अमेरिका के लिए कचरे का डब्बा बना भारत, लाखों टन खतरनाक पेट्रोकोक कर रहा निर्यात India become dustbin for US, exporting huge amount of petrocoke - Jansatta
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अमेरिका के लिए कचरे का डब्बा बना भारत, लाखों टन खतरनाक पेट्रोकोक कर रहा निर्यात

पेट्रोकोक में कोयले की तुलना में सात गुना और डीजल की तुलना में 1380 गुना ज्यादा सल्फर पाया गया है।

Author नई दिल्ली | December 2, 2017 1:44 PM
दिल्ली के लोग जहरीले स्मॉग के बीच अपनी जिंदगी जी रहे हैं।

देश की राजधानी दिल्ली में गंभीर वायु प्रदूषण के लिए अमेरिका भी जिम्मेदार हो सकता है। अमेरिकी कंपनियां आवोहवा के लिए बेहद खतरनाक पेट्रोकोक या पेट्रोलियम कोक का निर्यात करती हैं। इसमें कार्बन और सल्फर की मात्रा खतरनाक स्तर तक ज्यादा होती है। इससे फेफड़ों को काफी नुकसान पहुंचता है। कनाडाई कोलतार या टार सैंड्स क्रूड को रिफाइन करने के बाद बचे पेट्रोकोक का भारत में निर्यात कर दिया जाता है। अक्टूबर-नवंबर में दिल्ली में वायु प्रदूषण की स्थिति बहुत खराब हो गई थी। यहां तक कि कई विदेशी राजनयिकों को दिल्ली से बाहर जाना पड़ा था। वायु प्रदूषण के कारण होने वाली बीमारियों के चलते भारत में सालाना 11 लाख लोगों की असमय मौत हो जाती है।

पेट्रोकोक में कार्बन और सल्फर की ज्यादा मात्रा होने के चलते अमेरिका में इसका इस्तेमाल बेहद कम होता है। सख्त प्रावधानों के कारण भी कंपनियां इसका प्रयोग करने से बचती हैं। इसके चलते इसका निर्यात किया जाता है। एनर्जी की कमी से जूझ रहा भारत इसके प्रमुख बाजारों में से एक है। अमेरिका में उत्पादित कुल पेट्रोकोक में से एक चौथाई का भारत आयात करता है। वर्ष 2016 में अमेरिका ने भारत को 80 मिलियन मीट्रिक टन पेट्रोकोक निर्यात किया था। साल 2010 की तुलना में यह 20 गुना अधिक है। यह मात्रा इतनी है कि ऐतिहासिक एंपायर स्टेट बिल्डिंग को आठ बार भरा जा सकता है।

फैक्टरियों द्वारा पेट्रोकोक के अंधाधुंध इस्तेमाल से पहले से ही वायु प्रदूषण की समस्या से जूझ रहे भारत की स्थिति और गंभीर हो गई है। हालांकि, अभी यह तय नहीं है कि पिछले महीने दिल्ली में पैदा संकट में पेट्रोकोक की कितनी हिस्सेदारी थी, लेकिन विशेषज्ञ इसे भी जिम्मेदार ठहरा रहे हैं। नई दिल्ली में इस्तेमाल किए जा रहे पेट्रोकोक की जांच में खतरनाक परिणाम सामने आए हैं। इसमें कोयले की तुलना में सात गुना और डीजल की तुलना में 1380 गुना ज्यादा सल्फर पाया गया है। कोर्ट द्वारा नियुक्त एनवायरमेंटल पॉल्यूशन कंट्रोल अथॉरिटी की पड़ताल में यह बात सामने आई है।

कोयले की तुलना में ज्यादा सस्ता और ज्यादा ऊर्जा देने के कारण भारतीय औद्योगिक इकाइयों में इसके इस्तेमाल का चलन बढ़ा है। इसके अलावा आयात शुल्क कम होने की वजह से भी इसे बढ़ावा मिल रहा है। स्वास्थ्य और पर्यावरण पर प्रतिकूल प्रभावों के चलते अमेरिकी कंपनियां इसका ज्यादा इस्तेमाल नहीं करती हैं। अमेरिका पेट्रोकोक का सबसे बड़ा उत्पादक और निर्यातक देश है। सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरमेंट की सुनीता नारायण ने कहा कि भारत इसे ज्यादा नहीं झेल सकता है, यहां के लोग पहले से ही वायु प्रदूषण से परेशान हैं।

 

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