दिल्ली हाई कोर्ट ने आबकारी नीति मामले में न्यायमूर्ति स्वर्ण कांता शर्मा को हटाने की मांग करने वाली अरविंद केजरीवाल, मनीष सिसोदिया और अन्य की याचिका को खारिज कर दिया है। अपने फैसले में जस्टिस शर्मा ने अपने ऊपर लगे पक्षपात के आरोपों को खारिज कर दिया। आइए जानते हैं कि किस आधार पर उन्होंने खुद को इस मामले से अलग करने की याचिका को खारिज किया।
निष्पक्षता की धारणा
जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा ने कहा कि न्यायाधीश की निष्पक्षता की एक पूर्वधारणा होती है और न्यायाधीश को मामले से हटाने की मांग करने वाले याचिकाकर्ता को इस पूर्वधारणा का खंडन करना होता है। उन्होंने यह भी कहा कि आवेदकों को जो व्यक्तिगत शक था, वह इतना मजबूत नहीं था कि यह माना जाए कि न्यायाधीश पक्षपात कर सकते हैं।
आरएसएस के एक कार्यक्रम में भाग लेने पर
बार एंड बेंच की रिपोर्ट के मुताबिक, अखिल भारतीय अधिवक्ता परिषद की तरफ से आयोजित किए गए कार्यक्रमों में हिस्सा लेने के आरोप पर उन्होंने कहा कि वे राजनीतिक कार्यक्रम नहीं थे। उन्होंने कहा, “ये कार्यक्रम नए आपराधिक कानूनों और महिला दिवस के आयोजनों से संबंधित थे या वकीलों के युवा सदस्यों के साथ संवाद स्थापित करने के लिए आयोजित किए गए थे। कई न्यायाधीश इन आयोजनों में भाग लेते रहे हैं। इस तरह की भागीदारी को वैचारिक पूर्वाग्रह का संकेत देने के लिए इस्तेमाल नहीं किया जा सकता है।” जस्टिस शर्मा ने इस बात पर जोर दिया कि बार और बेंच के बीच का संबंध केवल अदालतों तक ही सीमित नहीं है।
जस्टिस शर्मा के बच्चों के केंद्रीय सरकारी पैनल के वकील होने के संबंध में
जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा ने कहा, “भले ही इस न्यायालय के रिश्तेदार सरकारी पैनल में हों, वादी को यह दिखाना होगा कि इसका वर्तमान मामले या इस न्यायालय की निर्णय लेने की शक्ति पर क्या प्रभाव पड़ता है। ऐसा कोई संबंध नहीं दिखाया गया है।” उन्होंने आगे कहा कि न्यायाधीशों के बच्चों को वकालत करने से नहीं रोका जा सकता क्योंकि ऐसा करना उनके मौलिक अधिकारों को छीनने के बराबर होगा।
उन्होंने कहा, “अगर किसी राजनेता की पत्नी राजनेता बन सकती है, अगर किसी राजनेता के बच्चे राजनेता बन सकते हैं, तो यह कैसे कहा जा सकता है कि किसी न्यायाधीश के बच्चे वकालत के पेशे में नहीं आ सकते? इसका मतलब होगा न्यायाधीशों के परिवार के मौलिक अधिकारों को छीनना।” उन्होंने आगे कहा कि उनके किसी भी बच्चे का आबकारी नीति मामले से कोई संबंध नहीं है।
केजरीवाल के पक्ष में जारी किए गए आदेशों को उजागर नहीं किया गया
जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा ने कहा, “अरविंद केजरीवाल की पार्टी से जुड़े लोगों ने यह तर्क नहीं दिया कि उनके पक्ष में कोई अंतरिम आदेश पारित नहीं किया जाना चाहिए। इस न्यायालय के समक्ष अरविंद केजरीवाल की पार्टी के नेताओं सहित कई अन्य मामले लंबित हैं। इस न्यायालय और इस न्यायाधीश द्वारा ऐसे कई आदेशों को जारी रखा गया है, लेकिन तब कोई आरोप नहीं लगाए गए थे क्योंकि शायद आदेश उनके पक्ष में था।”
सुप्रीम कोर्ट ने आदेशों को रद्द नहीं किया
दिल्ली हाई कोर्ट की जस्टिस शर्मा ने इस बात पर भी जोर दिया कि सुप्रीम कोर्ट ने उनके आदेशों की जाचं की थी लेकिन उनके खिलाफ कोई भी प्रतिकूल टिप्पणी नहीं की थी। फैसले में कहा गया, “उन्हें (आप सांसद संजय सिंह को) ईडी द्वारा दी गई रियायत के आधार पर (सुप्रीम कोर्ट द्वारा) जमानत दी गई थी और मेरे आदेश पर कोई टिप्पणी नहीं की गई थी। इसी तरह, मनीष सिसोदिया मामले में, इस न्यायालय द्वारा पारित आदेशों पर (सुप्रीम कोर्ट द्वारा) कोई निष्कर्ष या टिप्पणी नहीं की गई थी।”
गृह मंत्री अमित शाह के बयान पर
केजरीवाल ने केंद्रीय मंत्री अमित शाह के उस बयान का भी हवाला दिया था, जिसमें उन्होंने कहा था कि उन्हें हाई कोर्ट से कोई राहत नहीं मिलेगी इसे उन्होंने खुद को इस मामले से अलग करने का आधार बताया था। इस पर जस्टिस शर्मा ने कहा, “कोई भी राजनेता या केंद्रीय मंत्री ऐसी राय व्यक्त कर सकता है जो वादी के प्रतिकूल हो। राजनेता या खुद केजरीवाल द्वारा सार्वजनिक रूप से या राजनीति में दिए गए बयानों पर कोई नियंत्रण नहीं है। यह सर्वविदित है कि विपक्षी राजनीतिक दल भी ऐसे बयान देते हैं।”
कोई सबूत नहीं, केवल संकेत
जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा ने आगे कहा कि उनको मामले से अलग करने वाली याचिका सबूतों के साथ नहीं बल्कि संकेतों के साथ दायर की गई थी। उन्होंने कहा, “मुझे यह भी कहना होगा कि मुझे इस मामले से अलग करने की मांग वाली फाइल सबूतों के साथ नहीं आई थी, यह मेरे पास मेरी ईमानदारी, निष्पक्षता और तटस्थता पर लगाए गए आरोपों, संकेतों और संदेहों के साथ आई थी।”
खुद को इस मामले से अलग रखने से राजनीतिक पक्षपात का आभास होगा
न्यायाधीश ने कहा कि उनके खुद को इस मामले से अलग करने से जनता को यह धारणा हो सकती है कि जज किसी विशेष राजनीतिक दल या विचारधारा से जुड़े हुए हैं। उन्होंने आगे कहा कि इससे संविधान पर गंभीर प्रभाव पड़ेगा और संस्था की विश्वसनीयता भी प्रभावित होगी।
जस्टिस शर्मा ने फैसले में कहा, “आवेदनों में दी गई बातें केवल अटकलों पर आधारित थीं। अगर मैं उन्हें स्वीकार कर लेती, तो इससे एक परेशान करने वाली मिसाल कायम हो जाती। मैंने अपने सामने आए सभी सवालों पर निडर होकर फैसला किया है। यह अदालत आरोपों और इशारों के बोझ तले दब नहीं सकती। यह अदालत न तो झुकेगी और न ही पीछे हटेगी, खासकर तब जब ऐसा करने से खुद इस संस्था की विश्वसनीयता पर असर पड़ता हो। तब यह न्याय का प्रशासन नहीं, बल्कि न्याय का प्रबंधन कहलाएगा।”
मीडिया द्वारा गढ़ा गया नैरेटिव, केजरीवाल के लिए ‘विन-विन’ स्थिति
कोर्ट ने कहा कि केजरीवाल ने अपने लिए एक ऐसी स्थिति बना ली है जिसमें हर हाल में उन्हीं का फायदा है। जस्टिस शर्मा ने कहा, “अगर उन्हें राहत नहीं मिलती, तो वे कहेंगे कि उन्होंने तो पहले ही इस नतीजे का अंदाजा लगा लिया था और अगर उन्हें राहत मिल जाती है, तो वे कह सकते हैं कि कोर्ट ने दबाव में आकर फैसला दिया। मुकदमा लड़ने वाला व्यक्ति इस स्थिति को अपने नैरेटिव के हिसाब से, जिस भी तरह से उसे सूट करे, वैसे पेश कर सकता है।”
कर्तव्य का त्याग नहीं कर सकते
जस्टिस शर्मा ने कहा कि खुद को इस मामले से अलग रखना विवेकपूर्ण नहीं बल्कि कर्तव्य का परित्याग होगा और यह आत्मसमर्पण का कार्य होगा। उन्होंने कहा, “यह न्यायालय आरोपों और इशारों से विचलित नहीं हो सकता। यह न्यायालय तब तक पीछे नहीं हटेगा जब तक ऐसा करने से संस्था की विश्वसनीयता प्रभावित न हो। यह न्याय का प्रशासन नहीं, बल्कि न्याय का प्रबंधन होगा।”
कौन हैं जस्टिस स्वर्णकांता शर्मा?
दिल्ली हाईकोर्ट की वेबसाइट पर मौजूद जानकारी के मुताबिक, जस्टिस स्वर्णकांता शर्मा ने दिल्ली विश्वविद्यालय से इंग्लिश लिटरेचर में बीए (ऑनर्स) किया था। 1991 में उन्होंने एलएलबी की डिग्री हासिल की और 2004 में एलएलएम की उपाधि प्राप्त की। जस्टिस शर्मा के पास मार्केटिंग मैनेजमेंट, विज्ञापन और जनसंपर्क में डिप्लोमा भी है। पढ़ें पूरी खबर…
