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Chandrayaan-2: 1000 करोड़ लागत और माइनस 130 डिग्री ठंड नहीं, यह है मिशन की सबसे बड़ी चुनौती

चंद्रयान-2 के लैंडर और रोवर में ऊर्जा के लिए सोलर पैनल लगाए गए हैं। मिशन के दौरान चंद्रयान-2 के उपकरण 350 घंटे तक चंद्रमा के बेहद ठंडे तापमान में रहेंगे।

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विराट मार्कण्डेय

इसरो की तरफ से चंद्रयान-2 के लॉन्चिंग की उल्टी गिनती शुरू हो चुकी है। इन सब के बीच चंद्रमा पर दिन और रात गुजारना चंद्रयान-2 की सफलता की सबसे बड़ी चुनौती है।

यदि सब कुछ ठीक रहा तो चंद्रयान-2 का लैंडर चंद्रमा के साउथ पोल एटकिन बेसिन पर उतरेगा। इसके बाद लैंडर विक्रम रोवर प्रज्ञान को आगे बढ़ने की राह प्रशस्त करेगा। रोवर बहुत धीरे-धीरे चंद्रमा की सतह पर गति करेगा। यह गति 1 सेमी/सेकंड होगी। लैंडर और रोवर दोनों पर एनर्जी जेनरेट करने के लिए सोलर पैनल लगे हैं।

रोवर को चंद्रमा पर 14 दिन रह कर प्रयोग करना है। इसकी इलेक्ट्रिक पावर जेनरेट करने की क्षमता 50 वॉट है। मिशन की अवधि, सभी जटिल पैंतरेबाजी और 1000 करोड़ रुपये की लागत इन सब के पीछे कारण है। चंद्रमा अपने अक्ष पर एक घूर्णन पूरा करने में 29 दिन का समय लेता है। इसका मतलब है कि 350 घंटे रात रहेगी।

चंद्रमा की बहुत कम तापमान होता है। ऐसे में साइंटिफिक इंस्ट्रूमेंट और इलेक्ट्रोनिक का प्रयोग नहीं हो सकेगा। बैटरी ना तो चार्ज होगी और ना ही डिसचार्ज। ऐसे में कम्यूनिकेशन सिस्टम भी फेल रहेगा। चंद्रमा पर तापमान बहुत अधिक होता और बहुत कम भी हो जाता है। चंद्रमा में दिन में जहां तापमान 120 डिग्री सेल्सियस पहुंच जाता है वहीं रात में तापमान -130 डिग्री सेल्सियस रहता है।

नासा के थर्मल इंजीनियर रोन क्रील का कहना है कि यहा तापमान बिल्कुल झरने के समान गिर जाता है। जहां लैंडर विक्रम लैंड करेगा वहां रात में तापमान -180 डिग्री के आसपास होगा। इसरो के प्लेनेटरी साइंस से जुड़े नरेंद्र भंडारी का कहना है कि अधिकतर इलेक्ट्रोनिक सेंसर और कैमरा इतने अधिक तापमान में काम करना बंद कर देते हैं।

भंडारी चंद्रयान-1 मिशन के प्रमुख सदस्य रह चुके हैं। अब तक केवल तीन मिशन ही लूनर नाइट में बच सके हैं। इनमें 1969-77 के दौरान अपोलो अल्सेप, यूएसएसआर का लूंकोहोड 1 और 2 और चाइना का साल 2013 और 2019 का यूतू रोवर।

(विराट मार्कण्डेय दिल्ली में रहने वाले साइंस जर्नलिस्ट हैं।)

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