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विशेष: बदलाव की संस्कृति का श्री गणेश

गणपति पूजन के लोकोत्सव में तब्दील होने की घटना ने बीसवीं सदी के आरंभ तक भारतीय जनमन को आत्माभिमान से इतना भर दिया था कि गुलामी उनके लिए असह्य हो गई। नतीजतन स्वराज की मांग का अलख भारतीय मन की एक ऐसी अभिलाषा बन गई, जिसे प्राप्त करने के लिए वह किसी भी हद तक जाने के लिए तैयार था।

भारतीय समाज में गणपति उत्सव ने लोगों को एकजुट करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।

भारतीय लोक-परंपरा की उत्सवधर्मिता को लेकर खूब बातें होती हैं। पर इस तरह की बातों में लोक-विवेक का वह पक्ष गौण रह जाता है, जो लंबे समय से भारतीय लोकमानस और संस्कृति को गढ़ता आया है। व्रत-त्योहार और उत्सव के तौर पर देश में कई ऐसी सांस्कृतिक परंपराएं हैं जिन्होंने हर्ष और संघर्ष के अनगिनत तारीखी सर्ग रचे हैं। इनमें राष्ट्रीय आंदोलन के प्रेरक दौर से लेकर प्रकृति की चिंता तक क्या नहीं शामिल है। एक ऐसे दौर में जब लोक के लोप के साथ आधुनिकता के कुबेरी पसारा के खतरे की बात विभिन्न कारणों से होनी आम बात हो गई है, यह देखना खासा दिलचस्प है कि आस्था और परंपरा की इन लोक कड़ियों से हमारा देश-समाज आज कितना कटा-जुड़ा है। इसी आलोक में लोक और उत्सव से जुड़े कई रोचक प्रसंगों की चर्चा कर
रहे हैं प्रेम प्रकाश

भारत में लोक और आस्था का इतिहास एक ऐसी सांस्कृतिक यात्रा है, जिसमें समय और समाज की चेतना को न सिर्फ उभरने का संबल मिला बल्कि उसने इसके लिए एक प्रेरक भूमिका की भी रचना की। स्मृतियों और पौराणिकता से आगे निकलते हुए आधुनिक दौर के भी कई ऐसे संदर्भ हैं, जब परंपरा की लीक तारीखी बदलाव के साक्षी बने हैं। भारतीय संस्कृति की परंपरा और लोकमंगल के साझे की यह खासियत आज भी समाज और संवेदना को समझने का सबसे बड़ा सूत्र है। हिंदी साहित्य और आलोचना का तो पूरा वितान ही इस सूत्र की देन है। गणपति उत्सव ऐसी ही एक एक परंपरा है जिसने बाद के दौर में भी अपनी सार्थकता बनाए रखी। यहां तक कि भारतीय नवजागरण और राष्ट्रीय आंदोलन के दिनों में भी इस परंपरा ने क्रांतिकारी भूमिका निभाई।

गणपति उत्सव का तिलक
संस्कृति, संघर्ष और लोक विवेक के इस तारीख में और पीछे जाएं तो हम बीसवीं सदी से उन्नीसवीं सदी में पहुंच जाते हैं। राष्ट्रीय आंदोलन की जो गति और सघनता बीसवीं सदी के दूसरे दशक तक पहुंचते-पहुंचते समूचे हिंदुस्तान में दिखने लगी थी, उसकी भूमिका ऐसे ही एक सांस्कृतिक सुलेख के साथ लोकमान्य तिलक ने 1893 में रची थी। पूजा गणेश की और संदेश स्वराज का, महाराष्ट्र से शुरू हुए गणेशोत्सव की यह सांस्कृतिक गूंज पूरे देश में स्वराज को लेकर ऐतिहासिक रूप से जागरूक लोकमानस में तब्दील हो गई।

शिवाजी, पेशवा और गणेश
तिलक भारतीय संस्कृति और दर्शन की गहरी समझ रखते थे। ‘गीता रहस्य’ के रचयिता को गणपति से जुड़ी लोक आस्था का अंदाजा था। खासतौर पर मराठा परंपरा में गणपति पूजन की संस्कृति पुरानी है। शिवाजी से शुरू करें तो पेशवा राजाओं तक गणेशोत्सव को लेकर कई सांस्कृतिक उल्लेख मिलते हैं। पेशवाओं के महल शनिवार वाड़ा में पुणे के लोग और पेशवाओं के सेवक काफी उत्साह के साथ हर साल गणेशोत्सव मनाते थे। बड़ी बात यह है कि इसका स्वरूप शुरू से एक लोकोत्सव का था। भजन-कीर्तन से लेकर विभिन्न सांस्कृतिक आयोजन और अभावग्रस्त लोगों की मदद गणशोत्सव के साथ अभिन्न तौर पर पहले से जुड़े थे।

सौहार्द और सहयोग का लोक
अंग्रेज भारतीय संस्कृति के लोक तत्त्वों को तब भी कम से कम इस रूप में जरूर समझते थे कि इसकी बनावट में सहयोग और सौहार्द है। उन्हें खतरा लगता था कि इस तरह की लोक प्रवृत्ति ही लोगों को उनके खिलाफ एकजुट होने में मददगार न हो यही कारण है कि ब्रितानी हुकूमत के दिनों में किसी भी सांस्कृतिक कार्यक्रम या उत्सव को साथ मिलकर या एक जगह इकट्ठा होकर नहीं मनाने की सख्त हिदायत थी।

अंग्रेजों के इस खौफ को तिलक बखूबी समझ गए थे। उन्होंने पुणे में पहली बार सार्वजनिक रूप से गणेशोत्सव मनाया। आगे चलकर उनकी इस पहल ने आंदोलनात्मक शक्ल ली और स्वराज की मांग को लोगों को एकजुट करने में तारीखी भूमिका निभाई।

राष्ट्रीय एकता का प्रतीक
गणेश आज भी राष्ट्रीय सद्भाव और एकता के प्रतीक हैं तो उसके पीछे लोकमान्य तिलक की दूरदर्शी सोच और पहल है। गणेश पूजन के धार्मिक कर्मकांड को सार्वजनिक महोत्सव की शक्ल देते हुए इस बात की लगातार कोशिश की गई कि यह छूआछूत और सामाजिक गैरबराबरी जैसे सामाजिक दोषों को दूर करने का एक कारगर जरिया बने। यह वजह है कि तब तिलक की इस पहल का साथ स्वाधीनता संग्राम के अन्य नेताओं ने भी दिया। गणेशोत्सव के दौरान तिलक के अलावा नेताजी सुभाष चंद्र बोस, बैरिस्टर जयकर, रेंगलर परांजपे, पंडित मदन मोहन मालवीय, मौलिकचंद्र शर्मा, दादासाहेब खापर्डे और सरोजनी नायडू आदि तक शामिल होने और इस अवसर पर लोगों के बीच यादगार भाषण के कई तारीखी उल्लेख मिलते हैं।

गणपति पूजन के लोकोत्सव में तब्दील होने की घटना ने बीसवीं सदी के आरंभ तक भारतीय जनमन को आत्माभिमान से इतना भर दिया था कि गुलामी उनके लिए असह्य हो गई। नतीजतन स्वराज की मांग का अलख भारतीय मन की एक ऐसी अभिलाषा बन गई, जिसे प्राप्त करने के लिए वह किसी भी हद तक जाने के लिए तैयार था।

रॉलेट समिति की रपट
इन बातों को लेकर अंग्रेज तब कितने भयाक्रांत थे इसका पता रॉलेट समिति की उस रपट से भी चलता है जिसमें कहा गया था कि गणेशोत्सव के दौरान युवकों की टोलियां सड़कों पर घूम-घूम कर ब्रितानी हुकूमत के खिलाफ गीत गाती हैं और स्कूली बच्चे पर्चे बांटते हैं। जिसमें अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ हथियार उठाने और मराठों से शिवाजी की तरह विद्रोह करने का आह्वान होता है। साथ ही अंग्रेजी सत्ता को उखाड़ फेंकने को एक तरह का धर्मयुद्ध बताया जाता है।

कविगुरु की मातृवंदना
भारतीय स्वाधीनता आंदोलन के दिनों में ऐसी कई और भी पहल ने संस्कृति, समाज और स्वराज के साझे को रचने में बड़ी भूमिका निभाई। कविगुरु रवींद्रनाथ ठाकुर ने बंग-भंग का विरोध करते समय रक्षाबंधन को बंगाल निवासियों के पारस्परिक भाईचारे तथा एकता का प्रतीक बनाकर इस त्योहार को नई लोकप्रियता और व्याख्या दी। 1905 में उनकी प्रसिद्ध कविता ‘मातृभूमि वंदना’ का प्रकाशन हुआ, जिसमें वे लिखते हैं-
सप्त कोटि लोकेर करुण क्रंदन
सुनेना सुनिल कर्जन दुर्जन
ताइ निते प्रतिशोध मनेर मतन करिल
आमि स्वजने राखी बंधन।
एक हरीभरी परंपरा

आस्था, परंपरा और संस्कृति की पुरानी मिट्टी से बदलाव के सांचे गढ़ने का हुनर भारतीय समाज आज भूल गया है, ऐसा नहीं है। पिछले कुछ दशकों में जिस तरह प्रकृति और पर्यावरण की रक्षा का सवाल एक बड़ी चुनौती के तौर पर सामने आया है, उसमें खासतौर पर वृक्षों के प्रति लोक आस्था ने बड़ी भूमिका निभाई है। राजस्थान, उत्तर प्रदेश, बिहार, उत्तराखंड, बंगाल से लेकर कई दक्षिण के राज्यों में यह लोक आस्था आज वृक्षों को बचाने के एक शपथ का नाम है।

दिलचस्प है कि इस अनूठी पहल में समाज के हर वर्ग के लोगों के साथ अगर किसी की हिस्सेदारी सबसे बड़ी है तो वह महिलाओं की। एक संतोष की बात यह भी है कि इस हरित पहल से अब कई जगह की सरकारें भी जुड़ गई हैं।

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