजन अभियान और बाद में लोकप्रिय हुए ‘बच्चे दो ही अच्छे’ संदेश ने छोटे परिवार की अवधारणा को बढ़ावा दिया। इसके साथ ही महिलाओं की शिक्षा, शहरीकरण, स्वास्थ्य सेवाओं तक बढ़ती पहुंच और बदलती सामाजिक-आर्थिक परिस्थितियों ने भी परिवार के आकार को प्रभावित किया।

रिपोर्ट बताती है कि यह गिरावट केवल शहरों तक सीमित नहीं है बल्कि ग्रामीण भारत में भी समान रूप से दिखाई दे रही है। हालांकि बिहार और उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों में प्रजनन दर अभी भी राष्ट्रीय औसत से ज्यादा है लेकिन वहां भी गिरावट का रुझान जारी है। विशेषज्ञों का मानना है कि भारत अब जनसांख्यिकीय संक्रमण (Demographic Transition) के उस दौर में पहुंच चुका है जहां घटती जन्म दर आने वाले वर्षों में देश की अर्थव्यवस्था, श्रमबल और बुजुर्ग आबादी की संरचना पर महत्वपूर्ण प्रभाव डालेगी।

TFR क्या है और 2.1 का आंकड़ा इतना महत्वपूर्ण क्यों है?

कुल प्रजनन दर (TFR) यह बताती है कि अगर वर्तमान आयु-विशिष्ट जन्म दरें बनी रहें तो एक महिला अपने पूरे प्रजनन काल (15-49 वर्ष) में औसतन कितने बच्चों को जन्म देगी।

जनसंख्या विज्ञान में 2.1 की प्रजनन दर (TFR) को ‘रिप्लेसमेंट लेवल’ कहा जाता है। इसका मतलब है कि औसतन हर महिला लगभग इतने बच्चे पैदा करे कि अगली पीढ़ी की आबादी मौजूदा पीढ़ी की जगह ले सके। अगर किसी देश की TFR लंबे समय तक 2.1 से कम रहती है तो धीरे-धीरे जनसंख्या वृद्धि की रफ्तार कम हो जाती है और भविष्य में आबादी स्थिर होने या घटने लगती है।

भारत की TFR अब 1.9 है यानी देश राष्ट्रीय स्तर पर प्रतिस्थापन स्तर से नीचे पहुंच चुका है। यह स्थिति यूरोप, जापान, दक्षिण कोरिया और चीन जैसे देशों में पहले देखी जा चुकी है। हालांकि भारत की परिस्थितियां उनसे अलग हैं।

ताजा आंकड़े बताते हैं कि प्रजनन दर (फर्टिलिटी) में आई गिरावट ना तो हाल की घटना है और न ही कोई अलग-थलग प्रवृत्ति। पिछले एक दशक में राष्ट्रीय प्रजनन दर लगातार घटती रही है। यह 2012-14 के दौरान 2.3 से घटकर 2022-24 के दौरान 1.9 पर आ गई है जो लगभग 17.4 प्रतिशत की कमी को दिखाती है।

यह रुझान केवल किसी एक क्षेत्र तक सीमित नहीं है बल्कि ग्रामीण और शहरी दोनों भारत में स्पष्ट रूप से दिखाई देता है। इससे यह संकेत मिलता है कि देश में जनसांख्यिकीय परिवर्तन (Demographic Transition) व्यापक स्तर पर और लगातार हो रहा है।

सरल भाषा में समझें तो भारत में परिवारों का आकार धीरे-धीरे छोटा हो रहा है। लोग पहले की तुलना में कम बच्चे पैदा कर रहे हैं और यह बदलाव पूरे देश में, चाहे गांव हों या शहर- लगभग समान रूप से देखने को मिल रहा है। यह भारत के जनसंख्या ढांचे में हो रहे दीर्घकालिक बदलाव का बड़ा संकेत है।

India Fertility Rate
भारत में प्रजनन दर घटी है (Image Source: Generated by AI)

1971 से 2024: एक बड़ा बदलाव

भारत के जनसांख्यिकीय संकेतकों में पिछले पांच दशकों में बड़ा सुधार हुआ है।
-जन्म दर 36.9 से घटकर 18.3 प्रति हजार जनसंख्या हो गई।
-मृत्यु दर 14.9 से घटकर 6.4 प्रति हजार रह गई।
-शिशु मृत्यु दर 129 से घटकर 24 प्रति हजार जीवित जन्म हो गई।
-कुल प्रजनन दर 5.2 से घटकर 1.9 पर पहुंच गई।

इन आंकड़ों से स्पष्ट है कि भारत ने स्वास्थ्य सेवाओं, टीकाकरण, मातृ एवं शिशु स्वास्थ्य, शिक्षा और जीवन स्तर में व्यापक प्रगति की है।

बिहार सबसे ऊपर, दिल्ली सबसे नीचे

प्रजनन दर का राष्ट्रीय औसत 1.9 है लेकिन राज्यों के बीच बड़ा अंतर बना हुआ है। सबसे ज्यादा प्रजनन दर बिहार में है जबकि राजधानी दिल्ली सबसे नीचे बनी हुई है। बिहार देश का एकमात्र बड़ा राज्य है जहां TFR (2.9) है यानी प्रजनन दर अभी भी काफी ऊंची बनी हुई है। यह राष्ट्रीय औसत से लगभग 53 प्रतिशत ज्यादा है।

दिल्ली में प्रजनन दर देश में सबसे कम दर्ज की गई है। यहां औसतन एक महिला केवल 1.2 बच्चों को जन्म दे रही है।

किन राज्यों में प्रजनन दर सबसे कम है?

रिपोर्ट के अनुसार कई राज्य प्रतिस्थापन स्तर (Replacement Level) से काफी नीचे पहुंच चुके हैं:

दिल्ली – 1.2
केरल – 1.3
तमिलनाडु – 1.3
महाराष्ट्र – 1.4
आंध्र प्रदेश – 1.4
जम्मू-कश्मीर – 1.4
पंजाब – 1.4
कर्नाटक – 1.5
तेलंगाना – 1.5
हिमाचल प्रदेश – 1.5

इन राज्यों में छोटे परिवार अब सामाजिक स्टैंडर्ड बन चुके हैं।

Total Fertility Rate India 2024
नई रिपोर्ट बताती है कि देश की प्रजनन दर ऐतिहासिक रूप से सबसे निचले स्तर पर पहुंच गई है। (Image Source: Generated by AI)

ग्रामीण और शहरी भारत की दो तस्वीरें

भारत में प्रजनन दर का सबसे बड़ा विभाजन ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों के बीच दिखाई देता है।

ग्रामीण भारत की TFR – 2.1
शहरी भारत की TFR – 1.5

शहरों में रहने वाले परिवार कम बच्चे पैदा कर रहे हैं। इसके पीछे कई कारण हैं:
-उच्च शिक्षा
-महिलाओं की रोजगार में बढ़ती भागीदारी
-आवास और जीवनयापन की बढ़ती लागत
-देर से विवाह
-परिवार नियोजन की बेहतर पहुंच

ग्रामीण क्षेत्रों में भी गिरावट जारी है लेकिन शहरी क्षेत्रों की तुलना में गति अपेक्षाकृत धीमी है।

India Fertility Rate women
गांव हो या शहर, पूरे भारत में घट रही है प्रजनन दर (Image Source: Generated by AI)

शिक्षा: प्रजनन दर घटाने वाला सबसे बड़ा कारक

रिपोर्ट का सबसे दिलचस्प निष्कर्ष महिलाओं की शिक्षा और प्रजनन दर के बीच संबंध है।

अशिक्षित महिलाओं की TFR – 3.2
स्नातक और उससे ज्यादा शिक्षित महिलाओं की TFR – 1.6

यह अंतर दिखाता है कि शिक्षा परिवार के आकार को प्रभावित करने वाला सबसे महत्वपूर्ण कारकों में से एक है।

शिक्षित महिलाओं में विवाह की आयु अधिक होती है, रोजगार की संभावना बढ़ती है। इसके अलावा पढ़ी-लिखी महिलाएं स्वास्थ्य संबंधी जागरूकता अधिक होती है और परिवार नियोजन के साधनों का इस्तेमाल ज्यादा होता है।

भारत की जनसंख्या बढ़ना बंद हो जाएगी?

इस सवाल का जवाब ‘तुरंत नहीं’ है। हालांकि TFR 2.1 से नीचे आ चुकी है लेकिन भारत की आबादी अभी कुछ दशकों तक बढ़ती रहेगी। इसका कारण ‘Population Momentum’ है।

भारत में अभी भी बड़ी संख्या में युवा लोग प्रजनन आयु वर्ग में प्रवेश कर रहे हैं। इसलिए कम प्रजनन दर के बावजूद कुल जन्मों की संख्या कुछ समय तक अधिक बनी रह सकती है। लेकिन लंबी अवधि में जनसंख्या वृद्धि की रफ्तार काफी धीमी होने की संभावना है।

शिशु मृत्यु दर में सुधार

रिपोर्ट के अनुसार भारत की शिशु मृत्यु दर (IMR) 24 प्रति हजार जीवित जन्म है। 2019 में यह 30 थी। पांच सालों में छह अंकों की गिरावट दर्ज हुई है। इसका मतलब है कि बच्चों के जीवित रहने की संभावना पहले की तुलना में काफी बेहतर हुई है।

राज्यों की स्थिति:
सर्वाधिक IMR – छत्तीसगढ़ (36)
न्यूनतम IMR – केरल (8)

केरल स्वास्थ्य क्षेत्र में देश के लिए एक मॉडल बना हुआ है।

2024 में भारत और प्रमुख राज्यों/केंद्रशासित प्रदेशों की कुल प्रजनन दर (TFR): ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों की तुलना

राज्यकुलग्रामीणशहरी
भारत1.92.11.5
बिहार2.932.3
उत्तर प्रदेश2.62.72.1
मध्य प्रदेश2.42.61.8
राजस्थान2.32.42.1
दिल्ली1.21.31.2
केरल1.31.31.4
तमिलनाडु1.31.31.3

स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुंच में बड़ा सुधार

रिपोर्ट के अनुसार, 95.4 प्रतिशत प्रसव अस्पतालों या प्रशिक्षित चिकित्सा सहायता के साथ हुए। अधिकांश महिलाओं को संस्थागत प्रसव की सुविधा मिली।

यह भारत के स्वास्थ्य ढांचे में आए परिवर्तन का बड़ा संकेतक है। हालांकि मृत्यु से पहले चिकित्सा सहायता पाने वालों का अनुपात अभी भी केवल 40.2 प्रतिशत है जो स्वास्थ्य सेवाओं की पहुंच में मौजूद चुनौतियों की ओर संकेत करता है।

जन्म के समय लिंगानुपात में क्या स्थिति है?

2022-24 के दौरान भारत का जन्म के समय लिंगानुपात 918 रहा यानी 1000 लड़कों पर 918 लड़कियों का जन्म हुआ। यह आंकड़ा पिछले वर्षों की तुलना में मामूली सुधार दिखाता है लेकिन अभी भी संतुलित लिंगानुपात से दूर है।

सर्वाधिक लिंगानुपात: छत्तीसगढ़ (978)
दूसरा: केरल (974)

क्या भारत वृद्ध समाज बनने की ओर बढ़ रहा है?

रिपोर्ट के आंकड़े बताते हैं:
0-14 वर्ष आयु वर्ग: 24%
15-59 वर्ष आयु वर्ग: 66.4%
60 वर्ष से अधिक: 9.7%

वर्तमान में भारत अभी भी युवा देश है। लेकिन कम प्रजनन दर का मतलब है कि आने वाले दशकों में बुजुर्ग आबादी का हिस्सा तेजी से बढ़ेगा।

यही स्थिति आज जापान, इटली, जर्मनी और दक्षिण कोरिया में देखी जा रही है जहां कम जन्म दर के कारण काम करने वाला आयु वर्ग सिकुड़ रहा है।

जनसंख्या विस्फोट की बहस अब पुरानी

लेटेस्ट आंकड़े बताते हैं कि भारत अब उस चरण में प्रवेश कर चुका है जहां चिंता का केंद्र ‘जनसंख्या विस्फोट’ नहीं बल्कि ‘जनसंख्या संतुलन’ बनता जा रहा है।

नीतिगत स्तर पर अब सवाल बदल रहे हैं। और अब नए सवाल हैं कि क्या पर्याप्त युवा वर्क फोर्स उपलब्ध रहेगी? क्या वृद्ध आबादी के लिए सामाजिक सुरक्षा व्यवस्था तैयार है? क्या स्वास्थ्य प्रणाली उम्रदराज समाज का भार संभाल पाएगी? क्या कम जन्म दर आर्थिक विकास को प्रभावित करेगी?

बढ़ती आबादी की चुनौती खत्म

SRS 2024 की रिपोर्ट केवल यह नहीं बताती कि भारत की प्रजनन दर 5.2 से घटकर 1.9 हो गई है। यह रिपोर्ट उस परिवर्तन की कहानी है जिसमें बड़ा परिवार अपवाद बनता जा रहा है, महिलाएं अधिक शिक्षित हो रही हैं, बच्चों के जीवित रहने की संभावना बढ़ी है और समाज जनसंख्या वृद्धि के नए चरण में प्रवेश कर रहा है।

एक समय था जब भारत की सबसे बड़ी चुनौती तेजी से बढ़ती आबादी मानी जाती थी। आज तस्वीर बदल चुकी है। अब चुनौती यह सुनिश्चित करने की है कि कम होती प्रजनन दर, बढ़ती आयु और बदलती जनसंख्या संरचना के बीच आर्थिक विकास और सामाजिक संतुलन कैसे बनाए रखा जाए। भारत की जनसांख्यिकीय कहानी का अगला अध्याय शायद जनसंख्या बढ़ाने का नहीं बल्कि जनसंख्या को संतुलित रखने का होगा।