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जनसत्ता संवाद: हंगरी – संक्रमण की आड़ लेकर आई तानाशाही

वर्ष 1989 में विक्टर ओरबन ने लोकतंत्र और निष्पक्ष चुनावों की मांग कर बड़े प्रदर्शन और रैलियां की थीं। 1989 में ही हंगरी ने वामपंथी पार्टियों को नकारा और संसदीय लोकतंत्र बना। इसके नौ साल बाद 1998 में ओरबन प्रधानमंत्री बन गए। इसके बाद से वे सत्ता में पकड़ बनाने के लिए तमाम हथकंडे अपनाते रहे और अब कोरोना विषाणु संक्रमण की आड़ में लोकतंत्र खत्म कर दिया। विक्टर ओरबन पर वित्तीय गड़बड़ियों के कई आरोप लगे हैं, लेकिन जांच नहीं हो सकी है। कमजोर विपक्ष इसके लिए कभी दबाव नहीं बना सका।

Author Published on: April 7, 2020 12:10 AM
वैश्विक स्तर पर कोरोना वायरस संकट के बीच हंगरी की संसद ने प्रधानमंत्री विक्टर ओर्बन को अनिश्चित काल के लिए सत्ता में बने रहने का अधिकार दे दिया है।

कोरोना संक्रमण के डर की आड़ लेकर यूरोपीय देश हंगरी में लोकतंत्र खत्म कर दिए जाने के बाद दुनिया भर में इसकी तीखी आलोचना हो रही है। अपने सदस्य देश में लिए गए इस फैसले को लेकर यूरोपीय संघ ने इसके खिलाफ कार्रवाई की तैयारी शुरू कर दी है। हंगरी की संसद ने अपने प्रधानमंत्री विक्टर ओरबन को आजीवन सत्ता में बने रहने का अधिकार दे दिया है। इसके बाद वहां चुनाव और जनमत संग्रह अनिश्चित काल के लिए रोक दिए गए हैं। लोकतंत्र की प्रतीक मानी जाने वाली संस्थाओं पर अंकुश बढ़ा दिया गया है।

हंगरी की संसद में ओरबन की फीडेस पार्टी का दो तिहाई बहुमत मिलने के बाद यहां कोविड-19 को लेकर एक विधेयक पारित किया गया, जिसके तहत प्रधानमंत्री को हमेशा सत्ता में बने रहने का अधिकार मिल गया। वहां चुनाव और जनमत संग्रह रोका गया है, लेकिन यह नहीं बताया गया कि आपातकाल कब खत्म होगा। प्रधानमंत्री विक्टर ओरबान ने संसद में प्रस्ताव रखा कि कोरोना से निपटने के लिए वे बेरोकटोक काम करना चाहते हैं। उनके प्रस्ताव को बहुमत से समर्थन मिला, क्योंकि वहां विपक्षी दलों के पास ज्यादा सीटें नहीं है।

हंगरी में पिछले एक दशक से लोकतंत्र खत्म करने की तैयारी चल रही थी। महामारी के खतरे से पहले ही सरकार ने न्यायिक स्वतंत्रता पर हमला किया था और सांस्कृतिक संस्थानों को बंद करने की कोशिश की थी। नए कानून के तहत गलत खबर छापने पर पत्रकार या अन्य किसी भी व्यक्ति को पांच साल तक जेल भेजने का प्रावधान है। करीब एक करोड़ की आबादी वाले हंगरी में अब तक कोरोना संक्रमण के छह सौ से ज्यादा मामले सामने आए हैं। इसमें 25 से ज्यादा लोगों की मौत हो चुकी है।

हंगरी यूरोपियन यूनियन (ईयू) का सदस्य है। वह 2004 में ईयू से जुड़ा था। ईयू ने हंगरी के घटनाक्रम की निंदा करते हुए कहा है कि लोकतंत्र, आजादी और कानून का राज ईयू की नींव है। हमारे सारे सदस्यों को कड़ी परिस्थितियों में भी इन्हें अपनाए रखना होगा।

यूरोपीय संघ के 13 देशों ने एक साझा बयान जारी कर कहा था कि वे कुछ आपातकालीन कदमों के कारण लोकतंत्र और मौलिक अधिकारों के हनन को लेकर चिंतित हैं। हालांकि इस बयान में कहीं भी हंगरी का जिक्र नहीं किया गया था। यूरोपीय आयोग की अध्यक्ष उर्सुला फॉन डेय लाएन ने हंगरी में लागू नए आपातकाल कानून पर चिंता व्यक्त की है।

नए आपातकाल कानून के तहत जब तक कोरोना संकट खत्म नहीं हो जाता सरकार के पास असीमित शक्तियां हैं। संकट खत्म हुआ है या नहीं, यह तय करने का अधिकार भी सरकार के ही पास होगा। सरकार के प्रवक्ता जोल्टान कोवाच ने ट्विटर पर एक वीडियो संदेश जारी करते हुए आपातकाल की आलोचना की निंदा की। ओरबान सरकार पर लग रहे आरोपों को उन्होंने विच हंट कहा। कोवाच ने कहा कि फॉन डेय लाएन की प्रतिक्रिया दोहरे राजनीतिक मानदंडों की मिसाल है। यूरोपीय संघ के द्वारा बयान जारी किए जाने के बाद यूरोपीय आयोग की अध्यक्ष ने कड़ी कार्रवाई की चेतावनी दी, जिसके बाद हंगरी के न्याय मंत्रालय ने कहा है कि उसे आपातकाल कानून की जांच से कोई ऐतराज नहीं है।

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