Nagarmal Bajoria Dharti Pakad Passes Away: नागरमल बाजोरिया उर्फ ‘धरती पकड़’ का गुरुवार को भागलपुर में 96 साल की उम्र में निधन हो गया। सुजागंज मुख्य बाजार के रहने वाले बाजोरिया का अंतिम संस्कार शुक्रवार को बरारी घाट पर किया जाएगा।

बाजोरिया ने 281 चुनाव लड़े लेकिन कभी एक भी नहीं जीते। उनका मशहूर कथन था, “मैं चुनाव नहीं हारता, बल्कि जनता हमेशा हारती है।” उनका चुनावी सफर नगर निगम चुनावों से लेकर पटना और दिल्ली के संसदीय चुनावों तक फैला हुआ था। उन्होंने इंदिरा गांधी, राजीव गांधी, संजय गांधी, अटल बिहारी वाजपेयी और लालकृष्ण आडवाणी जैसे कई दिग्गज राजनेताओं के खिलाफ चुनाव लड़ा।

उनका पहला चुनावी मुकाबला 1969 में तत्कालीन राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार वी.वी. गिरि के खिलाफ था। बाद में उन्होंने भारत के राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति के पदों के लिए 18 बार चुनाव लड़ा, उनका आखिरी, 281वां चुनाव 2019 में हुआ था।

कौन थे नागरमल बाजोरिया?

अविभाजित भारत के लाहौर में जन्मे बाजोरिया 1930 के दशक में भागलपुर चले गए और शहर के मुख्य बाजार में अपना व्यवसाय स्थापित किया। उन्होंने सामाजिक कार्यों में भी अपना जीवन समर्पित किया, गरीब लड़कियों के लिए सामूहिक विवाह आयोजित किए ताकि सरल, दहेज-मुक्त विवाहों को बढ़ावा दिया जा सके।

इतना ही नहीं उन्होंने उन जगहों पर ट्यूबवेल लगवाने में मदद की जहां पीने के पानी की जरूरत थी। बाजोरिया के लिए चुनाव सांसद या विधायक बनने से कहीं अधिक सामाजिक और राष्ट्रीय मुद्दों पर ध्यान आकर्षित करने और मतदाताओं को सर्वश्रेष्ठ उम्मीदवार चुनने के लिए प्रोत्साहित करने के बारे में था।

उनके पोते गौरव बाजोरिया ने टॉइम्स ऑफ इंडिया से कहा कि उनके दादाजी देश के प्रति अपार प्रेम रखने वाले एक समर्पित समाजसेवी थे। उन्होंने कहा, “भले ही उन्हें चुनावी जीत न मिली हो, लेकिन लोकतांत्रिक प्रक्रिया में उनकी निरंतर भागीदारी, व्यवस्था को चुनौती देने का साहस और कभी हार न मानने वाला रवैया भागलपुर के लोगों की यादों में हमेशा अमर रहेगा।”

भागलपुर में शोक का माहौल

नागरमल बाजोरिया के निधन की खबर मिलते ही भागलपुर में शोक का माहौल है। स्थानीय लोगों ने कहा कि उन्होंने अपने जीवन में ऐसा समाजसेवी नहीं देखा, जिसने अपना पूरा जीवन दूसरों के लिए समर्पित कर दिया हो। लोगों के अनुसार, नागरमल बाजोरिया केवल एक व्यक्ति नहीं, बल्कि सेवा और मानवता की मिसाल थे।

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इंदिरा गांधी ने आपातकाल की घोषणा किसी बाह्य या आंतरिक उथल-पुथल के कारण नहीं की थी। 1971 के बांग्ला युद्ध के दौरान ही बाह्य आपातकाल लग गया था। गुजरात, बिहार में उभरे युवाओं के आंदोलन का राष्ट्रव्यापी रूप लेना, जेपी जैसे महानायक का उसे नेतृत्व प्रदान करना, 12 जून, 1975 को गुजरात में कांग्रेस पार्टी की पराजय आदि कई प्रमुख कारण रहे। यहां क्लिक कर पढ़ें पूरी खबर…