भारत सरकार अब अपने परमाणु ऊर्जा कार्यक्रम में तेजी लाना चाहती है। देश में ज्यादा बिजली बन सके और न्यूक्लियर सेक्टर मजबूत हो, इस पर फोकस किया जा रहा है। इन्हीं बातों को ध्यान में रखते हुए केंद्र सरकार नया कानून लेकर आई है जिसके जरिए निजी कंपनियों के लिए निवेश के रास्ते खोले गए हैं।

इस समय भारत दो बड़े लक्ष्यों पर ध्यान केंद्रित कर रहा है। पहला लक्ष्य न्यूक्लियर बिजली उत्पादन को बढ़ाना है। जानकार मानते हैं कि ऐसा होने से देश को मिलने वाली बेसलोड बिजली बढ़ेगी। ऐसी स्थिति में 24 घंटे बिजली उपलब्ध कराने का रास्ता मजबूत होगा। दूसरा लक्ष्य छोटे न्यूक्लियर रिएक्टर जिन्हें स्मॉल मॉड्यूलर रिएक्टर (SMR) भी कहा जाता है, उनकी टेक्नोलॉजी और मैन्युफैक्चरिंग में तेजी लाना है।

हेवी वॉटर रिएक्टर क्या होता है?

भारत भले ही स्मॉल मॉड्यूलर रिएक्टर की बात कर रहा हो, लेकिन वर्तमान में सबसे ज्यादा इस्तेमाल हेवी वॉटर रिएक्टर का हो रहा है। इसे दूसरे शब्दों में पीएचडब्ल्यूआर (PHWR) के नाम से भी जाना जाता है। यह भारी पानी और प्राकृतिक यूरेनियम पर चलता है। पिछले कई दशकों से भारत इसी तकनीक का इस्तेमाल कर रहा है और इसमें काफी अनुभव हासिल कर चुका है। वर्तमान में भारत के पास 220 मेगावाट से लेकर 700 मेगावाट तक के पीएचडब्ल्यूआर रिएक्टर मौजूद हैं।

लाइट वॉटर रिएक्टर क्या होता है?

हालांकि बदलते दौर और नई तकनीकों को देखते हुए दुनिया के कई देशों ने हेवी वॉटर रिएक्टर की जगह लाइट वॉटर रिएक्टर के इस्तेमाल पर जोर दिया है। अमेरिका, रूस और फ्रांस इस तकनीक का सबसे ज्यादा इस्तेमाल कर रहे हैं। लेकिन भारत में स्थिति अलग है। जानकार मानते हैं कि लाइट वॉटर रिएक्टर प्लांट बनाना काफी महंगा है। महंगे प्लांट की वजह से बिजली की लागत भी बढ़ जाएगी। इसी कारण सरकार अब भी पीएचडब्ल्यूआर तकनीक पर भरोसा बनाए हुए है।

इस समय SMR यानी स्मॉल मॉड्यूलर रिएक्टर की भी काफी चर्चा हो रही है। इन्हें छोटे आकार के न्यूक्लियर रिएक्टर कहा जाता है। इन्हें कम जगह में लगाया जा सकता है और इनकी लागत भी अपेक्षाकृत कम रहती है। भविष्य की न्यूक्लियर ऊर्जा जरूरतों के लिए इनकी भूमिका को काफी अहम माना जा रहा है।

अमेरिका कैसे कर रहा मदद?

अमेरिका इस समय भारत के न्यूक्लियर कार्यक्रम में मदद कर रहा है। अमेरिका का एक बड़ा न्यूक्लियर उद्योग प्रतिनिधिमंडल भारत आया हुआ है। उनकी भारत सरकार के कई मंत्रियों से मुलाकात भी हुई है। इस प्रतिनिधिमंडल में कई अमेरिकी न्यूक्लियर कंपनियां शामिल हैं।

अमेरिका में एक नियम है, 10 CFR 810। यह नियम अमेरिकी कंपनियों को न्यूक्लियर टेक्नोलॉजी ट्रांसफर करने की अनुमति नहीं देता। हालांकि, इस समय अमेरिका ने कुछ कंपनियों को विशेष अनुमति दी है, जिससे वे भारत के साथ टेक्नोलॉजी साझा कर सकती हैं।

भारत सरकार ने क्या नियम बदल दिया?

जानकारी के लिए बता दें कि दिसंबर 2025 में संसद में एक नया कानून लाया गया था। इस कानून का नाम ‘सस्टेनेबल हार्नेसिंग एंड एडवांसमेंट ऑफ न्यूक्लियर एनर्जी इन इंडिया एक्ट 2025’ है। इस कानून के बाद न्यूक्लियर सेक्टर में निजी कंपनियों की एंट्री का रास्ता खुल गया। इससे पहले इस क्षेत्र में सरकार का ज्यादा नियंत्रण रहता था।

विपक्ष ने इस कानून का विरोध भी किया था। उनका तर्क था कि अगर कोई न्यूक्लियर दुर्घटना होती है, तो उसकी जिम्मेदारी कैसे तय की जाएगी। इस कानून के तहत एटॉमिक एनर्जी एक्ट 1962 और सिविल लायबिलिटी फॉर न्यूक्लियर डैमेज एक्ट 2010 में भी बदलाव किए गए हैं।

फिलहाल भारत सरकार सस्ती और स्वदेशी पीएचडब्ल्यूआर तकनीक को जारी रखने के पक्ष में है। विदेशी निवेश जरूर आएगा, लेकिन सरकार उसे सीमित क्षेत्रों तक रखने की तैयारी में है।

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