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संपादकीय: हल्की होती जेब

महामारी के इस दौर में सबसे बुरी मार आम आदमी की जेब पर पड़ी है। कोविड-19 के प्रकोप से बचने के लिए पूर्णबंदी की गई तो हर तरह के कामकाज ठप पड़ गए। बंदी हटने के बाद बड़े उद्योग फिर से अपने पैरों पर खड़े होने लगे, पर मध्यम, छोटे और सूक्ष्म उद्योग, असंगठित क्षेत्रों के कामकाज आज तक पटरी पर नहीं लौट सके हैं।

Updated: December 17, 2020 4:30 AM
कोरोना की जांच करते स्‍वास्‍थ्‍यकर्मी। ।फइल फोटो।

महामारी के कारण बहुत सारे कल-कारखाने पूरी तरह बंद हो चुके हैं। चूंकि इन्हीं क्षेत्रों में रोजगार के अवसर अधिक हैं, इन्हीं पर लोगों की निर्भरता अधिक है, इसलिए दिहाड़ी और रोजमर्रा छोटी कमाई करने वालों के सामने चुनौतियां बनी हुई हैं। जिन उद्योगों में कामकाज शुरू हो गया है, उनमें भी बहुतों की पहले जैसी कमाई नहीं हो पा रही है, इसलिए उन्होंने या तो अपने कर्मचारियों के वेतन में भारी कटौती की है, समय पर वेतन नहीं दे पा रहे या छंटनी का सहारा ले चुके हैं।

इस तरह लाखों लोगों की नौकरी चली गई है, लाखों लोगों की कमाई घट गई है। स्वाभाविक ही इससे उनके दैनिक खर्चों पर असर पड़ा है। इससे पार पाने के लिए उन्होंने रोजमर्रा के खर्चों में तो कटौती कर दी है, पर गाड़ी, मकान वगैरह की किस्तें चुकाने, बच्चों की फीस भरने आदि की मुश्किलें बनी हुई हैं। इसके चलते उनकी बचत पर असर पड़ा है।

पूर्णबंदी के समय ही हजारों की संख्या में लोगों ने अपने भविष्य निधि से पैसा निकालना शुरू कर दिया था। जिन लोगों ने बैंकों में बचत के लिए सावधि खाते खोल रखे थे या म्यूचुअल फंड आदि में निवेश कर रखे थे, उनमें से भी पैसे निकालने शुरू कर दिए, ताकि वे अपने जरूरी खर्चे पूरा कर सकें।

जाहिर है, इसका असर बाजार पर पड़ा है। मध्यम आय वर्ग के लोगों ने बड़े खर्चों की तरफ से हाथ खींच लिया है। छोटी कमाई वाले लोगों से बाजार को होने वाली आय लगभग रुक गई है। ऊपर से मंहगाई बढ़ने से बाजार में पैसे का प्रवाह थम गया है। लोग रोजमर्रा की चीजें भी संभल कर खरीद रहे हैं। हालांकि पूर्णबंदी खुलने के बाद अर्थव्यवस्था की सेहत में धीरे-धीरे सुधार दर्ज हो रहा है, मगर यह सुधार सिर्फ कुछ बड़े औद्योगिक क्षेत्रों की वजह से दिखाई दे रहा है।

बाजार में रौनक तब लौटती है, जब मध्यवर्ग और निम्न आय वर्ग के लोगों की क्रयशक्ति बढ़ती है। और यह तब बढ़ती है, जब रोजगार क्षेत्र में विस्तार होता है। फिलहाल इस दिशा में उत्साहजनक बढ़ोतरी नजर नहीं आ रही, इसलिए अर्थव्यवस्था की सेहत को लेकर चिंता स्वाभाविक है।

आम लोगों की बचत में कमी आने का अर्थ है राष्ट्रीय बचत का सूचकांक नीचे जाना। जब राष्ट्रीय बचत कम होती है, तो बैंकिंग क्षेत्र की स्थिति सुदृढ़ नहीं रह पाती। फिर बैंकों की स्थिति कमजोर होने से सरकार की कल्याणकारी योजनाएं रुक जाती हैं। विदेशी निवेश भी प्रभावित होता है।

ऐसे में कुछ बड़े औद्योगिक घराने बेशक अपने कारोबार में विस्तार करते और मुनाफा कमाते नजर आ जाएं, पर उससे देश का समग्र विकास नहीं हो पाता है। अर्थव्यवस्था की मजबूती के लिए लोगों की आमदनी बढ़ानी जरूरी है। आमदनी बढ़ेगी, तभी बचत योजनाएं भी कामयाब रहेंगी और बाजार में पूंजी का प्रवाह बढ़ेगा। इससे बैंकिंग क्षेत्र की सेहत भी सुधरेगी। यह संतुलन साधने इसके लिए सरकार प्रयास तो कर रही है, मगर इसके नतीजे कब तक सामने आते हैं, यह देखने की बात है।

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