असम को राज्य की स्वदेशी आबादी का आत्मविश्वास बहाल करने के लिए एक “ध्रुवीकरण करने वाले व्यक्तित्व” की आवश्यकता थी और अब जबकि “लोगों को यह महसूस होता है कि ऐसी सरकार है जो केवल एक समुदाय का ही ध्यान नहीं रखेगी”, इसलिए अब ध्रुवीकरण की कोई आवश्यकता नहीं है। यह बात मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा ने कही।
शुक्रवार को द इंडियन एक्सप्रेस आइडिया एक्सचेंज में विभिन्न मुद्दों पर पूछे गए सवालों के जवाब में सरमा ने मणिपुर में जारी संघर्ष पर भी अपनी बात रखी। उन्होंने कहा कि इसका समाधान केवल उन समुदायों के बीच बातचीत से ही निकल सकता है, जो इस संघर्ष में शामिल हैं।
कांग्रेस पर बोलते हुए उन्होंने आरोप लगाया कि राहुल गांधी ने मुख्य विपक्षी दल को उसकी पारंपरिक “मध्यमार्गी” राजनीति से हटाकर जेएनयू (JNU) से “उधार ली गई” वामपंथी प्रभाव वाली, जाति-केंद्रित राजनीति की ओर मोड़ दिया है।
जब उनसे पूछा गया कि क्या मई में दोबारा चुने जाने के बाद अगले पांच वर्षों में उनका एक अधिक संयमित चेहरा देखने को मिलेगा, तो उन्होंने कहा, “मुझे नहीं लगता कि अब असम में ध्रुवीकरण की जरूरत है। मैंने उस खतरे पर नियंत्रण कर लिया है। अब कोई भी असमिया लोगों की ओर उंगली नहीं उठा सकता। किसी में मंदिरों की जमीन पर अतिक्रमण करने की हिम्मत नहीं है और न ही किसी लड़की को उसकी इच्छा के खिलाफ उठा ले जाने की हिम्मत है। अब लोग व्यवस्थित हो गए हैं और कानून का पालन कर रहे हैं। जब हर कोई कानून का पालन करेगा, तब मुझे हर दिन बोलने की जरूरत नहीं होगी। मैं तभी बोलूंगा, जब उसकी जरूरत होगी।”
सरमा ने कहा कि स्वदेशी समुदाय, जिसमें “असमिया मुसलमान” भी शामिल हैं, इस बात से निराश था कि वह खुद को अल्पसंख्यक बनता हुआ महसूस कर रहा है। ऐसे समय में उसे एक ऐसे ध्रुवीकरण करने वाले नेता की जरूरत थी, जो उसकी ओर से आवाज उठा सके।
उन्होंने कहा, “क्योंकि हमारे पास ऐसा कोई व्यक्तित्व नहीं था, इसलिए लोगों में निराशा थी। मैंने उस जरूरत को समझा। अब लोगों में आत्मविश्वास है। संख्यात्मक रूप से कुछ भी नहीं बदला है, लेकिन लोगों को लगता है कि अब ऐसी सरकार है जो केवल एक समुदाय का ही ध्यान नहीं रखेगी, बल्कि हमारी भी बात सुनेगी। पहले उन्हें लगता था कि वे बिखरे हुए हैं और अपनी सरकार बनाने की ताकत उनके पास नहीं है।”
उन्होंने कहा, “लोग एक ध्रुवीकरण करने वाला व्यक्तित्व चाहते थे… और मैंने वह भूमिका निभाई।” इस वर्ष हुए राज्य विधानसभा चुनाव में अपने विवादित बयानों के लिए चर्चित रहे सरमा ने भाजपा का नेतृत्व करते हुए शानदार जीत दर्ज की और 126 सदस्यीय विधानसभा में कांग्रेस को 19 सीटों तक सीमित कर दिया।
मणिपुर में जारी तनाव पर पूछे गए सवाल के जवाब में सरमा ने कहा कि यह संघर्ष समुदायों के बीच है और इसका समाधान भी केवल उन्हीं के बीच बातचीत से निकल सकता है, बाहरी हस्तक्षेप से नहीं।
उन्होंने कहा, “मणिपुर में संघर्ष समुदायों के बीच है – कुकी और मैतेई समुदायों के बीच, और अब कुकी तथा नागा समुदायों के बीच भी। यह बहुत गहरा संघर्ष है और इसका समाधान कभी भी बाहरी हस्तक्षेप से नहीं हो सकता। हम कानून-व्यवस्था बहाल कर सकते हैं, लेकिन दो भाइयों को बैठाकर उनका विवाद नहीं सुलझा सकते। हम उन्हें बातचीत के लिए प्रोत्साहित कर सकते हैं, लेकिन मजबूर नहीं कर सकते। खासकर आदिवासी समुदायों के बीच ऐसे विवादों का समाधान आप नहीं कर सकते। भारत सरकार के लिए उनके पास कोई ज्ञापन या मांग-पत्र नहीं है। वे कहते हैं कि यह उनकी लड़ाई है और इसका समाधान भी उन्हें ही खोजना चाहिए।”
उन्होंने आगे कहा, “आप उन पर बंदूक तानकर यह नहीं कह सकते कि अगर कल शाम छह बजे तक तुम लोग अपने मुद्दे नहीं सुलझाओगे तो हम कुछ करेंगे। हम कानून-व्यवस्था बनाए रख सकते हैं, लेकिन समाधान समुदाय के भीतर से ही आएगा। हम सिर्फ उन्हें बातचीत के लिए प्रोत्साहित कर सकते हैं।”
वर्ष 2015 में कांग्रेस छोड़ने के बाद से ही राहुल गांधी के आलोचक रहे सरमा ने आरोप लगाया कि विपक्षी दल ने अपनी वैचारिक दिशा मध्यमार्गी राजनीति से बदलकर वामपंथी राजनीति की ओर कर ली है।
उन्होंने कहा, “कांग्रेस ने कभी यह सवाल नहीं पूछा कि ‘तुम्हारी जाति क्या है?’ राहुल गांधी ने एक पत्रकार से यह सवाल पूछा। उन्होंने यह तरीका सीधे जेएनयू और वामपंथ से लिया है। जब वह अपनी पार्टी में किसी को मुख्यमंत्री बनाना चाहते हैं, तब वह कभी उसकी जाति नहीं पूछते। जब उन्होंने कर्नाटक में ओबीसी नेता सिद्धारमैया की जगह गैर-ओबीसी डी. के. शिवकुमार को आगे किया, तब उन्होंने उनकी जाति नहीं पूछी। यह पूरी तरह वामपंथी शैली है। वे जो कहते हैं, उसका पालन अपने परिवार में नहीं करते। अब कांग्रेस के नारे और एआईएसए (AISA) के नारे एक जैसे हो गए हैं।”
सरमा ने कहा, “मैं 22 वर्षों तक कांग्रेस में रहा। वहां कभी डफली वाले (सड़क आंदोलनों में व्यापक रूप से इस्तेमाल होने वाला हाथ में पकड़ा जाने वाला छोटा ढोल) की संस्कृति नहीं थी। वहां कभी जातिवाद की बात नहीं होती थी। कांग्रेस हमेशा एक मध्यमार्गी दल रही। इस तरह का वैचारिक बदलाव पहले कभी नहीं था। अब उसने अपनी मध्यमार्गी पहचान खो दी है। यही कारण है कि नेहरू, गांधी और सरदार पटेल के अनुयायी आज की कांग्रेस से खुद को जुड़ा हुआ महसूस नहीं करते।”
यह भी पढ़ें: क्या हिमंता सरकार 18 साल से ऊपर के लोगों का आधार नामांकन रोक सकती है? जानिए क्या कहते हैं एक्सपर्ट
मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा ने घोषणा की कि उनकी सरकार 18 वर्ष से अधिक आयु के वयस्कों को आधार कार्ड जारी करना बंद कर देगी। हिमंता ने यह कदम अवैध बांग्लादेशी प्रवासियों द्वारा भारतीय पहचान दस्तावेजों को प्राप्त करने पर रोक लगाने के उपाय के रूप में प्रस्तुत किया। हालांकि, इसको लेकर एक्सपर्ट की राय बंटी हुई है कि क्या राज्य सरकार, जिसकी भूमिका आधार व्यवस्था में केवल एक “रजिस्ट्रार” की होती है, आधार नामांकन के लिए पहले से मंजूरी (प्री-क्लियरेंस) लेने की शर्त लगा सकती है। क्योंकि ऐसी कोई व्यवस्था न तो 2016 के आधार कानून में है और न ही भारतीय विशिष्ट पहचान प्राधिकरण (UIDAI) द्वारा बनाए गए नियमों और प्रक्रियाओं में शामिल है। पूरी खबर पढ़ने के लिए यहां पर करें क्लिक
