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LAC विवाद: ‘पैंगॉन्ग से नहीं हटी भारतीय सेना तो सर्दी भर PLA वहां डटी रहेगी, देखते हैं कौन-किसे मात देता है’, चीनी मीडिया की गीदड़ भभकी

ग्लोबल टाइम्स के ताजा लेख में भारत चीन मुद्दे पर लिखा गया है कि "यदि भारत शांति चाहता है तो भारत और चीन को 7 नवंबर 1959 की एलएसी को लागू करना चाहिए।

india china tension indian army pla global timesसीमा पर भारत और चीन के बीच स्थिति अभी भी तनावपूर्ण बनी हुई है। (AP/फाइल फोटो)

भारत चीन के बीच जारी सीमा विवाद को लेकर चीन के सरकारी मीडिया ने एक बार फिर गीदड़भभकी दिखाते हुए भारत को धमकी दी है। ग्लोबल टाइम्स के ताजा लेख में भारत चीन मुद्दे पर लिखा गया है कि “यदि भारत शांति चाहता है तो भारत और चीन को 7 नवंबर 1959 की एलएसी को लागू करना चाहिए। यदि भारत युद्ध चाहता है तो फिर चीन इसके लिए भी तैयार है। देखते हैं कि कौन सा देश दूसरे को मात देता है?”

वहीं ग्लोबल टाइम्स के संपादक हू जिजिन ने एक ट्वीट कर लिखा है कि ‘यदि भारतीय सैनिक पैंगोंग झील के दक्षिणी तट से पीछे नहीं हटते हैं तो पीएलए पूरी सर्दियों तक वहीं जमी रहेगी। भारत की लॉजिस्टिक सपोर्ट कमजोर है। कई भारतीय सैनिक ठंड के कारण या फिर कोरोना के कारण मर जाएंगे। यदि युद्ध हुआ तो भारतीय सेना की जल्द ही हार हो जाएगी।’

लेख के अनुसार, चीन को कूटनीतिक स्तर पर भारत की बात सुननी ही नहीं चाहिए बल्कि उसकी कार्रवाई पर भी नजर रखनी चाहिए। भारत 7 नवंबर 1959 की एलएसी को नहीं मानता है और अभी भी 1962 की हार का बोझ उठाए हुए है। चीन को युद्ध के लिए पूरी तरह से तैयार रहना चाहिए और जैसे ही राजनयिक स्तर की बातचीत असफल होती है तो हमारी सेना को जवाब देने के लिए तैयार रहना चाहिए।

लेख में ये भी लिखा गया है कि चीन की जीडीपी भारत से पांच गुना बड़ी है और चीन का डिफेंस बजट भी भारत के डिफेंस बजट से दो या तीन गुना बड़ा है। इसलिए भारत को अपनी लिमिट का पता होना चाहिए, यह अंडे से पत्थर को निशाना बनाने जैसा है।

ग्लोबल टाइम्स के मुताबिक जहां विवाद चल रहा है, वो एक पहाड़ी इलाका है और दोनों ही पक्षों के लिए वहां बड़ी संख्या में सेना की तैनाती करना काफी मुश्किल होगा। इसलिए यहां ताकत और इच्छाशक्ति की परीक्षा होगी। भारतीय सेना की लॉजिस्टिक सपोर्ट का पीएलए से कोई मुकाबला ही नहीं है, इसलिए कई भारतीय सैनिक ठंड और मुश्किल मौसम के चलते परेशान होंगे।

‘भारत का चीन के सामने आत्मविश्वास कमजोर रहा है और ना ही उसके पास इतनी ताकत है। यदि भारत के कट्टरपंथी राष्ट्रवादी नहीं माने तो उन्हें इसकी भारी कीमत चुकानी होगी।’

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