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हमारी याद आएगी: डेविड,नन्हे मुन्ने बच्चे तेरी मुट्ठी में क्या है…

हिंदी सिनेमा के विकास में हर जाति, धर्म, प्रदेश के लोगों का योगदान रहा है। थियेटरों से सिनेमा में आए पारसियों ही नहीं, मराठीभाषी यहूदियों ने भी सिनेमा के शुरुआती दौर में उल्लेखनीय काम किया।

डेविड।

जब सिनेमा में काम करने को ओछा काम समझा जा रहा था और महिलाएं सिनेमा में काम करने के लिए तैयार नहीं थीं, तब यहूदी महिलाओं रूबी मायर्स, एस्टर अब्राहम, रोज एजरा से लेकर नादिरा तक ने मूक और सवाक फिल्मों में काम किया। पुरुष भी पीछे नहीं थे। यहूदियों के मराठीभाषी समुदाय ‘बेने इजराइल’ के डेविड अब्राहम चेउलकर को आजादी के बाद पैदा हुई पीढ़ी के सिनेमाप्रेमी शायद ही भूले होंगे। ‘बातों बातों में’, ‘खट्टा मीठा’, ‘बूट पॉलिश’, ‘चुपके चुपके’, ‘अभिमान’, ‘गोल माल’, जैसी 100 से ज्यादा फिल्मों में काम कर चुके डेविड की कल 38वीं पुण्यतिथि है।

हिंदी सिनेमा में हीरो की छवि बरगद-सी विशालकाय होती है, जिसके नीचे पनपने वाले चरित्र अभिनेताओं की जमात भुला ही दी जाती है। फिर भी कोई कन्हैयालाल सुक्खी लाला या लीला मिश्रा मौसी के किरदार से अपनी ऐसी पहचान बना लेती है, जिसे पीढ़ियों तक याद रखा जाता है।

‘हीरो के अलावा सब जीरो’ वाली मुंबइया फिल्म इंडस्ट्री में चरित्र भूमिकाएं निभाने वाले कलाकारों को अपनी पहचान बनाने में सालों लग जाते हैं। कन्हैयालाल को ‘मदर इंडिया’ के सुक्खी लाला के रूप में पहचान बनाने में 17 साल इंतजार करना पड़ा। लीला मिश्रा को 1946 की ‘अनमोल घड़ी’ से 1975 की ‘शोले’ में मौसी बनने तक 30 साल तक इंतजार करना पड़ा था।

इंतजार का यह काम डेविड को भी करना पड़ा था। बीए, एलएलबी करने के बाद 1937 में ‘जंबो’ से डेविड फिल्मों में आए। 29 साल की उम्र में नकली मूंछें लगाकर बुजुर्ग आदमी की भूमिका करनी पड़ी मगर कुछ हासिल नहीं हुआ। उन्हें बॉलीवुड में अपना मकाम बनाने के लिए बहुत पापड़ बेलने पड़े। फिल्म इंडस्ट्री में बने रहने के लिए डेविड ने क्या नहीं किया। कुछ दिनों तक उन्होंने निर्देशक के सहायक के रूप में काम किया।

फिर उन्हें प्रोडक्शन मैनेजर की नौकरी मिल गई, तो यह काम करने लगे। कभी जरूरत पड़ी तो क्लैपर बॉय बन गए, तो कभी टेलीफोन आॅपरेटर। तीन साल के बाद एक दिन नौकरी चली गई। फिर एक के बाद एक फिल्म कंपनियों में काम करते रहे। इप्टा से जुड़े जिसके बाद उन्हें कुछ अच्छी भूमिकाएं मिलने लगीं।

सभी दिन एक समान नहीं रहते। तो हुआ यूं कि डेविड को भी एक ऐसी फिल्म और किरदार मिला, जिसने उन्हें पहचान दे दी। यह फिल्म थी 1954 की ‘बूट पॉलिश’, जिसे राज कपूर ने अपने सहायक प्रकाश अरोड़ा से निर्देशित करवाया था। इस फिल्म का गाना ‘नन्हे मुन्ने बच्चे तेरी मुट्ठी में क्या है…’ खूब लोकप्रिय हुआ।

फिल्म में डेविड ने जान चाचा की भूमिका की थी, जो भीख मांगने वाले बच्चों को सम्मान से जीना सिखाता है और भीख मांगने वाले बच्चे बूट पॉलिश कर समाज की मुख्यधारा में शामिल हो जाते हैं। इस फिल्म से डेविड को एक पहचान मिली और उनकी किस्मत चमक उठी।

‘उपकार’ में मेजर साब, ‘सत्यकाम’ में रुस्तम, ‘अभिमान’ में ब्रजेश्वरलाल, ‘चुपके चुपके’ में हरिप्रसाद या ‘गोल माल’ में मूंछों की महिमा के खब्त में डूबे उत्पल दत्त को बाहर निकालने वाले केदार मामा जैसी कई भूमिकाओं ने डेविड ने अपनी छाप छोड़ी। यहां तक कि मंच संचालन के लिए उतरे तो देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू तक ने डेविड की जमकर तारीफें कीं। बाद में पद््मश्री डेविड अपने भतीजे के पास कनाडा चले गए और वहीं उनका निधन हुआ।

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