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विशेष: एक शताब्दी प्रेमकथा

हिंदी साहित्य का इतिहास बताता है कि इन प्रेमकथाओं का उन दिनों अच्छा बाजार था। सुनाने वाले को लोग दान-दक्षिणा देते थे। वे जनता के मनोरंजन का माध्यम थीं। अब तक चली आ रही ‘किस्सागोई’ इसी तरह के किस्सों का अवशेष है।

Author Published on: July 1, 2020 5:10 AM
Love story, love Literature, love emotionप्रेम को लेकर हिंदी साहित्य से लेकर हर समाज और युग में बहुत सी बातें कही गई हैं। प्रेम हमेशा से एक रसभरी और उमंग का भाव लाने वाली बात जैसा रहा है।

सौ साल पहले मुझे तुमसे प्यार था, आज भी है और कल भी रहेगा। प्रेम की यह सौ साला गुनगुनाहट याद दिलाती है पंडित चंद्रधर शर्मा गुलेरी की। गुलेरी हिंदी  के ऐसे वाहिद कहानीकार हैं, जिन्होंने अपनी जिंदगी  में सिर्फ तीन कहानियां लिखीं। बावजूद इसके वे आज भी हिंदी कथाकारों की कतार में सबसे आगे चलने वालों में हैं। उनकी इन तीन कहानियों में जो सबसे मशहूर है, वह है- ‘उसने कहा था’। यह एक प्रेमकथा है।

एक ऐसी प्रेमकथा जिसमें बालिगाना रुखेपन की जगह कच्ची उम्र वाली कोमलता है। एक ऐसी कोमलता जो जंग के मैदान में भी बची रहती है, निभती रहती है। एक शताब्दी से भी लंबी यात्रा के बाद भी ‘उसने कहा था’ में दर्ज गुलेरी की सम्मोहनी लिखावट आज भी अगर अमिट है तो यह रचनात्मक कामयाबी के लिहाज से बड़ी बात है। गुलेरी की इस अमरकथा के बहाने हिंदी मन, समाज और कहानियों की दुनिया में प्रेम की बनती-बिगड़ती स्थिति का जायजा ले रहे हैं सुधीश पचौरी।

लव शव ते चिकन खुराना’, ‘देव डी’, ‘लव आजकल’ वाले प्रेमाभासी दिनों में भी चंद्रधर शर्मा गुलेरी की लिखी सौ बरस से भी ज्यादा पुरानी कहानी ‘उसने कहा था’ क्यों याद आती है? वह इसलिए याद आती है क्योंकि ‘उसने’ कुछ कहा था और अंग्रेजी पलटन में जमादार लहना सिंह से कहा था।

क्या कहा था? कहा था कि मेरे चार पुत्तर थे एक बचा है वो और उसके पिता सूबेदार तुम्हारी पलटन में हैं। उनका खयाल रखना…। यह सूबेदारनी वही आठ साल की लड़की थी, जो बारह बरस के बालक लहना सिंह को अमृतसर के बंबूकाट बाजार की उस दूध-दही वाले की दुकान पर रोज मिला करती थी और जिससे वह हर रोज पूछा करता था कि ‘तेरी कुड़माई हो गई’ और वह हर बार ‘धत्त’ कहकर भाग जाती थी।

बालपन का यह निर्मल प्रेम हर रोज जिज्ञासा करता कि क्या कुड़माई हो गई और हर बार वह धत्त कहकर यानी शरमाकर बता देती थी कि नहीं हुई और लहना की किशोरोचित उम्मीद जगी रहती थी।

किशोरवय का प्रेम
एशियाई समाजों में लड़के-लड़की की ‘प्यूबर्टी’ की उम्र में ऐसा परस्पर आकर्षण आम बात है। इसी कच्ची उम्र में पहले पहल का कच्चा-कच्चा अबूझ आकर्षण, प्रेम का अंकुर बनकर फूटा करता है। मध्यकाल में सूरदास के काव्य में वर्णित राधा-कृष्ण का प्रेम हो या औपनिवेशिक काल में बांग्ला के प्रख्यात लेखक शरत्चंद्र के प्रेम उपन्यास ‘देवदास’ में देवदास और पारो का प्रेम हो, दोनों में बालपन का प्रेम झलकता है, जो कहे-अनकहे तरीके से जीवन भर चलता है।

‘लैला मजनू’ उर्फ ‘मकतब की मुहब्बत’ की कहानी भी स्कूली दिनों में हुई मुहब्बत है। ‘हीर रांझा’ और ‘सोहनी महिवाल’ की प्रेमकथाएं भी इसी नव किशोरवय की प्रेमकथाएं हैं जो आज के प्रेमशून्य दिनों में प्रेम की ध्वजा फहराती हैं। यह भी कि किशोरावस्था का प्रेम हमेशा याद रहता है।

‘मैंने तो मुहब्बत की है’
आजकल के घृणावादी दिनों में प्रेमकथाओं को सराहने वाले ही कितने बचे हैं? लेकिन कोई वक्तरहा जब प्रेम न केवल एक बड़ा जीवन मूल्य था बल्कि सामंती, जातिवादी और ऊंचनीचवादी सत्ताओं को चुनौती देने वाला मूल्य था। तब प्रेम का मतलब था- वचनबद्धता यानी ‘जो वादा किया वो निभाना पड़ेगा’, परस्पर सम्मान का देन-लेन, यानी ‘हम बने तुम बने एक दूजे के लिए’, एक-दूसरे को समझना और सहना, यानी ‘तुम मुझे भूल भी जाओ ये तो हक है तुमको, मेरी बात और है मैंने तो मुहब्बत की है’, अपने प्रिय के लिए कुर्बानी देना, यानी ‘जीना तेरी गली में मरना तेरी गली में, मिट जाएगी हमारी दुनिया तेरी गली में’ आदि भाव इस प्रेम को शारीरिक से कुछ और कर देते हैं।

प्रेम का निस्वार्थ
तब प्रेमी एक ओर निंदनीय था तो दूसरी ओर उसका सम्मान भी था। अपने प्रिय की यादों में बने रहना, उस याद को महसूस करते रहना, अपने प्रेमपात्र के कहे को ईश्वरादेश की तरह मानना, उसके लिए जान की बाजी लगा देना, ‘क्लासिकल’ प्रेमियों की पहचान रही है। वे ही लोककथाओं में जिंदा रहे हैं, जो प्रेम को स्वार्थ से निस्वार्थता की ओर ले गए हैं। बाकी का तो न कोई अफसाना लिखा गया और न ही कोई नामलेवा ही रहा।

सूफियाना इश्क
‘कामायनी’ की श्रद्धा यही तो कहती है कि ‘मैं दे दंू और न फिर कुछ लूं, इतना ही सरल झलकता है…।’ मध्यकालीन सूफियों ने लोक में प्रचलित ऐसी ही प्रेमकथाओं को सूफियाना इश्क का माध्यम बनाया। पद्मावत, मृगावती, मधुमालती, लोरिक चंदा, सस्सी पुन्नू और ऐसी कई प्रेमकथाएं मध्यकाल में गली-गली कही-सुनी जाती थीं।

हिंदी साहित्य का इतिहास बताता है कि इन प्रेमकथाओं का उन दिनों अच्छा बाजार था। सुनाने वाले को लोग दान-दक्षिणा देते थे। वे जनता के मनोरंजन का माध्यम थीं। अब तक चली आ रही ‘किस्सागोई’ इसी तरह के किस्सों का अवशेष है।

आजादी बन गई प्रेमिका
मध्यकाल तक तो साहित्य में प्रेम ही प्रेम रहा लेकिन आधुनिक काल के लगते ही प्रेम को सुधारवादियों की नजर लग गई। प्रेमी-प्रेमिका आपस में प्रेम करने की जगह देशप्रेमी व राष्ट्रप्रेमी कहलाने लगे। आजादी ही पे्रमिका बन गई। यह दबाव इतना अधिक रहा कि जयशंकर प्रसाद जैसे कवि को अपने खंडकाव्य ‘आंसू’ तक को छद्म अलौकिकता का चोला पहनाना पड़ा। और आप इस विडंबना को क्या कहेंगे कि नाम प्रेमचंद लेकिन उनके पास एक भी प्रेम कहानी नहीं रही।

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