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बढ़ा चढ़ाकर पेश किया था डेटा, बिल्डर्स पर भी हुई मेहरबानी, IAS अफसर ने चुनावी मौसम में खोली रैपिड मेट्रो गुड़गांव में घपले की पोल

विज्ञान और प्रौद्योगिकी के प्रधान सचिव आईएएस अधिकारी खेमका ने सीएम मनोहर लाल खट्टर को लिखे पत्र में हरियाणा शहरी विकास प्राधिकरण पर (एचएसवीपी, पहले हुडा) और रियायती कंपनियों को 'शेडो बॉक्सिंग' में शामिल होने का आरोप लगाया।

डीएलएफ ने रैपिड मेट्रो का प्रस्ताव रखा था। (फाइल फोटो)

हरियाणा के चुनाव के मौसम में गुरुग्राम रैपिड मेट्रो को लेकर घपले का खुलासा हुआ है। रैपिड मेट्रो के 11.6 किलोमीटर की दूरी के लिए यात्रियों की अनुमानित संख्या को बढ़ाचढ़ा कर दिखाने के साथ ही इस प्रोजेक्ट को इकलौते बोलीदाता को सौंपने की बात सामने आई है।

इस क्रम में रियल स्टेट कंपनी को फायदा पहुंचाने की बात भी सामने आ रही है। आईएएस अधिकारी अशोक खेमका ने इस संबंध में मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर को पत्र लिखा है। पत्र में खेमका ने ट्रैफिक को लेकर गलत प्रस्तुतिकरण, एकतरफा रियायती समझौता की बात कही है। खेमका ने पत्र में इस प्रोजेक्ट को इकलौते बोलीदाता को देने की बात कही है।

विज्ञान और प्रौद्योगिकी के प्रधान सचिव आईएएस अधिकारी खेमका ने सीएम मनोहर लाल खट्टर को लिखे पत्र में हरियाणा शहरी विकास प्राधिकरण पर (एचएसवीपी, पहले हुडा) और रियायती कंपनियों को ‘शेडो बॉक्सिंग’ में शामिल होने का आरोप लगाया। इंडियन एक्सप्रेस के पास मौजूद दस्तावेजों के अनुसार रैपिड मेट्रो प्रोजेक्ट की शुरुआत 2007 में DLF समूह के प्रस्ताव से हुई।

इस प्रोजेक्ट से डीएलएफ के साथ ही अन्य रियल स्टेट कंपनियों को सरकार की तरफ से मंजूर अपने फ्लोर एरिया रेशो को बढ़ाने में मदद मिली। इसके साथ ही मेट्रो के समीप होने के कारण प्रॉपर्टी के दाम में बढ़ोतरी का फायदा हुआ। रैपिड मेट्रो प्रोजेक्ट दो चरण में दिया गया। पहला चरण सिकंदरपुर से डीएलएफ फेस-2 तक 5.1 किलोमीटर का था। वहीं दूसरा चरण में में प्रोजेक्ट की दूरी सिकंदरपुर मेट्रो स्टेशन से सेक्टर 56 तक 6.5 किलोमीटर रैपिड मेट्रो का निर्माण होना था।

दोनों चरणों की परियोजना लागत क्रमशः 1088 करोड़ और 2143 करोड़ रुपये थी। दो चरण में को मिलाकर रोजाना यात्रियों की संख्या को 6 लाख रुपये से अधिक अनुमान लगाया था। जबकि वास्तविक यात्री संख्या 55 हजार के करीब थी। पिछले महीने भेजे गए पत्र में खेमका ने लिखा कि यह डीएलएफ, आईएलएफएस, हरियाणा सरकार और बैंकों के बीच एक ‘स्वीटहार्ट डील’ थी। खेमका ने सरकार से ‘कॉरपोरेट के पर्दे को हटाने’ का आग्रह किया। उन्होंने “अनुबंध को समाप्त करने” के लिए रियायतकर्ता को जिम्मेदार ठहराया।

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