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विशेष: गुरु परंपरा का योगफल

आज योग का जो रूप हम देख रहे हैं, वह कई मनीषियों के हाथों परिष्कृत और विकसित होता हुआ हमारे पास पहुंचा है। योग से जुड़ी इस गुरु परंपरा की आधुनिक कड़ी के बारे में जानना हमारे लिए काफी जरूरी है। इस कड़ी में महर्षि अरविंद से लेकर बीकेएस अयंगर तक कई नाम खास तौर पर उल्लेखनीय हैं।

Yoga, Yoga and saints, Indian yogaयोग भारतीय ज्ञान और जीवनशैली का पर्याय है। इसे प्राचीन काल से हमारे ऋषि विकसित करते आए हैं।

भारतवर्ष की सांस्कृतिक यात्रा के साथ यह बात खास है कि समय के प्रवाह के साथ संस्कृति ने परंपरा के साथ अपना नाता तोड़ा नहीं बल्कि हर देशकाल में अपने लिए दरकार बनाए रखी। भारतीय संस्कृति की इसी साझी दरकार से आगे चलकर योग आज वैश्विक स्वीकृति पा रहा है। योग की इस अखिल ख्याति के पीछे योगगुरुओं की एक लंबी परंपरा है। यह यात्रा योग के पुरातन से अधुनातन के साथ भारतीय संस्कृति की भी विकास यात्रा है। दरअसल, योग भारतीय ज्ञान और जीवनशैली का पर्याय है। इसे प्राचीन काल से हमारे ऋषि-मनीषी परिष्कृत और विकसित करते आए हैं। इतिहास के उतार-चढ़ाव के बावजूद यह विद्या भारत में सुरक्षित ही नहीं रही, बल्कि काल के प्रवाह के साथ संवर्द्धित भी होती गई। योग का वैश्विक फैलाव इसका सबसे बड़ा प्रमाण है।

महर्षि पतंजलि ने अपने योग सूत्रों के माध्यम से अपने समय में विद्यमान योग की प्रथाओं, इससे जुड़े आशय ज्ञान को व्यवस्थित किया। पूर्व वैदिक काल (2700 ईसा पूर्व) एवं इसके बाद पतंजलि काल तक योग की मौजूदगी के ऐतिहासिक साक्ष्य हैं। वेदों, उपनिषदों, बौद्ध धर्म, जैन धर्म, पाणिनी, महाकाव्यों के उपदेशों, पुराणों आदि में भी योग के उल्लेख हैं। आज योग का जो रूप हम देख रहे हैं, वह कई मनीषियों के हाथों परिष्कृत और विकसित होता हुआ हमारे पास पहुंचा है। योग से जुड़ी इस गुरु परंपरा की आधुनिक कड़ी के बारे में जानना हमारे लिए काफी जरूरी है। इस कड़ी में महर्षि अरविंद से लेकर बीकेएस अयंगर तक कई नाम खास तौर पर उल्लेखनीय हैं।

पुडुचेरी का विश्वविख्यात श्री अरविंद आश्रम, जो लोगों को आत्मसंयम के जरिए आंतरिक क्रियाओं से ईश्वर के साक्षात्कार का संदेश एवं प्रेरणा प्रदान करता है, उसके जनक श्री अरविंद घोष थे। दिलचस्प है कि अरविंद पहले अंग्रेजों के खिलाफ संघर्ष करने वाले क्रांतिकारियों में शामिल थे। उसी दौरान उन्हें एक साल की जेल हुई थी। जेल के दौरान ही उन्होंने भगवान कृष्ण की एक अदृश्य शक्ति को अनुभव किया। जेल से बाहर आने के बाद वे पुडुचेरी चले गए, जहां उन्होंने जीवन का ज्यादातर समय विभिन्न तरह की साधना के विस्तार में लगाया। उनकी साधना की दिशा मनुष्य चेतना पर केंद्रित थी, वे मानव चेतना को शारीरिक, मानसिक, स्नायविक से होते हुए चैतन्य के स्तर तक ले जाना चाहते थे।

शीघ्र ही उनका छोटा-सा साधना कुटीर एक बड़े आश्रम के रूप में बदलने लगा। यह एक संयोग है कि उनकी जन्मतिथि पर ही भारत स्वतंत्र भी हुआ। भारत की इस सफलता में श्री अरविंद का योगदान असंख्य योद्धाओं से कम न था। यद्यपि वे आज नहीं हैं, किंतु उनका पुडुचेरी आश्रम सदैव ही उनकी याद दिलाता रहेगा, जहां उन्होंने राष्ट्र कल्याण के लिए तप किया, योग साधना की।

चिकित्सक से योगी बने स्वामी शिवानंद उन आध्यात्मिक गुरुओं में एक हैं, जिन्होंने नए समय में पूरी दुनिया में योग प्रचार किया। निष्काम कर्मयोग के प्रतिपादक होने के कारण उन्होंने स्वार्थरहित सेवा के आदर्श पर बल दिया। वे सेवा की उच्चतर चेतना प्राप्त करने के लिए शुद्धिकरण को जरूरी मानते थे। उनके योग में कर्मयोग, भक्तियोग, ज्ञानयोग, राजयोग और मंत्रयोग शामिल था। भारत के अलावा अमेरिका, कनाडा, म्यांमा, दक्षिण अमेरिका, आस्ट्रेलिया, यूरोप और दक्षिण अफ्रीका में उनके 137 योग केंद्र हैं। पूरी दुनिया में स्वामी शिवानंद के लाखों अनुयायी हैं।

परमहंस योगानंद आध्यात्मिक गुरु और योगी थे। योगानंद के अनुसार क्रियायोग ईश्वर से साक्षात्कार की प्रभावी विधि है और इसके पालन से अपने जीवन को संवारा और ईश्वर की ओर अग्रसर हुआ जा सकता है। योगानंद पहले भारतीय गुरु थे, जिन्होंने अपने अधिकतर कार्य पश्चिम में किए। 1920 में वे अमेरिका चले गए। उन्होंने अपना पूरा जीवन व्याख्यान देने, लेखन तथा निरंतर विश्वव्यापी कार्य को दिशा देने में लगाया। उनकी उत्कृष्ट कृति ‘योगी कथामृत’ है।

स्वामी सत्यानंद सरस्वती उन महानतम आधुनिक संतों में हैं, जिन्होंने समाज के हर क्षेत्र में योग को समाविष्ट कर, सभी वर्गों, राष्ट्रों और धर्मों के लोगों का आध्यात्मिक उत्थान सुनिश्चित किया। परिव्राजक के तौर पर लंबा समय बिताने के बाद उन्होंने वसंत पंचमी के दिन 19 जनवरी, 1964 को बिहार योग विद्यालय, मुंगेर की स्थापना की। उन्होंने दुनियाभर में प्रशिक्षित योग शिक्षकों की एक बड़ी जमात तैयार की।

बीकेएस अयंगर के नाम के मशहूर योगगुरु वेल्लुर कृष्णमाचारी सुंदरराजा अयंगर अग्रणी योगगुरु थे। उन्होंने ‘अयंगर योग’ की स्थापना की और इसे पूरी दुनिया में मशहूर बनाया। 2002 में भारत सरकार द्वारा उन्हें पद्मभूषण व 2014 में पद्मविभूषण से सम्मानित किया गया। ‘टाइम’ पत्रिका ने 2004 में दुनिया के सबसे प्रभावशाली सौ लोगों की सूची में उनका नाम शामिल किया था। अयंगर ने जिन प्रसिद्ध लोगों को योग सिखाया था, उनमें जी. कृष्णमूर्ति, जयप्रकाश नारायण और यहूदी मेनुहिन जैसे नाम शामिल हैं।

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