नरेंद्र मोदी का यह प्‍लान मंजूर हो गया तो पूरे देश में खत्‍म हो सकता है विपक्ष का वजूद

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पूरे देश में एक साथ चुनाव कराना चाहते हैं। उनका मानना है कि लोकसभा और विधानसभा के चुनाव अलग-अलग कराने पर ज्यादा खर्च होने के अलावा विकास कार्य भी प्रभावित होते हैं। विधि आयोग ने भी केंद्र की योजना का समर्थन किया है, लेकिन आलोचक इसे लोकतंत्र और देश के संघीय ढांचे के लिए खतरा मानते हैं।

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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह।

नरेंद्र मोदी की सरकार लोकसभा और विधानसभा चुनाव एक साथ कराने के उपाय तलाशने में जुटी है। नीति आयोग भी इसको लेकर मुकम्मल तरीका निकालने में जुटा है। इससे वर्ष भर होने वाले चुनाव और उस पर आने वाले खर्च को कम करने में मदद मिलने और विकास कार्यों में बाधा न आने की दलील दी जा रही है। लेकिन, आईडीएफसी इंस्टीट्यूट के अध्ययन से मिले आंकड़ों पर भरोसा करें तो ‘एक देश, एक चुनाव’ के परिणाम बेहद गंभीर हो सकते हैं। लोकसभा और विधानसभा के चुनाव एक साथ होने पर विपक्ष का अस्तित्व समाप्त हो सकता है। इंस्टीट्यूृट द्वारा छापी गई एक रिपोर्ट में कहा गया है कि ऐसा होने पर 77 फीसद ऐसी संभावना हो सकती है कि मतदाता राज्यों में भी उसी पार्टी को वोट दे जिसके लिए उन्होंने केंद्र में मतदान किया है। लिहाजा, केंद्र के साथ राज्यों में भी एक ही दल का शासन होगा। ऐसे में, पूरे देश से विपक्ष का वजूद खत्म हो सकता है। ‘ब्लूमबर्ग’ की रिपोर्ट के अनुसार, देश में हर साल औसतन छह राज्यों में चुनाव होते हैं।

‘लोकतंत्र और संघीय ढांचे के लिए खतरा’: पीएम मोदी की ‘एक देश, एक चुनाव’ की योजना का विरोध भी किया जा रहा है। आलोचक इस कदम को लोकतंत्र और देश के संघीय ढांचे के लिए खतरा मानते हैं। उनका कहना है कि ऐसा होने से किसी भी राज्य की सरकार को सत्ता से बेदखल करना आसान हो जाएगा। थिंक टैंक सीएसडीएस के निदेशक संजय कुमार ने कहा, “इससे देश का संघीय ढांचा तबाह हो जाएगा। लोकसभा चुनाव से विधानसभा के चुनाव प्रभावित होंगे जो क्षेत्रीय दलों के हितों के खिलाफ होगा।” पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त एस.वाई. कुरैशी लोकसभा और विधानसभा चुनावों को एक साथ कराने की योजना को कठिन मानते हैं। उन्होंने कहा, “क्षेत्रीय पार्टियां जिस तरह से अपनी संघीय स्वायत्तता और राजनीतिक स्वच्छंदता की लगातार तसदीक कर रहे हैं, उसे देखते हुए वर्ष 2019 में एक साथ चुनाव (लोकसभा और विधानसभा) कराने में दिक्कत पेश आएगी। इस मसले पर राजनीतिक सहमति बनाना भी बहुत मुश्किल होगा।” बता दें कि भारत में बहुदलीय पद्धति को अपनाया गया है। ऐसे में, देश भर में एक चुनाव कराने के लिए सरकार को संविधान में संशोधन करना पड़ेगा। इसके लिए संसद के साथ दो-तिहाई राज्यों की विधानसभाओं का समर्थन भी अनिवार्य होता है। यह सरकार के लिए कतई आसान नहीं होगा।

चुनावी खर्च में व्यापक बचत की संभावना: ‘एक देश, एक चुनाव’ के पीछे मोदी सरकार धन, समय और ऊर्जा बचत की भी दलील देती है। चुनाव आयोग के आंकड़ों के आधार पर नीति आयोग का आकलन है कि पूरे देश में लोकसभा और विधानसभा का चुनाव एक साथ कराने पर 45 अरब रुपए का खर्च आएगा। यहां यह उल्लेखनीय है कि वर्ष 2014 के लोकसभा चुनाव में 38.7 अरब रुपए खर्च हुए थे। ऐसे में, तकरीबन 7 अरब रुपए और खर्च कर देश भर में एक साथ चुनाव कराया जा सकता है। बता दें कि वर्ष 2009 के लोकसभा चुनाव में तकरीबन 11 अरब रुपए खर्च हुए थे जो 2014 में अचानक से बढ़ गया था। आईडीएफसी की रिपोर्ट के अनुसार, प्रत्येक विधानसभा चुनाव में औसतन 3 अरब रुपए का खर्च आता है। भारत में कुल 29 राज्य हैं। इसके अलावा दो केंद्र प्रशासित क्षेत्रों दिल्ली और पुड्डुचेरी में भी विधानसभा के चुनाव होते हैं। ऐसे में कुल मिलाकर सिर्फ विधानसभा चुनावों में ही तकरीबन 90 अरब रुपए खर्च हो जाते हैं। एक साथ चुनाव कराने पर इसमें से 45 अरब रुपए की बचत की जा सकेगी।

‘एक साथ चुनाव सराहनीय कदम’: लोकसभा और विधानसभा के चुनाव एक साथ कराने की योजना का समर्थन करने वाले इसे बेहतर कदम बताते हैं। ब्रॉकरेज कंपनी प्रभुदास लीलाधर के सीईओ अजय बोदके ने कहा, “यह सरकार का एक सराहनीय कदम है। इससे चुनाव खर्च में बचत के साथ सरकार लगातार होने वाले चुनावों से ध्यान हटाकर मतदाताओं से किए गए वादों को पूरा करने पर ध्यान लगा सकेगी।”

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