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स्वामी विवेकानंद जयंती: ‘मैं उस प्रभु का सेवक हूं, जिसे अज्ञानी लोग मनुष्य कहते हैं’

स्वामी विवेकानंद का हिमालय तलहटी में बसे उत्तराखंड राज्य से गहरा संबंध रहा है जहां उन्होंने कुछ आत्मानुभूति और शांति के पल बिताए। उनकी जयंती 12 जनवरी को है और यह राष्ट्रीय युवा दिवस के रूप में मनाई जाती है।

Uttrakhand yatra सांकेतिक फोटो।

राधिका नागरथ

कहते हैं साधु और पानी बहता ही अच्छा, दोनों को एक जगह पर नहीं टिकना चाहिए, उससे उनमें मल नहीं आता। 1890 में जब स्वामी विवेकानंद के गुरु भाई स्वामी अखंडानंद ने उन्हें केदारनाथ और बद्रीनाथ तीर्थ स्थलों के बारे में बताया और उनसे अपने हिमालय में जाकर तपस्या के अनुभव साझा किए, तो स्वामी विवेकानंद ने निश्चय किया कि वे भी हिमालय जाएंगे।

उन्होंने 6 जुलाई को स्वामी शारदानंद को पत्र में लिखा जैसे ही मेरे पास कुछ किराया जमा हो जाएगा तो मैं अल्मोड़ा जाऊंगा और गढ़वाल में गंगा के किनारे किसी जगह समाधि लगाऊंगा। हिमालय जाने के लिए काफी समय से मेरा मन तड़प रहा है।

15 जुलाई को उन्होंने पुन: लिखा कि भविष्य के लिए कुछ मेरी योजनाएं हैं जिन्हें अभी मैं साझा नहीं कर सकता। अपनी हिमालय यात्रा से पहले स्वामी विवेकानंद शारदा मां के पास आज्ञा लेने गए और उनसे कहा कि वे तब तक नहीं लौटेंगे जब तक परम तत्व को नहीं पा लेंगे। उन्होंने अपने शिष्यों से कहा था जब तक कि मैं उस स्थिति को ना प्राप्त कर लूं कि मेरे छूने मात्र से व्यक्ति का रूपांतरण हो जाए, तब तक मैं वहां से नहीं लौटूंगा। हिमालय में एकांत में साधना कर उन्होंने यह प्राप्त किया।

जुलाई 1890 में वे अपने गुरुभाई स्वामी अखंडानंद के साथ, सब चिंताओं से मुक्त हो हृदय में असीम आनंद लेकर गंगा के किनारे पैदल हिमालय की तरफ बढ़े। पेड़ों के नीचे सोना और भिक्षा पर रहना ही उनकी दिनचर्या थी। विवेकानंद ने लिखा है कि उत्तराखंड में ही वेदों का सार्वभौमिक सत्य उजागर हुआ।

यह हमारे पूर्वजों की धरती है जहां मां पार्वती का आविर्भाव हुआ था। वे चाहते थे कि हिमालय में ऐसी शांत जगह स्थापित की जाए, जहां साधक अपनी साधना कर सके। उन्होंने एक जगह लिखा यह पर्वत शृंखलाएं हमारे जाति की स्वर्ण स्मृतियों से जुड़ी है।

अगर इन हिमालय शृंखलाओं को आध्यात्मिक भारत के इतिहास से निकाल दिया जाए, तो शायद कुछ भी नहीं बचेगा। इसलिए, यहां पर ऐसा केंद्र होना चाहिए जहां से ना केवल समाज के उत्थान के क्रियाकलाप हो सकें बल्कि वह ध्यान साधना का भी केंद्र हो।

कुमाऊं की यात्रा करते हुए विवेकानंद काकडी घाट पर आए जो कोसी और सवाल नदियों का संगम है और वहां एक पीपल के पेड़ के नीचे उन्होंने ध्यान साधना की । समाधि से उठ चेतनता में आने के बाद उन्होंने स्वामी अखंडानंद से साझा किया, मैं अपने जीवन के कुछ महान क्षणों के बीच से गुजरा। इस पीपल के पेड़ के नीचे जीवन का बहुत बड़े रहस्य का समाधान हुआ।

मैंने व्यष्टि और समष्टि का एकाकार अनुभव किया। इस देह रूपी पिंड में वह सभी कुछ है जो बाहर ब्रह्मांड में अभिव्यक्त है। मैंने पूरा ब्रह्मांड एक अणु में पाया। वह पूरा दिन स्वामी उच्च भाव अवस्था में रहे, उन्होंने बांग्ला में अपने भाव की अभिव्यक्ति की -यह पिंड और ब्रह्मांड एक ही सतह पर बने हैं। जिस तरह जीवात्मा जागृत शरीर में कैद है उसी तरह परमात्मा प्रकृति में। दोनों एक ही हैं सिर्फ शांत मन से ही इन दोनों में का भेद जाना जा सकता है।

अगस्त के अंत तक विवेकानंद अखंडानंद के साथ में अल्मोड़ा पहुंचे कुछ देर वहां रहने के बाद भी गढ़वाल हिमालय गए। भयंकर सर्दी के कारण स्वामी अखंडानंद का स्वास्थ्य बिगड़ा इसलिए वे दोनों टिहरी आ गए।

वहां टिहरी के दीवान रघुनाथ भट्टाचार्य को जब पता चला, तो उन्होंने स्वामी जी की सेवा सुश्रुषा के लिए इंतजाम किया। जब भी स्वामी जी ध्यान साधना के लिए एकांत में समय बिताना चाहते थे तो परिस्थिति वश उनको रुकना पड़ जाता था। यहां भी गणेश प्रयाग में उनके रहने का इंतजाम किया गया किंतु स्वामी अखंडानंद को ब्रोंकाइटिस हो गया, जिस कारण स्वामी विवेकानंद अंतत: देहरादून आ गए।

देहरादून में स्थानीय शिव मंदिर के पास में एक पानी की बारी थी, जहां किनारे पर कुछ साधुओं के लिए कुटिया बनी थी। वहीं पर स्वामी तुरियानंद तपस्या कर रहे थे, वे विवेकानंद के गुरु भाई थे । एक दिन विवेकानंद अंबिका देवी के मंदिर में गए और जब वह वहां से लौट रहे थे तो तुरियानंद से उनकी भेंट हो गई। फिर कुछ समय आनंद में दोनों गुरु भाई ने बिताया।

स्वामी विवेकानंद की हरिद्वार को महत्त्वपूर्ण दिन है जिसके लिए संसार सदा ऋणी रहेगा। स्वामी जी ने अनुभव किया था कि साधु जो केवल भिक्षा पर रहते हैं उनके अस्वस्थ होने पर उनकी देखरेख का कोई इंतजाम नहीं है।

उन्होंने अपने शिष्यों निश्चलानंद और कल्याणानंद को आदेश दिया कि वे एक चिकित्सा केंद्र की शुरूआत करें और 1901 में रामकृष्ण मिशन सेवाश्रम की स्थापना कनखल में एक छोटे से कमरे में की गई और आज यह 200 बिस्तरों का अस्पताल सभी आधुनिक सुविधाओं से युक्त है और यहां पर आज भी साधुओं की और गरीब व्यक्तियों की निशुल्क चिकित्सा की जाती है।

हाल ही में यहां पर डायलिसिस सेंटर की भी सुविधा शुरू हुई है। इस सेवाश्रम में जीव सेवा ही ईश्वर सेवा के सिद्धांत को यहां के कर्म योगी साधु प्रतिपादित कर रहे हैं।

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