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दक्षिण चीन सागर पर भारत-चीन में तकरार

चीन ने क्षेत्र से ‘बाहर’ के देशों को चेताया कि वे दक्षिण चीन सागर मुद्दे पर ‘दखलअंदाजी’ नहीं करें और कहा कि ‘शक्ति प्रदर्शन’ क्षेत्रीय सुरक्षा के लिए अच्छा नहीं होगा..

Author नई दिल्ली | December 20, 2015 2:52 AM
दक्षिणी चीन सागर (फाइल फोटो)

चीन ने क्षेत्र से ‘बाहर’ के देशों को चेताया कि वे दक्षिण चीन सागर मुद्दे पर ‘दखलअंदाजी’ नहीं करें और कहा कि ‘शक्ति प्रदर्शन’ क्षेत्रीय सुरक्षा के लिए अच्छा नहीं होगा। भारत में चीन के राजदूत ले युचेंग ने शनिवार को अमेरिका और भारत को वस्तुत: संदेश देते हुए यहां कहा कि उन देशों को इन मुद्दों पर दखलअंदाजी नहीं करनी चाहिए जो क्षेत्र से बाहर के हैं या जिनका क्षेत्र से सरोकार नहीं है। उन्होंने यह बात एशिया प्रशांत के संदर्भ में भारत और बड़ी ताकतों के बीच संवाद पर आयोजित डेक्कन हेराल्ड के एक कार्यक्रम में कही।

भाजपा नेता राम माधव ने चीनी राजदूत की इस चेतावनी का तीखा प्रतिकार किया। उन्होंने यह कहते हुए नौवहन की स्वतंत्रता की वकालत की कि जिस तरह हिंद महासागर भारत का नहीं है और दुनिया के दूसरे देश इसकी साझेदारी करते हैं, उसी तरह का मामला दक्षिण चीन सागर का भी है। उन्होंने कहा कि जिस तरह चीन ने इस सदी में वैश्विक अर्थव्यवस्था को आगे बढ़ाया है, उसी तरह उसे क्षेत्र में शांति को बढ़ावा देना चाहिए। माधव ने कहा कि क्षेत्र को एशिया-प्रशांत के बजाय हिंद-प्रशांत (इंडो-पैसिफिक) कहना चाहिए क्योंकि यह व्यापक संदर्भ है। दक्षिण चीन सागर में नौवहन की आजादी की वकालत करते हुए भारत ने विवाद के शांतिपूर्ण समाधान का पक्ष लिया है और कहा कि हाइड्रोकार्बन से मालामाल सागर में उसके आर्थिक हित हैं।

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चीनी राजदूत ने स्प्राटली द्वीप समूह पर भी चीनी दावा दोहराया। यह द्वीपसमूह दक्षिण चीन सागर में विवाद का मुख्य बिंदु है। उन्होंने कहा कि दूसरे विश्वयुद्ध के बाद द्वीपसमूह को जापान से फिर से हासिल किया गया था और 1970 तक इस पर कोई दावेदार नहीं था। उन्होंने कहा कि दूसरे विश्वयुद्ध के बाद चीन ने जापानी कब्जे से द्वीपसमूह को हासिल किया। दूसरे विश्व युद्ध के बाद के लंबे समय तक किसी ने इन द्वीपसमूहों पर चीनी दावे को चुनौती नहीं दी। चीनी राजदूत ने कहा…ऐसे देश जो क्षेत्र के नहीं हैं और जो अपनी शक्ति दिखाते हैं, यह क्षेत्रीय सुरक्षा के लिए ठीक नहीं है। ले ने कहा कि चीन वार्ता के लिए तैयार है और उसने आसियान देशों के ‘दक्षिणी चीन सागर में बर्ताव की घोषणा’ पर पहले ही दस्तखत कर चुका है जिसमें मुद्दे के शांतिपूर्ण हल के लिए शर्तें तय की गई हैं।

डेक्कन हेराल्ड के प्रधान संपादक तिलक कुमार ने कहा कि इस सदी का ज्यादा सटीक उल्लेख ‘एशिया प्रशांत सदी’ होगा क्योंकि प्रशांत महासागर से लगे अन्य देश हैं जिनका आने वाले दशक में सभी क्षेत्रों में दुनिया पर असर होगा। उन्होंने कहा कि एक आर्थिक, सैन्य और प्रौद्योगिकी ताकत के रूप में अमेरिकी वर्चस्व निकट भविष्य में जारी रहेगा। चीन और भारत के अलावा प्रशांत तट पर अन्य देश हैं जो अलग अलग तरीके से अहम हैं। जापान दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी ताकत है। राम माधव ने भारत और चीन के बीच के रिश्तों को कई मुद्दों के कारण ‘मजबूत लेकिन मुश्किल’ करार दिया लेकिन साथ ही कहा कि दोनों देशों का नेतृत्व अतीत और वर्तमान में इसे सुधारने के लिए काम करता रहा है।

ले ने कहा कि चीन और भारत को एक ऐसे समय में एशिया प्रशांत क्षेत्र में एक अनूठी भूमिका निभाना है जब दुनिया सुस्त विश्व अर्थव्यवस्था से गुजर रही है। दोनों देशों के बीच ज्यादा संवाद पर जोर देते हुए चीनी राजदूत ने कहा कि दोनों देश इतिहास और संस्कृति से जुड़े हैं। हमारा विकास दुनिया के लिए मायने रखता है। हमारे सहयोग से फर्क आता है। उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के ‘मेक इन इंडिया पहल’ की सराहना करते हुए कहा कि यह व्यापार और उद्योगों के लिए चुंबक बनेगा।

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