पहलगाम आतंकी हमले के जवाब में किए गए ऑपरेशन सिंदूर ने पाकिस्तान को साफ और सख्त संदेश दिया – नया भारत अब बर्दाश्त नहीं, जवाबी कार्रवाई करेगा। हालांकि, इस संदेश की कीमत आज भी जम्मू-कश्मीर के पुंछ के रहने वाले कुछ परिवार चुका रहे हैं। पुंछ उन इलाकों में से है, जो अंतरराष्ट्रीय सीमा पर उस वक्त (ऑपरेशन सिंदूर) जारी तनाव के कारण सबसे अधिक प्रभावित हुआ था। बॉर्डर पार से की गई गोलाबारी ने यहां रहने वाले कई परिवारों को कभी ना मिटने वाले जख्म दिए।

इस साल 20 से 24 अप्रैल के बीच यहां कई परिवारों ने अपने डरावने अनुभव और अपनों को खोने का दर्द फिर से महसूस किया, जब प्रशासन ने मॉक ड्रिल कराई। कई लोग तुरंत सुरक्षित स्थानों की ओर चले। हालांकि, कुछ ने उस भयावह पल को याद किया कि कैसे बचने की कोशिश के दौरान ही उन्होंने अपने प्रियजनों को हमेशा के लिए खो दिया।

एक साथ जुड़वां बच्चों की मौत

पिछले साल ऑपरेशन सिंदूर के दौरान पुंछ में हुई सीमा पार गोलाबारी में सरकारी शिक्षक दंपति रमीज और उरूसा खान के 11 वर्षीय जुड़वां बच्चों जोया और जैन मौत हो गई थी। इस घटना ने उन्हें तोड़कर रख दिया है। इस संबंध में रमीज कहते हैं, “जब हम काम से लौटते थे तो दोनों दौड़कर हमारे लिए गेट खोलते थे। अब तो बस जिंदगी किसी तरह कट रही है।”

जानकारी अनुसार जोया और जैन का जन्म केवल पांच मिनट के अंतर से हुआ था। वहीं बीते साल सात मई को दोनों की मौत भी कुछ मिनटों के अंतर पर हुई। वे उन 14 लोगों में शामिल थे जो 7 और 8 मई के बीच पुंछ में हुई गोलाबारी में मारे गए। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, इस हमले में 65 लोग घायल हुए और 598 घर क्षतिग्रस्त हो गए।

रमीज बताते हैं कि वह भी उस दिन अपने बच्चों को सुरक्षित जगह ले जाने की कोशिश कर रहे थे, तभी गोला आ गिरा। मूल रूप से चकत्रू के रहने वाला यह परिवार बच्चों की पढ़ाई के लिए पुंछ शहर आया था और किराए का घर लिया था। जोया और जैन वहां के क्राइस्ट स्कूल में पांचवीं कक्षा में पढ़ते थे। रमीज कहते हैं, “पहले बच्चे बस या ऑटो से स्कूल जाते थे। मुझे उनकी सुरक्षा की चिंता रहती थी। इसलिए हमने स्कूल के पास शिफ्ट होने का फैसला किया।”

बीते साल 7 मई को गोलाबारी शुरू होने के बाद रमीज ने परिवार को उस समय के लिहाज से सुरक्षित सुरनकोट ले जाने का फैसला किया। घटना वाले दिन उरूसा जोया का हाथ पकड़े हुए थीं और जैन पीछे चल रहा था, तभी घर के बाहर गोला फटा। इससे पहले जोया और फिर जैन की मौके पर ही मौत हो गई।

रमीज कहते हैं, “जोया पहले पैदा हुई थी, फिर पांच मिनट बाद जैन। दोनों इसी तरह एक साथ चले भी गए। अब मैं अक्सर सोचता हूं कि हम वहां (पुंछ) गए ही क्यों। शायद यही मालिक की मर्जी थी।” बता दें कि रमीज खुद भी हमले में घायल हुए थे। आज भी उनके लीवर में छर्रे का एक टुकड़ा फंसा हुआ है, जिसे निकालना डॉक्टर जानलेवा मानते हैं। इलाज के दौरान परिवार ने उनसे बच्चों की मौत की बात छिपाकर रखी थी।

बहरहाल, रमीज अब अपनी पत्नी के साथ चकत्रू वाले पुराने घर में रहने लगे हैं। वह कहते हैं, “हमने अपने बच्चों की याद में यहां सामुदायिक भोज रखने का फैसला किया है।” इधर, क्राइस्ट स्कूल जहां जोया और जैन पढ़ते थे वहां प्रशासन का कहना है कि वे चाहते हैं कि बच्चे सामान्य जीवन में लौटें। एक वरिष्ठ कर्मचारी ने कहा, “शुरुआत में बच्चे बहुत डरे हुए थे, लेकिन अब वे पढ़ाई और खेलकूद में लौट चुके हैं। फिर उन्हें पुराने दर्द की याद क्यों दिलाई जाए?”

कई अन्य परिवारों की जिंदमी थमी

पुंछ शहर के सिंडिकेट चौक निवासी जस्मीत कौर भी इसी तरह के दर्द के साथ जी रही हैं। उनके पति अमरीक सिंह 7 मई को गोलाबारी में मारे गए थे। जिस मिठाई की दुकान को अमरीक चलाते थे, उसकी मरम्मत हो चुकी है, लेकिन परिवार का जीवन वहीं थम गया है। सरकार ने जस्मीत को कृषि विभाग में चतुर्थ श्रेणी की नौकरी और 14 लाख रुपये की आर्थिक सहायता दी लेकिन वह कहती हैं, “जिंदगी जैसे रुक गई है।” उनकी बड़ी बेटी ANM की ट्रेनिंग कर रही है, जबकि बाकी दो बच्चे अभी स्कूल में हैं।

जस्मीत बताती हैं, “गोलाबारी शुरू हुई तो हम दुकान के पीछे बेसमेंट में छिप गए। अमरीक कुछ देर के लिए ऊपर आए और तभी सड़क पर गोला गिरा, जिसने उन्हें चीर दिया।” कुछ दूरी पर स्थित जिया-उल-उलूम मदरसा बाहर से नॉर्मल दिखता है, लेकिन वहां के चेयरमैन मौलाना सईद अहमद हबीब कहते हैं, “उस दिन का डर किसी प्लास्टर या मरम्मत से नहीं मिट सकता।”

हमले के दौरान हॉस्टल के छात्रों को निकाला जा रहा था। लगभग 400 में से ज्यादा बच्चे जा चुके थे। लेकिन करीब 100 छात्र अभी भी मौजूद थे, तभी गोला गिरा। इस घटना में कुरान शिक्षक कारी मोहम्मद इकबाल की मौत हो गई और पांच छात्र घायल हुए। हबीब कहते हैं, “जब बच्चे लौटे तो हॉस्टल की तरफ देखना भी उनके लिए मुश्किल था। हमें उनके लिए अलग से काउंसलिंग करनी पड़ी।”

बता दें कि पुंछ की घटनाओं के बाद केंद्र और जम्मू-कश्मीर सरकार ने मृतकों के परिवारों को 16-16 लाख रुपये की सहायता, गंभीर घायलों को 1 लाख रुपये और स्थायी विकलांगता वाले लोगों को अतिरिक्त 5 लाख रुपये देने की घोषणा की थी। सरकार ने पक्के मकानों के पुनर्निर्माण के लिए 7.39 करोड़ रुपये और कच्चे मकानों के लिए 2.25 करोड़ रुपये जारी किए।

साथ ही, जिन लोगों के घर अब तक नहीं बन पाए, उनके लिए 200-300 प्रीफैब्रिकेटेड तीन कमरों वाले घर बनाने का प्रस्ताव भी दिया गया। इस सब के अलावा, पुंछ में 5,693 नए भूमिगत बंकर बनाने का प्रस्ताव भी रखा गया है, जिनमें ज्यादातर सामुदायिक होंगे। फिलहाल यह योजना मंजूरी का इंतजार कर रही है।

यह भी पढ़ें – पहलगाम हमले को एक साल: अब तक कितने आतंकी ढेर, सैलानियों की वापसी हुई या नहीं?

पहलगाम हमले को एक साल पूरा हो गया है। इस एक साल में जम्मू-कश्मीर में सुरक्षा हालात और पर्यटन की स्थिति को लेकर क्या बदलाव आया, यह सवाल बना हुआ है। सरकारी आंकड़ों के अनुसार, इस अवधि में कितने आतंकवादी मारे गए, कितने नागरिक और सुरक्षा बल के जवानों की मौत हुई, और सैलानियों की संख्या में क्या बदलाव दर्ज किया गया, इसकी तस्वीर सामने आती है। पूरी खबर पढ़ें….