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दुनिया मेरे आगे : नीड़ का निर्माण

मनुष्य हो या फिर पशु-पक्षी ,सभी को रहने के लिए घर की दरकार महसूस होती है। सभी तरह के सजीव लोग अपनी-अपनी सुरक्षा और सहूलियत के अनुसार मकान या घोंसलों का निर्माण करते हैं। लेकिन जब गौरैया को अपने नीड़ के निर्माण करते देखा तो यह सोचने को मजबूर हो गया कि एक पक्षी में इतनी समझ है कि वह एक डिग्रीधारी इंजीनियर को भी पीछे छोड़ देता है।

पेड़ पर अपनी नीड़ में पक्षियों का समूह।

बृजमोहन आचार्य

बहुत पहले स्कूली जीवन में हरिवंश राय बच्चन की कविता ‘नीड़ का निर्माण फिर-फिर, नेह का आह्वान फिर-फिर, वह उठी आंधी की नभ में छा गया सहसा अंधेरा, हाय तिनकों से विनिर्मित, घोंसलों पर क्या न बीती’ पढ़ा था। जब इस कविता को शिक्षक ने पढ़ाया था, तब वह इतनी समझ नहीं आई थी। उस वक्त तो सिर्फ यही सोचा था कि अगली कक्षा में जाने के लिए इस कक्षा को उत्तीर्ण करना है। इसलिए परीक्षा के दिनों में कविता को याद कर लिया था। इसके बाद इस कविता को पढ़ने की जरूरत नहीं समझी। लेकिन पिछले दिनों जब एक गौरैया को अपना घोंसला बनाते देखा तो इस कविता का उद्देश्य और मर्म समझ में आया था। अन्यथा तो सिर्फ उत्तीर्ण होने के लिए ही इस कविता के महत्त्व को समझा गया था।

यह सही है कि चाहे मनुष्य हो या फिर पशु-पक्षी ,सभी को रहने के लिए घर की दरकार महसूस होती है। सभी तरह के सजीव लोग अपनी-अपनी सुरक्षा और सहूलियत के अनुसार मकान या घोंसलों का निर्माण करते हैं। लेकिन जब गौरैया को अपने नीड़ के निर्माण करते देखा तो यह सोचने को मजबूर हो गया कि एक पक्षी में इतनी समझ है कि वह एक डिग्रीधारी इंजीनियर को भी पीछे छोड़ देता है। जमीन पर पड़े सूखे तिनकों को वह गौरैया ऐसे छांट रही थी, ताकि मजबूत घोंसला बन सके। मैं सुबह के पांच बजे के करीब एक वृक्ष के नीचे करीब पौन घंटे बैठा यह सब कुछ देख रहा था।

इस वृक्ष के नीचे कई सारे तिनके बिखरे पड़े थे। आकार अलग-अलग थे। वह गौरैया एक-एक तिनके को देख रही थी और जो मजबूत होता था, उसे अपनी चोंच में ले जाकर उस वृक्ष की एक शाखा पर बैठ कर बड़े ही करीने से उस तिनके को रखती। थोड़ी देर में गौरैया ने नीड़ का निर्माण कर लिया।

एक बुद्धिमान मनुष्य अपना आशियाना बनाने के लिए किसी योग्य इंजीनियर की सहायता लेता है, लेकिन गौरैया ने तो बिना किसी की मदद लिए ऐसा मजबूत घोंसला बना लिया कि बरसात में भी उसे अंडे सुरक्षित रहे। इसे देख कर नीड़ का निर्माण कविता में वह पंक्ति याद आ गई, जिसमें कहा गया कि ‘एक चिड़िया चोंच में तिनका लिए जो जा रही है, वह सहज में ही पवन उंचास को नीचा दिखाती’।

दरअसल, पक्षियों को भी अपनी और अपने बच्चों की सुरक्षा के लिए घोंसलों की आवश्यकता होती है और वे अपनी काबिलियत के अनुसार इसका निर्माण भी करते हैं। कहने का तात्पर्य यह है कि पक्षी या पशु भी मनुष्य की तरह मेहनती होते हैं। बल्कि ज्यादा मेहनती होते हैं। वे चुग्गा चुगने के लिए पौ फटते ही निकल जाते हैं। सुबह-सुबह जब पक्षियों की आवाज सुनाई देती है तो सुबह की नींद में और मिठास आ जाती है। मनुष्य चाहे नींद में से उठने में देरी कर दे, लेकिन कभी देखने या सुनने में यह कभी नहीं आया कि आज पक्षियों की चहचाहट सुनाई नहीं दे रही है। लेकिन अब शहरों का होता विस्तार और आबादी के साथ बढ़ते शहरों के कारण सबसे पहले वृक्षों का ही सफाया किया जाता है।

जब पर्यावरण दिवस होता है तो पर्यावरण संरक्षण के लिए कई संकल्प लिए जाते हैं और उन्हें बचाने के लिए योजनाएं भी बनती हैं। लेकिन ये सभी योजनाएं सूखे पत्तों की तरह जल्दी ही मिट्टी में घुल-मिल जाती हैं। जब पर्यावरण ही नहीं बचेगा तो ये पशु-पक्षी कहां जाएंगे जो मनुष्य जीवन का हिस्सा रहे हैं। कौवे की क्या अहमियत रही है, हम सब जानते हैं, लेकिन कभी यह नहीं सोचा कि जब पेड़ों की कटाई करते रहेंगे तो कौवे तो क्या, अन्य पक्षी नजर भी नहीं आएंगे। अभी महामारी की वजह से पूर्णबंदी लगी तो मनुष्य घरों में कैद था और सड़कों पर पशु और पक्षी नजर आ रहे थे। अब पूर्णबंदी खत्म हो रही है तो सड़कों पर वापस केवल मनुष्य ही घूमते दिखने लगे हैं।

अगर अब भी मनुष्य नहीं चेता और शहर के विकास और विस्तार के लिए पेड़ों की ऐसे ही बलि होती रही तो हमारी भावी पीढ़ी किताब के पृष्ठों में पशु-पक्षियों के चित्र ही देख पाएगी। कुछ कक्षाओं में बच्चों को पर्यावरण के संरक्षण से संबंधित पाठ पढ़ाया जाता है और उसके महत्त्व को भी बताया जा रहा है। लेकिन यह सब कक्षा को उत्तीर्ण करने के लिए ही होता है।

मगर हम सबके लिए यह सीखने की बात है कि पक्षी आशावादी होते हैं। वे हर नीड़ के निर्माण को आशा और विश्वास के साथ पूरा करते हैं। चाहे इसके लिए सूखा पेड़ ही क्यों न हो। पेड़ का कटना हमें पक्षियों से दूर कर देगा और अगर हमें अभी इस बात का अहसास नहीं है कि पेड़ और पक्षी हमारे अपने स्वस्थ जीवन के लिए क्या हैं, तो आने वाले दिनों की त्रासदियों से हमें कोई नहीं बचा पाएगा। बेहतर यह हो कि हम वक्त पर इसकी अहमियत को समझें और पेड़ और पक्षी को बचाने के लिए अपने आसपास पेड़ों की हरियाली और पक्षियों के संगीत को फिर से जीवंत करें। जीवन प्रकृति के इस संगीत से ही वास्तव में जीवन साबित होता है। इनके बिना जीवन महज वक्त काटने का जरिया भर रह जाएगा।

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