ताज़ा खबर
 

उना में दलितों की पिटाई पर बीजेपी जो भी कहे, गुजरात में गौरक्षकों को मिलता रहा है इनाम

गुजरात के उना में कथित गौरक्षकों द्वारा दलितों की गाय की खाल उतारने पर की गई बर्बर पिटाई का वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो गया था।

गायों का एक झूंड। (EXPRESS ARCHIVE)

गुजरात के उना में दलितों की पिटाई पर हुई प्रतिक्रिया के बाद राज्य में 31 गौरक्षकों को पुलिस हिरासत में ले लिया गया है। लेकिन इससे पहले गुजरात में कई सालों तक “गौरक्षकों” को उनके “योगदान” के लिए पुरस्कृत किया जाता रहा है। इन गौरक्षकों के योगदान को उनके द्वारा गुजरात एनिमल प्रिजरवेशन एक्ट के तहत दर्ज कराई गई एफआईआर की संख्या और “बचाए गए” जानवरों के आधार पर आंका जाता रहा है।

35 वर्षीय टैक्सी चालक संदीप गाधवी पिछले 12 सालों से “गौरक्षा” कर रहे हैं. वो दो गोशालाएं भी चलाते हैं। गाधवी के अनुसार उन्होंने 285 एफआईआर दर्ज कराई है और 29 हजार जानवरों को बचाया है। उनकी “सेवा” के लिए गुजरात के कृषि और सहकारी विभाग के गौसेवा और गौचर विकास बोर्ड (जीजीवीबी) द्वारा सम्मानित किया जा चुका है।

31 वर्षीय हर्ष चौहान 2005 में “गौरक्षक” बने। उस समय शिव सेना के सदस्य थे। अब वो कांग्रेस के सदस्य हैं और चोटिला नगरपालिका के उपाध्यक्ष हैं. चौहान हैंडिक्राफ्ट की दुकान चलाते हैं। चौहान के अनुसार उन्होंने 200 एफआईआर दर्ज कराई हैं और 7000 जानवरों को बचाया है। चौहान ने राज्य की महिला एवं बाल विकास मंत्री वासुबेन त्रिवेदी के संग अपनी तस्वीर दिखाते हैं, जिसमें वो उन्हें 2012 में जीजीवीबी की तरफ से “गौरक्षक अवार्ड” दे रही हैं।

जीजीवीबी के चैयरमैन वल्लभ कथिरिया कहते हैं, “गौरक्षक गौरक्षा में अहम भूमिका निभाते हैं। हर साल वो औसतन 15 गायों को बचाते हैं। हम उनके योगदान को रेखांकित करते हुए हम हर दो साल पर उन्हें पुरस्कृत करते हैं। हम उन्हें प्रशिक्षित करने के लिए कार्यशाला का आयोजन करते हैं। हम बताते हैं कि गौरक्षा कैसे की जाए और किन किन धाराओं के तहत एफआईआर दर्ज कराया जाए।” कथिरिया कहते हैं कि वो गौरक्षकों की सीधी मदद नहीं करते। वो गौशालाओं और पंजरपोल जैसी संस्थाओं को आर्थिक मदद देते हैं।

Read Also: मोदी सरकार में गौरक्षक जैसे कट्टर समूहों और नॉन-स्‍टेट एक्‍टर्स की आई बाढ़

गोधरा के प्रज्ञ्नेश सोनी आइसक्रीम विक्रेता और एक गौरक्षा दल के सदस्य हैं। इस गौरक्षा दल में कई अन्य पेशे के लोग हैं। जून में सोनी और उनकी टीम ने पंचमहल जिले में स्थित एक कृषि उत्पाद बाजार कमिटी में छापा मारकर पशुओं की कथित अनाधिकृत बिक्री को रोका था. उनके छापे के बाद इलाके में दंगा फैल गया था और रविवारी पशु बाजार करीब चार हफ्ते बंद रहा।

42 वर्षीय दिनेश लोरिया उन सात गौरक्षकों में शामिल हैं जिन्होंने राजकोट में गाय को राष्ट्रमाता का दर्जा दिए जाने की मांग को लेकर आत्महत्या की कोशिश की थी। उनमें से एक नौजवान की मौत हो गई थी। लोरिया ने 2006 में गौरक्षा शुरू की थी। अब वो एक ट्रांसपोर्ट कंपनी और एक गौशाला चलाते हैं। उनका दावा है कि अखिल विश्व गौ संवर्धन परिषद के वाइस-प्रेसिडेंट हैं।

2011 में जब नरेंद्र मोदी राज्य के मुख्यमंत्री थे तो गुजरात एनिमल प्रिजरवेशन एक्ट 1954 को पहले से कड़ा बनाया गया। संशोधित कानून के तहत गाय और उसकी समस्त प्रकार की संस्ततियों की हत्या, बिक्री पर रोक लगा दी गई. राज्य में बीफ के भंडारण पर भी रोक लगा दी गई। इस कानून का उल्लंघन करने के लिए सजा भी बढ़ाकर सात साल तक कर दी गई। इन अपराधों में इस्तेमाल किए जाने वाले सभी वाहनों को भी जब्त कर लिए जाने का प्रावधान बनाया गया। डायरेक्टोरेट ऑफ फोरेंसिक साइंसेज को बीफ के कारोबार की निगरानी के लिए मोबाइल यूनिट चलाने का भी अधिकार दिया गया।

गुजरात में गौरक्षक सभी राजनीतिक दलों से जुड़े हुए हैं। जब लोरिया और उनके साथियों ने गाय को राष्ट्र माता का दर्जा देने के लिए आत्महत्या की कोशिश की थी तो कांग्रेसी नेता और गुजरात विधान सभा में नेता प्रतिपक्ष शंकर सिंह वघेला ने सदन में कहा था कि बीजेपी के ऐसे किसी कदम का कांग्रेस समर्थन करेगी।

Read Also: गौरक्षकों ने कहा- मर्द होती तो जान से मार देते, पिटने वाली मुस्लिम महिलाओं की आपबीती

37 वर्षीय साजन भारवाड़ को दक्षिण गुजरात के गौरक्षकों का माफिया माना जाता है। कहा जाता है कि उनके कांग्रेस से गहरे रिश्ते हैं। उनके पिता काबाभाई भारवाड़ भावनगर के वरिष्ठ कांग्रेसी नेता रहे हैं। उन्होंने एक अन्य कांग्रेसी नेता भारत भुदालिया की बेटी से शादी की है। साजन कहते हैं कि वो 13 सालों से “गौरक्षा” कर रहे हैं। उनके पास नवसारी जिले में 100 बीघा जमीन है। वो ट्रकों की मरम्मत के लिए एक गैराज, दो कारखाने चलाने के साथ ही गाय का दूध भी बेचते हैं।

भारवाड़ दावा करते हैं कि उन्होंने पशुओं या बीफ ट्रांसपोर्ट की 450 शिकायतें पुलिस में दर्ज कराई हैं। उनके ऊपर तीन आपराधिक मामले, 2011 में तापी में कसाई का एक ट्रक जला देने, 2013 में कथित तौर पर पशु ले जा रहे ट्रक के ड्राइवर और खलासी की पिटाई और इस साल 24 जुलाई को बीफ की बिक्री से जुड़ा एक मामला दर्ज है।

वडोदरा की रहने वाली 38 वर्षीय नेहा पटेल मैनेजमेंट प्रोफेशनल हैं। मीडिया की कुछ खबरों में उन्हें “एक मात्र महिला गौरक्षक” बताया जाता है। अपनी मोटरसाइकिल पर सवाल नेहा बताती हैं कि वो एक ट्रक का इंताजर कर रही हैं जिसमें “प्लास्टिक बैग में छिपाकर काटने के लिए पशु या टनों बीफ लदा हुआ आएगा।” वो कहती हैं कि उन्हें इसकी सूचना गोधरा के एक भरोसेमंद करीब 30 वर्षीय मुस्लिम युवक ने दी है। कछ के लोकगीत और भजन गायक फरीदा मीर भी सौराष्ट्र के गौरक्षकों का नेतृत्व करती हैं। 2013 में उन्होंने बछड़ों और गाय से लदी ट्रक को पकड़ा था. उनपर ट्रांसपोर्टर पर हमले के लिए मामला भी दर्ज किया गया था। गौरक्षक कहते हैं कि मुस्लिम उनके बहुत काम आते हैं। कई बार कसाई आपसी प्रतिद्वंद्विता के चलते उन्हें खबर दे देते
हैं।

लोरिया कहते हैं कि उनके 30 प्रतिशत खबरी दलित हैं और उन्हें सबसे ज्यादा खबरें कसाई देते हैं। वो हर सही सूचना के लिए 10 हजार का इनाम देते हैं। लोरिया वीएचपी और शिव सेना से जुड़े हुए हैं। भारवाड़ के गौरक्षा दल के सदस्य अजय शर्मा कहते हैं कि वो मुस्लिम इलाकों के वाहन को हाथ नहीं लगाते क्योंकि उससे हिंसा भड़क सकती है। गाधवी कहते हैं कि वो पुलिस की मौजूदगी में ही छापा मारते हैं। गाधवी भी अपने खबरियों को सरकार से मिलने वाले इनाम में से हिस्सा देते हैं।

Read Also: VIDEO: गुजरात में संदिग्ध गाय चमड़ा तस्करों के कपड़े फाड़ की पिटाई

नवसारी जिले के सब-इंस्पेक्टर डीके सोनी गौरक्षकों की भूमिका को स्वीकार करते हुए कहते हैं, “हम उन्हीं की सूचना पर कार्रवाई करते हैं। गौरक्षक गाय या मीट ले जाने वालों वाहनों को पकड़कर हमें सूचना देते हैं। कई बार वाहनों को पकड़ने के लिए उनके साथ जाते हैं।”

गुजरात में कसाइयों ने अपने रक्षा दल बना रखे हैं। सूरत के नवसारी बाजार के हुसैन शेख और उनके साथी ऐसे ही एक दल के सदस्य हैं। शेख कहते हैं कि वो पहले शराब के ट्रक की रक्षा किया करते थे। शेख जानते हैं कि उनके कुछ आदमी गौरक्षकों के लिए खबरी का काम करते हैं। वो कहते हैं, “हमें कसाई एक ट्रिप को बचाने के लिए एक हजार रुपये देते हैं। जिसमें से 500 हम ट्रक के ड्राइवर को दे देते हैं। जबकि गौरक्षकों को खबर देने वाले युवकों को दो-तीन हजार रुपये मिलते हैं।” कुछ साल पहले गौरक्षकों ने राज्य सरकार से पहचान पत्र दिए जाने की मांग की थी, लेकिन सरकार ने उनकी मांग मानने से इनकार कर दिया।

देखें दिन भर की पांच बड़ी ख़बरें:

Hindi News से जुड़े अपडेट और व्‍यूज लगातार हासिल करने के लिए हमारे साथ फेसबुक पेज और ट्विटर हैंडल के साथ गूगल प्लस पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News App