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विशेष: उसने आखिर कहा क्या था!

उसने कहा था’ में एक सवाल शुरू से आखिर तक गूंजता रहता है कि उसने आखिर कहा क्या था? इसका जवाब तब मिलता है, जब कहानी का अंत हो रहा होता है यानी जब फ्रेंच-जर्मन युद्ध में स्वयं बुुरी तरह घायल हुआ लहना सिंह अपने घावों को छिपाकर घायल हुए सूबेदार व बुखार में तपते उसके बेटे बोध सिंह को पास के फौजी अस्पताल में इलाज के लिए भेजता है।

चंद्रधर शर्मा गुलेरी की रचना ‘उसने कहा था’ पर बनी फिल्म का एक भावपूर्ण दृश्य।

उसने कहा था’ में एक सवाल शुरू से आखिर तक गूंजता रहता है कि उसने आखिर कहा क्या था? इसका जवाब तब मिलता है, जब कहानी का अंत हो रहा होता है यानी जब फ्रेंच-जर्मन युद्ध में स्वयं बुुरी तरह घायल हुआ लहना सिंह अपने घावों को छिपाकर घायल हुए सूबेदार व बुखार में तपते उसके बेटे बोध सिंह को पास के फौजी अस्पताल में इलाज के लिए भेजता है। सूबेदार चाहता है कि लहना सिंह भी अस्पताल चले क्योंकि वह घायल है लेकिन लहना सिंह सूबेदार को कहता है कि इलाज के लिए वे और बीमार बोध सिंह जाएं और जब ठीक होकर घर पहुंच जाएं तो सूबेदारनी से कहें कि सूबेदारनी ने उससे जो कहा था वो उसने पूरा कर दिया है।

इस पर सूबेदार कहता है तुम भी आ जाना और सूबेदारनी से अपने आप ही कह देना… लेकिन ऐसी नौबत नहीं आती क्योंकि लहना खंदकों में ही मर जाता है। अस्पताल ले जाने वाली गाड़ी घायलों को लेकर चली जाती है। उधर, खंदक में वजीरा सिंह के साथ बुरी तरह घायल हुआ लहना सिंह रह जाता है। लहना सिंह जर्मन सैनिक की गोली जांघ पर लगने से घायल हो जाता है।

फिर भी वह उस जर्मन को मारकर चौकी को बचा लेता है। जब जर्मन बड़ी संख्या में हमला करते हैं तो लहना सिंह कुछ साथियों के साथ जर्मनों को अपनी गोलियों व संगीनों से निशाना बनाता है। इसी दौरान जब एक गोली उसकी पसली में लगती है तो भी वह उसमें मिट्टी भर कर मैदान में जमा रहता है और सूबेदार को हमले की खबर भिजवाता है और इसी कारण सूबेदार और उसके साथी जर्मनों को पीछे से मारते आते हैं। इस जरा सी देर चली लड़ाई में तिरेसठ जर्मन सैनिक खेत रहते हैं और सिख जीत जाते हैं।

इसके बाद घायलों को लेने के लिए गाड़ी आती है। ये इसी वक्त के संवाद हैं जो बताते हैं कि सूबेदारनी ने जो कुछ कहा था, उसे लहना सिंह ने अपनी जान की बाजी लगाकर पूरा कर दिया। सूबेदारनी ने क्या कहा था? इसका जवाब इसी अंतिम प्रसंग में मिलता है।

बुरी तरह घायल लहना सिंह साथी वजीरा सिंह से बार-बार पानी मांगता है और अपनी नीम बेहोशी के स्वप्न (फ्लैशबैक) में उसे वह बात याद आती है कि जब वह फौज में भर्ती हुआ तो किस तरह सूबेदार से मुलाकात हुई और सूबेदार के बताने पर कि सूबेदारनी उसे जानती है, वह सूबेदारनी से मिलने जाता है तो सूबेदारनी उसे पहचानकर रो-रोकर कहती है कि चार लड़के हुए, एक बचा है जो अपने पिता सूबेदार के साथ ही पलटन में है।

फिर वह अपना पल्लू आगे कर लहना से भीख मांगती है कि ‘आप उनकी जान उसी तरह बचाना जिस तरह अपनी जान की परवाह किए बिना आपने एक दिन अमृतसर में मेरी जान तब बचाई थी जब मैं तांगे के नीचे आ गई थी।’ सूबेदारनी उसी बालपन के प्रेम की याद दिलाती है और वचन लेती है और उसके चलते लहना सूूबेदार और सूबेदारनी के बेटे की जान अपनी जान की परवाह किए बिना बचाता है। यही तो उसने कहा था! यह है बचपन के प्रेम की वचनबद्धता!

एकदम मासूम और निर्मल! रोज का मिलना रोज का कहना कि तेरी कुड़माई हो गई और रोज ‘धत्त’ कहकर भाग जाना! किशोरवय का यह प्रेम एकदम निश्छल है और इसी में एक उम्मीद एक लगाव, एक चाहना, बढ़ती है कि फिर एक दिन अचानक वह अपनी ‘कुड़माई’ की खबर देती है और लहना का सब कुछ टूट-फूट जाता है। लहना पलटन में जाता है, लहना अब भी अकेला है।

फिर पच्चीस बरस बाद अचानक सूबेदारनी से लहना की मुलाकात होती है और बालपन का वह एकतरफा ‘प्लेटोनिक’ प्रेमालाप ताजा हो जाता है। लहना के मन में और उसके साथ पाठक के मन में एक हूक सी उठती है और बीच में बिखर गई प्रेम कहानी पूर्णता चाहने लगती है। ओह! वो किशोरोचित चुहल भरा, छेड़छाड़ वाला और ‘तेरी कुड़माई हो गई’ पूछने और जवाब में शरमाकर ‘धत्त’ कहकर भाग जाने वाला रिश्ता! वो अब भी कहीं बचा है। उसी की खातिर तो वचन मांगा जा रहा है और अगर उसे पूरा न किया तो लहना तूने क्या किया? और लहना अपनी कुर्बानी देकर भी उस वचन को निभाता है।

यही ‘उसने कहा था’ की ताकत है जो उसे अमर प्रेम की अमर कहानी बनाती है। यह इस कहानी के शिल्प की ताकत है, जो प्रेम और कुर्बानी के मूल्य को इतने जबरदस्त तरीके से कहती है कि हम भूले ही रहते हैं कि लहना साम्राज्यवादी युद्ध में भाड़े का टट्टू है, इसके बावजूद वह अपना वचन निभाता है। कहानी कहने का तरीका इतना जोरदार है कि हम इस कहानी में दिखते साम्राज्यवादी युद्ध के शोषक पहलू को एकदम भूल जाते हैं।

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