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बंदूकों संग लाशें जम चुकी थीं, हम खींच रहे थे तो शरीर के जमे हिस्से भी बाहर आ गए थे- 1962 की जंग लड़ने वाले सैनिक बोले- सर्दियों में हुई जंग तो बढ़ेगी चुनौती

फुंचुक अंगदोस का कहना है कि जिस इलाके में उनकी यूनिट ने लड़ाई लड़ी थी, वहां अक्टूबर के माह में ही इतनी सर्दी हो जाती है कि सब जम जाता है। उस तापमान में हमारे जवानों के लिए काफी मुश्किल होती है।

india china warभारत चीन के बीच युद्ध हुआ तो सर्दियों में होगी बेहद मुश्किल। (एक्सप्रेस फोटो)

भारत चीन के बीच सीमा पर बीते करीब पांच माह से तनाव के हालात हैं। सैन्य और कूटनीतिक स्तर पर बातचीत के कई दौर हो चुके हैं लेकिन अभी भी सीमा पर तनाव की स्थिति बनी हुई है। जिस तरह से दोनों तरफ की सेनाओं ने हथियारों और टैंकों की तैनाती सीमा पर की है, उसे देखते हुए युद्ध की आशंका से भी इंकार नहीं किया जा रहा है। लेकिन लद्दाख की सर्दियों को देखते हुए वहां लड़ना सैनिकों के लिए बिल्कुल भी आसान नहीं होगा।

1962 के भारत चीन युद्ध में शामिल हुए सैनिकों का कहना है कि जिस इलाके में तनाव है, वहां इतनी भयंकर सर्दी पड़ती है कि वहां ठंड के कारण हाथों में जख्म हो जाते हैं। दैनिक भास्कर की एक रिपोर्ट के अनुसार, 1962 की लड़ाई में शामिल रहे रिटायर्ड हवलदार फुंचुक अंगदोस और सेरिंग तोशी ने बताया कि लड़ाई के बाद जब शहीद हुए सैनिकों के शव लेने के लिए गए थे तो शव हथियार के साथ जम चुके थे और जब हम हथियार खींचते तो उनके साथ शरीर के टुकड़े भी निकल आते थे।

फुंचुक अंगदोस का कहना है कि जिस इलाके में उनकी यूनिट ने लड़ाई लड़ी थी, वहां अक्टूबर के माह में ही इतनी सर्दी हो जाती है कि सब जम जाता है। उस तापमान में हमारे जवानों के लिए काफी मुश्किल होती है। उनके हाथ जम जाते हैं और चलना भी मुश्किल हो जाता है।

हालांकि वह ये भी मानते हैं कि 1962 की लड़ाई में हमारे पास आधुनिक हथियार नहीं थे, जबकि चीन के पास ऑटोमैटिक हथियार थे। अब तो हमारी सेना काफी मजबूत हो चुकी है और इस बार युद्ध हुआ तो हम ही जीतेंगे।

रिटायर्ड हवलदार सेरिंग ताशी बताते हैं कि 1962 की लड़ाई में उन्हें जाट यूनिट के साथ रखा गया था क्योंकि वह इस इलाके से परिचित थे। सेरिंग बताते हैं कि जाट यूनिट के जो जवान वहां लड़ने आए थे, उन्हें ठंड के कारण काफी परेशानी उठानी पड़ी और ठंड के चलते उनके हाथ भी गलना शुरू हो गए थे, जिसके कारण उन सैनिकों को हाथ से खाना खिलाना पड़ता था। इन पूर्व सैनिकों का कहना है कि चीन पर भरोसा करना ठीक नहीं है।

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