पीओके चुनाव इमरान की साजिश: लोकतंत्र का मुखौटा, दांव जबरन विलय का

पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर (पीओके) में हुए चुनाव नतीजों से साफ हो गया है कि इमरान खान की पार्टी- पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ पार्टी (पीटीआइ) सरकार बनाएगी।

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(बाएं) अजय बिसारिया, पाकिस्तान में भारत के पूर्व उच्चायुक्त, विष्णु प्रकाश, पूर्व आइएफएस। फाइल फोटो।

पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर (पीओके) में हुए चुनाव नतीजों से साफ हो गया है कि इमरान खान की पार्टी- पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ पार्टी (पीटीआइ) सरकार बनाएगी। उसे सरकार बनाने के लिए साधारण बहुमत मिल गया है और किसी अन्य पार्टी के समर्थन की जरूरत नहीं है। पीओके के चुनाव में इमरान खान की सरकार ने जम कर धांधली की। दरअसल, पीओके में चुनाव, लोकतंत्र के मुखौटे में दुनिया की आंखों में धूल झोंकने की एक कोशिश है। कहने को पीओके (पाकिस्तान इसे आजाद कश्मीर कहता है) का दर्जा स्वायत्त क्षेत्र का है, जिसको लेकर अंतरराष्ट्रीय बिरादरी के सामने पाकिस्तान रायशुमारी की बात उठाता है, लेकिन उसकी साजिश दरअसल इसे अपने देश का पांचवां प्रांत घोषित करने की है। पाकिस्तान ने बीते साल 11 दिसंबर से कई बदलाव करने शुरू कर दिए थे।

अब तक क्या हुआ

पाकिस्तान की इमरान खान सरकार ने पीओके के ‘आजाद जम्मू एंड कश्मीर मैनेजमेंट ग्रुप’ का नाम बदल जम्मू एंड ‘कश्मीर एडमिनिस्ट्रेटिव सर्विस’ कर दिया था और पीओके का दर्जा बदलने का कानूनी आधार तैयार करने के लिए संबंधित विभागों को निर्देश दिया। इस्लामाबाद से इसका दिशानिर्देश 11 दिसंबर को जारी किया गया। इससे कुछ दिन पहले ही पीओके के प्रधानमंत्री फारूक हैदर खान ने कहा था कि वह पीओके के आखिरी प्रधानमंत्री हो सकते हैं। पीओके और गिलगित बाल्टिस्तान के विलय के लिए संविधान संशोधन की तैयारी की गई है। पहले गिलगित बाल्टिस्तान क्षेत्र का पाक में विलय का प्रस्ताव लाया जा सकता है। गिलगित बाल्टिस्तान में इस आशंका को लेकर आवाजें उठ रही हैं। पाकिस्तान वहां असहमति दबाने में लगा है। स्वायत्तता मांगने वाले सौ से से ज्यादा लोग देशद्रोह के आरोप में हिरासत में हैं।

प्रांतीय असेंबली

पीओके में कहने के लिए एक प्रांतीय असेंबली है, जिसके चुनाव से सरकार का गठन होता है। हकीकत में यह प्रांतीय सरकार, केंद्रीय हुकूमत और सेना की कठपुतली होती है। पाकिस्तानी सेना अपने राजनीतिक हितों की पूर्ति के लिए पीओके में सक्रिय रहती है। भारत हमेशा से पीओके में चुनाव का विरोधी रहा है क्यों कि यह इलाका पुराने जम्मू-कश्मीर राज्य का हिस्सा है। 1947 में पाकिस्तान ने धोखे से जम्मू-कश्मीर राज्य की करीब 13 हजार 300 वर्ग किलोमीटर जमीन पर कब्जा कर लिया था। इसी भूभाग को पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर (पीओके) कहा जाता है। भारत का कहना है कि पाकिस्तान सैन्य अभियान में दखल किए गए किसी क्षेत्र की राजनीतिक स्थिति को बदल नहीं सकता है। इसलिए भारत पीओके में चुनाव को अवैध मानता है। पाकिस्तान ने आजाद कश्मीर चुनाव अधिनियम 2020 बनाया। पाकिस्तान ने अधिकतर आतंकी प्रशिक्षण केंद्र इन्हीं इलाकों में खोल रखे हैं।

पाकिस्तान की संवैधानिक स्थिति

पीओके विधानसभा में 53 सीटें हैं, जिसमें 2019 में जोड़ी गई चार सीटें शामिल हैं। यहां लगभग 20 लाख मतदाता हैं। पीओके पर पाकिस्तान की संवैधानिक स्थिति यह है कि वह देश का हिस्सा नहीं है, बल्कि कश्मीर का कथित रूप से ‘आजाद’ हिस्सा है। पाकिस्तान के संविधान में देश के चार प्रांतों – पंजाब, सिंध, बलूचिस्तान और खैबर पख्तूनख्वा को सूचीबद्ध किया गया है। पाकिस्तान के संविधान का अनुच्छेद एक पाकिस्तान के क्षेत्रों को सूचीबद्ध करता है और उसमें ऐसे राज्यों और क्षेत्रों के लिए प्रावधान है जो पाकिस्तान में शामिल हैं या हो सकते हैं, चाहे किसी भी तरीके से शामिल किया जाए।

पाकिस्तान के संविधान में जम्मू और कश्मीर का एक सीधा संदर्भ अनुच्छेद 257 में है, जो कहता है, ‘जब जम्मू और कश्मीर राज्य के लोग पाकिस्तान में शामिल होने का फैसला करते हैं, तो पाकिस्तान और राज्य के बीच उस राज्य के लोगों की इच्छा से संबंध निर्धारित किए जाएंगे।’ पीओके के क्षेत्र में तीन डिवीजनों के तहत 10 जिले शामिल हैं- मीरपुर, मुजफ्फराबाद और पुंछ तथा राजधानी मुजफ्फराबाद। जबकि हकीकत में पाकिस्तानी सेना कश्मीर के सभी मामलों पर अंतिम मध्यस्थ है- और पीओके में जो कुछ भी हो रहा है, उस पर कड़ा नियंत्रण रखता है। बलूचिस्तान प्रांत में भी पाकिस्तान लंबे वक्त से आजादी की आवाजों का दमन करता रहा है। बलूचिस्तान में सैकड़ों युवाओं को पाकिस्तानी सेना अगवा कर चुकी है, जिनका कोई अता-पता नहीं है। अगवा हुए लोगों के परिजनों को यह तक नहीं पता कि वे जिंदा भी हैं या पाकिस्तानी सेना ने यातना देकर उन्हें मार डाला है।

क्या कहता है पीओके का संविधान

पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर का अपना झंडा, राष्ट्रगान, विधान सभा, राष्ट्रपति, प्रधानमंत्र, उच्च न्यायालय, यहां तक कि अपना चुनाव आयोग और टैक्स वसूल करने का सिस्टम भी है, लेकिन राजनीतिक और प्रशासनिक रूप से यह पाकिस्तान से जुड़ा हुआ है और उसके नियंत्रण में है। पीओके के संविधान में ऐसे व्यक्तियों या राजनीतिक दलों के खिलाफ स्पष्ट निषेधाज्ञा है, जो ‘पाकिस्तान में राज्य के विलय की विचारधारा के प्रतिकूल या प्रतिकूल गतिविधियों में भाग लेने का प्रचार करते हैं। एक विधानसभा सदस्य ऐसा करने के लिए अयोग्यता को आमंत्रित करता है और उम्मीदवारों को एक हलफनामे पर हस् ताक्षर करना होता है जो कश्मीर के पाकिस्तान में प्रवेश के प्रति निष्ठा की शपथ लेता है। सभी व्यावहारिक उद्देश्यों के लिए, पीओके को पाकिस्तान सरकार लारा कश्मीर परिषद के माध्यम से चलाया जाता है, जो पाकिस्तान के प्रधानमंत्री की अध्यक्षता में नामित 14 सदस्यीय निकाय है।
छह सदस्य पाकिस्तान सरकार द्वारा नामित किए जाते हैं और आठ पीओके विधानसभा और सरकार से होते हैं, जिसमें ‘आजाद कश्मीर’ के प्रधानमंत्री’ भी शामिल हैं।’

क्या कहते हैं जानकार

पाकिस्तान एक हताश राष्ट्र है। पाकिस्तान अपने सीमा के अंदर अल्पसंख्यकों पर मानवधिकार हनन के मामलों की अनदेखी कर रहा है। यहां तक कि वह गिलगित-बाल्टिस्तान में मानवाधिकारों का हनन कर रहा है, जो पाकिस्तान के अवैध कब्जे वाला क्षेत्र है। पाकिस्तान 1989 से जम्मू एवं कश्मीर में आतंक का निर्यात कर रहा है।
विष्णु प्रकाश, पूर्व आइएफएस।

पाकिस्तान के अवैध कब्जे वाले कश्मीर में उसकी सेना के अत्याचारों के खिलाफ लोग बड़े संख्या पर सड़कों पर उतर रहे हैं। हजारों की संख्या में लोग आजादी के लिए मार्च निकाल रहे हैं। पाकिस्तान इनका सख्ती से दमन कर रहा है। लोकतंत्र की और रायशुमारी के मुद्दे उठाना बेमानी है।
अजय बिसारिया, पाकिस्तान में भारत के पूर्व उच्चायुक्त।

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