देश में मस्तिष्काघात (Brain Stroke) का हर सातवां मरीज 45 साल से कम आयु का युवा है। इनमें दो तिहाई मरीज पुरुष है। मरीजों के इलाज के दौरान तीन माह में करीब 27.8 फीसदी ने दम तोड़ दिया। यह खुलासा भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद (आइसीएमआर) और राष्ट्रीय रोग सूचना विज्ञान और अनुसंधान केंद्र (ICMR) के एक अध्ययन से हुआ है।

देश भर के 30 अस्पतालों में पंजीकृत हुए 34792 मरीजों पर हुए इस अध्ययन में पाया गया कि मस्तिष्काघात की चपेट में युवा भी आ रहे हैं। जीवन शैली में बदलाव के कारण शहरीकरण में तनाव की समस्या बढ़ी है। लेकिन अध्ययन के दौरान प्रभावित मरीजों में से 70 फीसद लोग ग्रामीण क्षेत्र से थे। राष्ट्रीय स्ट्रोक रजिस्ट्री कार्यक्रम के तहत एकत्र आंकड़ों के विश्लेषण में पाया गया कि तीन माह के भीतर आधे से अधिक मरीजों की स्थिति खराब पाई गई। करीब 27.8 फीसद मरीज ने इलाज के दौरान दम तोड़ दिया। वहीं 29.7 फीसद मरीज दिव्यांग हो गए।

केवल 20 फीसद मरीज ही चार घंटे के अंदर अस्पताल पहुंच पाए

देश भर में पंजीकृत हुए मरीजों में से केवल 20 फीसद ही साढ़े चार घंटे के अंदर अस्पताल पहुंच पाए थे। इनमें से केवल 4.6 फीसद मरीज को ही थ्रोंबोलाइसिस (क्लाट घोलने की दवा) की सुविधा मिली। जबकि केवल 0.7 फीसद मरीज की ही मैकेनिकल थ्रोम्बेक्टामी हो पाई।

यह अध्ययन साल 2020 से 2022 के बीच अस्पताल-आधारित स्ट्रोक रजिस्ट्रियों में दर्ज 34,792 मामलों पर आधारित है। इसमें मरीजों की औसत आयु 59.4 वर्ष रही। लेकिन 13.8 फीसद मरीज 45 वर्ष से कम उम्र के थे। कुल मरीजों में 63.4 फीसद पुरुष और लगभग 72 फीसद ग्रामीण क्षेत्रों से थे। कुल मामलों में 60 फीसद इस्कीमिक स्ट्रोक (रक्त प्रवाह रुकने से) के थे, जबकि शेष में मस्तिष्क में रक्तस्राव (हेमरेजिक स्ट्रोक) के मामले दर्ज हुए। मरीजों में मोटर कमजोरी (74.8 फीसद) और बोलने में परेशानी (51.2 फीसद) सबसे सामान्य शुरुआती लक्षण पाए गए।

दिव्यांगता में सुधार के मामले कम

अध्ययन में पाया गया कि केवल 37 फीसद मरीज बिना दिव्यांगता के सामान्य जीवन की ओर लौट सके। 1.1 फीसद मरीजों में आघात दोबारा हुआ। महिलाओं में तीन माह बाद दिव्यांगता की दर पुरुषों की तुलना में अधिक पाई गई। जागरूकता की कमी, अस्पताल पहुंचने में देरी और उन्नत उपचार सुविधाओं की सीमित उपलब्धता को खराब परिणामों का प्रमुख कारण माना गया है।

अध्ययन में सुझाव दिया गया कि स्ट्रोक की रोकथाम और प्रबंधन के लिए उच्च रक्तचाप और मधुमेह की समय पर जांच व नियंत्रण, तंबाकू व शराब पर नियंत्रण, आघात के लक्षणों की पहचान को लेकर जन-जागरूकता, ग्रामीण क्षेत्रों में त्वरित उपचार सुविधाओं का विस्तार, थ्रोंबोलाइसिस और थ्रोंबेक्टामी जैसी उन्नत सेवाओं की उपलब्धता बढ़ाना सहित अन्य पर विशेष जोर देने की जरूरत होगी। अध्ययन में पाया गया कि 74.5 फीसद मरीजों में उच्च रक्तचाप की समस्या थी।

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हड्डियों की मजबूती और शरीर के सुचारू कामकाज के लिए कैल्शियम एक बेहद जरूरी पोषक तत्व है। जब भी कैल्शियम का जिक्र होता है, तो सबसे पहले दूध का नाम दिमाग में आता है। लेकिन हर व्यक्ति के लिए दूध उपयुक्त नहीं होता। कुछ लोगों को दूध से एलर्जी होती है या वे लैक्टोज इनटॉलरेंस के शिकार होते हैं, जिससे उन्हें दूध पचाने में परेशानी होती है। वहीं, कुछ लोग शाकाहारी या वीगन जीवनशैली अपनाने के कारण डेयरी उत्पादों से परहेज करते हैं। पूरी खबर पढ़ने के लिए यहां पर करें क्लिक