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बढ़ता तापमान : पिघलेंगे ग्लेशियर

गंगोत्री का सहायक ग्लेशियर चतुरंगी तेजी से पिघल रहा है। गंगोत्री गंगा के जल का मुख्य स्रोत है, जिसके सहायक ग्लेशियरों के पिघलने का असर गंगा नदी के प्रवाह पर पड़ सकता है। अध्ययनकर्ताओं का कहना है कि करीब 27 साल में चतुरंगी ग्लेशियर की सीमा करीब 1172 मीटर से अधिक सिकुड़ गई है। इस कारण चतुरंगी ग्लेशियर के कुल क्षेत्र में 0.626 वर्ग किलोमीटर की कमी आई है और 0.139 घन किलोमीटर बर्फ कम हो गई है।

Author Published on: March 5, 2019 7:02 AM
प्रतीकात्मक तस्वीर

हिमालय के हिंदुकुश क्षेत्र के तापमान में 2.1 डिग्री सेल्सियस तक बढ़ोतरी हो सकती है। इसके कारण इस क्षेत्र में स्थित एक-तिहाई ग्लेशियर पिघल सकते हैं। ग्लोबल वार्मिंग कम करने से जुड़े पेरिस समझौते के अनुसार वैश्विक तापमान वृद्धि को 1.5 डिग्री तक रोकने में सफलता मिलने के बावजूद यह चुनौती सामने है। जलवायु परिवर्तन रोकने के प्रयास विफल होते हैं तो स्थिति अधिक गंभीर हो सकती है। ऐसे में तापमान पांच डिग्री तक बढ़ सकता है और हिंदुकुश क्षेत्र के दो-तिहाई ग्लेशियर पिघल सकते हैं। इंटरनेशनल सेंटर फॉर इंटीग्रेटेड माउंटेन डेवलपमेंट (आइसीआइएमओडी) की ओर से किए गए अध्ययन में ये बातें सामने आई हैं। भारत समेत 22 देशों के 350 से अधिक वैज्ञानिकों ने यह अध्ययन किया है। काठमांडू में रिपोर्ट जारी की गई है।

पर्वतीय क्षेत्रों में रहने वाले लगभग 25 करोड़ लोगों के साथ-साथ निचले भागों में स्थित (भारत और इसके आसपास के देशों) की नदी घाटियों की करीब 1.65 अरब आबादी के लिए ये ग्लेशियर महत्त्वपूर्ण जल स्रोत माने जाते हैं। ग्लेशियरों के पिघलने से इस क्षेत्र में जल संकट गंभीर हो सकता है। आइसीआइएमओडी से जुड़े प्रमुख शोधकर्ता फिलिप वेस्टर के मुताबिक, ‘यह क्षेत्र पहले ही दुनिया के सबसे कमजोर और आपदाओं के प्रति संवेदनशील पर्वतीय क्षेत्रों में से एक माना जाता है। यहां ग्लेशियरों के पिघलने से वायु प्रदूषण से लेकर चरम मौसमी की घटनाओं में वृद्धि हो सकती है। मानसून पूर्व नदियों के प्रवाह में कमी और मानसून में बदलाव के कारण शहरी जल प्रणाली, खाद्य एवं ऊर्जा उत्पादन भी बड़े पैमाने पर प्रभावित हो सकता है।’

आइसीआइएमओडी द्वारा जारी दस्तावेज में बताया गया है, ‘इस पर्वतीय क्षेत्र का गठन करीब सात करोड़ वर्ष पूर्व हुआ है और यहां मौजूद ग्लेशियर बदलती जलवायु के प्रति बेहद संवेदनशील हैं। पिछले करीब पांच दशकों से यहां पाई जाने वाली बर्फ का दायरा लगातार सिकुड़ रहा है, बर्फ का द्रव्यमान पतला हुआ है और बर्फ की मात्रा में भी कमी आई है। इन परिवर्तनों का प्रभाव पूरे क्षेत्र में देखा गया है।’

ग्लेशियरों के पिघलने से हिमनदों से बनी झीलों का आकार और उनकी संख्या में बढ़ोतरी हो सकती है और इन झीलों के ढहने से भयानक बाढ़ की स्थिति पैदा हो सकती है। हिंदुकुश में बर्फ पिघलने से गंगा, सिंधु और ब्रह्मपुत्र जैसी नदी घाटियों में खेती तबाह हो सकती है। दुनिया के सबसे प्रदूषित क्षेत्रों में शामिल गंगा के मैदान से निकलने वाले वायु प्रदूषकों से ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन बढ़ रहा है। इन प्रदूषकों से निकलने वाला कार्बन और सूक्ष्म कण ग्लेशियरों पर जमा हो जाते हैं, जो ग्लेशियरों के पिघलने, मानसून के प्रसार और वितरण को प्रभावित करते हैं।

अध्ययनकर्ताओं का कहना है कि इन परिवर्तनों का सबसे अधिक असर इस क्षेत्र के गरीबों पर पड़ेगा। हिंदुकुश हिमालय क्षेत्र की 25 करोड़ की आबादी में से एक तिहाई लोगों की दैनिक आमदनी करीब 136 रुपए है। इस क्षेत्र की 30 फीसद से अधिक आबादी के पास पर्याप्त भोजन नहीं है और लगभग 50 फीसद लोग कुपोषण के किसी न किसी रूप का सामना कर रहे हैं, जिससे महिलाएं और बच्चे सबसे अधिक पीड़ित हैं। रिपोर्ट बताती है कि इस क्षेत्र के संसाधनों, जैसे- जल विद्युत क्षमता का बेहतर उपयोग करके लोगों की आय में सुधार किया जा सकता है।

अल्मोड़ा के जीबी पंत राष्ट्रीय हिमालयी पर्यावरण एवं सतत विकास संस्थान और बेंगलुरु स्थित भारतीय विश्व संस्थान के वैज्ञानिकों द्वारा किए गए अध्ययन में वर्ष 1989 से 2016 तक के उपग्रह से प्राप्त आंकड़ों और काइनेमैटिक जीपीएस (एक उपग्रह नेविगेशन तकनीक) का उपयोग किया गया है। इस अध्ययन से जुड़े जीबी पंत राष्ट्रीय संस्थान के शोधकर्ता किरीट कुमार ने बताया, ‘चतुरंगी ग्लेशियर वर्ष 1989 तक गंगोत्री ग्लेशियर का हिस्सा रहा है। जलवायु परिवर्तन के कारण यह ग्लेशियर प्रतिवर्ष 22.84 मीटर की दर से सिकुड़ रहा है और गंगोत्री ग्लेशियर से काफी पहले ही कट चुका है।’ ग्लेशियरों के पिघलने की दर में बदलाव के लिए जलवायु परिवर्तन के अलावा, ग्लेशियर का आकार, प्रकार, स्थलाकृति और वहां मौजूद मलबे का आवरण मुख्य रूप से जिम्मेदार होता है। गंगोत्री के सहायक ग्लेशियरों में चतुरंगी के अलावा रक्तवर्ण और कीर्ति जैसे ग्लेशियर शामिल हैं। छोटे ग्लेशियरों की अपेक्षा हिमालय में बड़े ग्लेशियर अपेक्षाकृत धीमी गति से पीछे खिसक रहे हैं।

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