भारत में मंदिर सिर्फ पूजा-अर्चना के केंद्र नहीं हैं बल्कि सामाजिक, सांस्कृतिक और आर्थिक गतिविधियों के भी महत्वपूर्ण केंद्र हैं। हर दिन लाखों श्रद्धालु अपनी श्रद्धा के अनुसार नकद, सोना, चांदी, गहने और अब डिजिटल माध्यमों से भी दान करते हैं। छोटे गांव के मंदिर से लेकर देश के बड़े तीर्थस्थलों तक यह दान करोड़ों रुपये की धार्मिक अर्थव्यवस्था का हिस्सा बन चुका है। हाल के दिनों में मंदिरों के चढ़ावे को लेकर उठे विवादों ने एक अहम सवाल खड़ा किया है- आखिर दान पेटी में डाला गया पैसा बैंक तक कैसे पहुंचता है? उसकी गिनती कौन करता है? उस पर किसकी निगरानी होती है? क्या कोई ऑडिट होता है? और क्या पूरे देश में इसके लिए एक समान नियम हैं?
यह स्टोरी किसी एक मंदिर या किसी एक विवाद की नहीं बल्कि उस पूरी व्यवस्था की पड़ताल है जो श्रद्धालुओं के विश्वास और करोड़ों रुपये के दान के बीच काम करती है। दान केवल धार्मिक नहीं, आर्थिक गतिविधि भी है। भारत में हर साल हजारों करोड़ रुपये का दान धार्मिक संस्थानों को मिलता है। इनमें नकद दान, सोना और चांदी, आभूषण, जमीन और संपत्ति, ऑनलाइन ट्रांसफर और UPI व QR कोड से भुगतान शामिल हैं।
कहां इस्तेमाल होता है दान का पैसा
यह पैसा मंदिर के दैनिक संचालन, कर्मचारियों के वेतन, पूजा-पाठ, धर्मार्थ काम, अस्पतालों, स्कूलों, अन्नक्षेत्र, धर्मशालाओं और विकास कार्यों में खर्च किया जाता है। यानी श्रद्धालु का एक छोटा-सा दान एक बड़े वित्तीय तंत्र का हिस्सा बन जाता है।
दान पेटी से बैंक तक का सफर
अगर किसी मंदिर में अच्छी प्रशासनिक व्यवस्था है तो दान की प्रक्रिया आमतौर पर कई चरणों में पूरी होती है।
पहला चरण: दान संग्रह
मंदिर परिसर में अलग-अलग जगह दान पेटियां रखी जाती हैं। इन पेटियों पर विशेष लॉक लगाए जाते हैं और कई स्थानों पर दोहरी चाबी की व्यवस्था होती है ताकि कोई एक व्यक्ति अकेले पेटी न खोल सके। कुछ बड़े मंदिरों में सील नंबर भी दर्ज किए जाते हैं।
दूसरा चरण: दान पेटी खोलना
दान पेटी रोज नहीं खोली जाती। कई मंदिरों में यह प्रक्रिया सप्ताह में एक बार होती है तो कहीं हर दिन पेटी खोली जाती है। पेटी खोलने के समय आमतौर पर कई लोग मौजूद रहते हैं।
-ट्रस्ट अधिकारी
-प्रशासनिक कर्मचारी
-सुरक्षा अधिकारी
-बैंक प्रतिनिधि (कुछ मामलों में)
-ऑडिट टीम या अधिकृत कर्मचारी
कई बड़े मंदिरों में पूरी प्रक्रिया CCTV कैमरों के सामने होती है।
पहले यह काम हाथ से होता था लेकिन अब बड़े मंदिरों में हाई स्पीड नोट काउंटिंग मशीनें इस्तेमाल होती हैं। सिक्कों को अलग-अलग मूल्य के अनुसार छांटा जाता है। गहनों और कीमती धातुओं की अलग सूची बनाई जाती है। हर बैच का रिकॉर्ड तैयार किया जाता है।
क्या कोई भी कर्मचारी पैसे को छू सकता है?
इसका जवाब है- नहीं। अच्छे प्रशासनिक मॉडल में Segregation of Duties यानी जिम्मेदारियों का बंटवारा होता है। उदाहरण के लिए- एक टीम पेटी खोलती है, दूसरी टीम गिनती करती है। तीसरी टीम रिकॉर्ड तैयार करती है और चौथी टीम बैंक जमा करवाती है।
इससे किसी एक व्यक्ति के पास पूरी प्रक्रिया का नियंत्रण नहीं रहता। यही सिस्टम वित्तीय धोखाधड़ी रोकने का सबसे प्रभावी तरीका माना जाता है।
‘दान पर जवाबदेही तय हो’
सुप्रीम कोर्ट में एडवोकेट-ऑन-रिकॉर्ड नंदिनी गोरे ने कहा, ”एक अधिवक्ता के नाते मेरा स्पष्ट मत है कि धार्मिक आस्था निजी विषय है परन्तु सार्वजनिक धन का प्रबंधन पूरी तरह सार्वजनिक दायित्व है। वर्तमान में भारत में मंदिरों के वित्तीय प्रबंधन के लिए कोई एक समान केंद्रीय कानून नहीं है। राज्य दर राज्य HR&CE अधिनियम अलग हैं और निजी न्यास भारतीय न्यास अधिनियम, 1882 के अधीन कार्य करते हैं। इस विधिक विखंडन के कारण पारदर्शिता का स्तर मंदिर की भौगोलिक स्थिति और नियंत्रण पर निर्भर हो जाता है जो अनुच्छेद 14 के तहत ‘विधि के समक्ष समता’ के सिद्धांत के अनुरूप नहीं है।”
नंदिनी कहती हैं कि न्यूनतम प्रकटीकरण अनिवार्य हो-जिस प्रकार कंपनी अधिनियम, 2013 में सार्वजनिक कंपनियों के लिए वित्तीय खुलासा अनिवार्य है, उसी प्रकार 5 करोड़ रुपये से अधिक वार्षिक आय वाले सभी धार्मिक न्यासों के लिए वार्षिक ऑडिट रिपोर्ट, आय-व्यय विवरण और प्रमुख खर्चों का सार्वजनिक प्रकटीकरण अनिवार्य किया जाए।
उनका कहना है कि जवाबदेही तय हो – भारतीय न्यास अधिनियम की धारा 23 के तहत न्यासी पहले से ही ‘प्रूडेंट मैन’ की तरह संपत्ति की रक्षा के लिए बाध्य हैं। चढ़ावे के दुरुपयोग पर IPC की धारा 405, 409 के तहत आपराधिक विश्वासघात का मामला बनता है। आवश्यकता इस बात की है कि जांच समयबद्ध हो और दोषी न्यासी को व्यक्तिगत रूप से उत्तरदायी ठहराया जाए। एक समान राष्ट्रीय ढांचा बने-संविधान के अनुच्छेद 25 से 28 धर्म की स्वतंत्रता देते हैं लेकिन अनुच्छेद 25(2) राज्य को धार्मिक संस्थाओं के धर्मनिरपेक्ष क्रियाकलापों को विनियमित करने की शक्ति भी देता है। वित्त और प्रशासन विशुद्ध रूप से धर्मनिरपेक्ष विषय हैं। इसलिए संसद को ‘राष्ट्रीय धार्मिक न्यास पारदर्शिता अधिनियम’ लाने पर विचार करना चाहिए। पारदर्शिता से आस्था कम नहीं होती बल्कि संस्थाओं में जनविश्वास बढ़ता है। तिरुपति, शिरडी जैसे बड़े मंदिर पहले ही ऑनलाइन दान और ऑडिट रिपोर्ट प्रकाशित कर रहे हैं। यह मॉडल सभी बड़े न्यासों पर लागू होना चाहिए। जब सार्वजनिक धन की बात हो, तो ‘ट्रस्ट’ शब्द का अर्थ केवल कानूनी नहीं, नैतिक भी होना चाहिए। पारदर्शिता कोई विकल्प नहीं, विधि के शासन की न्यूनतम अपेक्षा है।
बैंक तक पैसा कैसे पहुंचता है?
गिनती पूरी होने के बाद नकदी को सीलबंद बैग में रखा जाता है। फिर जमा पर्ची बनाई जाती है। बैंक एंट्री तैयार होती है। अधिकृत कर्मचारी या कैश वैन के जरिए बैंक भेजा जाता है। बैंक रिसीविंग देता है। उसके बाद मंदिर के अकाउंट में पैसा दिखाई देता है।
बड़े मंदिरों में यह प्रक्रिया उसी दिन पूरी करने की कोशिश की जाती है ताकि नकदी लंबे समय तक परिसर में न रहे।
डिजिटल दान ने क्या बदला?
पिछले कुछ वर्षों में कई मंदिरों ने UPI, QR कोड और ऑनलाइन पोर्टल शुरू किए हैं। इसके फायदे हैं- नकदी कम रहती है, तुरंत बैंक खाते में पैसा पहुंच जाता है और ऑडिट आसान हो जाता है। हर ट्रांजैक्शन का डिजिटल रिकॉर्ड बन जाता है। लेकिन भारत में अभी भी बड़ी संख्या में श्रद्धालु नकद दान करना पसंद करते हैं। इसलिए नकदी प्रबंधन की चुनौती बनी हुई है।
क्या पूरे देश में एक जैसा नियम है?
यहीं सबसे बड़ी बात सामने आती है। भारत में मंदिरों के लिए कोई एक राष्ट्रीय ऑडिट कानून नहीं है। कुछ मंदिर राज्य सरकारों द्वारा गठित बोर्ड के अधीन हैं। कुछ धार्मिक ट्रस्ट के रूप में रजिस्टर्ड हैं। कुछ निजी ट्रस्ट द्वारा संचालित होते हैं। इस वजह से- ऑडिट प्रक्रिया अलग हो सकती है। रिकॉर्ड रखने का तरीका अलग हो सकता है। पारदर्शिता का स्तर भी अलग-अलग हो सकता है।
ऑडिट आखिर होता क्या है?
बहुत से लोग ऑडिट का मतलब केवल हिसाब-किताब मिलाना समझते हैं। असल में ऑडिट का उद्देश्य होता है कि पैसा कहां से आया? कितना आया और कहां खर्च हुआ? खर्च नियमों के अनुसार हुआ या नहीं? रिकॉर्ड और बैंक बैलेंस मेल खाते हैं या नहीं? अगर कोई अंतर मिलता है तो ऑडिटर सवाल उठाता है।
ऑडिट कितनी तरह का होता है?
- इंटरनल ऑडिट (Internal Audit)
संस्था खुद समय-समय पर अपने रिकॉर्ड की जांच करती है। इसका उद्देश्य गलती जल्दी पकड़ना होता है।
वैधानिक ऑडिट (Statutory Audit)
चार्टर्ड अकाउंटेंट द्वारा वित्तीय विवरण की जांच की जाती है। यह ट्रस्ट के कानूनी दायित्व का हिस्सा हो सकता है।
- स्पेशल ऑडिट (Special Audit)
अगर किसी तरह की अनियमितता की शिकायत आती है तो विशेष जांच कराई जा सकती है। यही वह स्थिति होती है जिसमें सरकार या सक्षम प्राधिकारी जांच समिति या विशेष जांच दल (SIT) बना सकता है।
चोरी रोकने के लिए दुनिया क्या करती है?
बड़ी धार्मिक संस्थाओं और गैर-लाभकारी संगठनों में कुछ सामान्य उपाय अपनाए जाते हैं-
डुअल कंट्रोल (Dual Control)
दो लोगों की अनुमति के बिना कैश नहीं खुलता।
सीसीटीवी रिकॉर्डिंग (CCTV Recording)
पूरी प्रक्रिया रिकॉर्ड होती है।
सरप्राइज़ ऑडिट (Surprise Audit)
बिना सूचना के जांच होती है।
रोटेशन पॉलिसी (Rotation Policy)
एक ही कर्मचारी वर्षों तक एक ही जिम्मेदारी नहीं संभालता।
डिजिटल अकाउंंटिंग (Digital Accounting)
हर एंट्री सॉफ्टवेयर में दर्ज होती है।
एक्स्टर्नल ऑडिट External Audit
बाहरी विशेषज्ञ पूरे रिकॉर्ड की जांच करते हैं।
सबसे बड़ा जोखिम कहां होता है?
विशेषज्ञ मानते हैं कि सबसे ज्यादा जोखिम तीन जगह होता है:
-दान पेटी खुलने के समय
-नकदी गिनने के दौरान
-बैंक में जमा होने से पहले
यही कारण है कि इन तीन चरणों में सबसे ज्यादा निगरानी रखी जाती है।
क्या केवल मंदिरों में ही ऐसा होता है?
नहीं, सिर्फ मंदिरों में ऐसा नहीं होता है। गुरुद्वारे, मस्जिदों के वक्फ संस्थान, चर्च और अन्य धार्मिक ट्रस्ट भी दान प्राप्त करते हैं और सभी को अपने-अपने कानूनी ढांचे के अनुसार वित्तीय रिकॉर्ड रखना होता है। इसलिए पारदर्शिता का सवाल किसी एक धर्म या संस्था का नहीं बल्कि सार्वजनिक विश्वास का मुद्दा है।
क्या सभी मंदिर अपनी आय सार्वजनिक करते हैं?
कुछ बड़े मंदिर वार्षिक रिपोर्ट, बजट या आय-व्यय का विवरण सार्वजनिक करते हैं। लेकिन यह व्यवस्था हर जगह समान नहीं है। यहीं से पारदर्शिता पर बहस शुरू होती है। कई विशेषज्ञ मानते हैं कि वार्षिक ऑडिट रिपोर्ट वेबसाइट पर उपलब्ध हो, दान और खर्च का सारांश सार्वजनिक किया जाए, डिजिटल भुगतान को बढ़ावा दिया जाए और स्वतंत्र ऑडिट व्यवस्था बनाई जाए।
क्या टेक्नोलॉजी समाधान बन सकती है?
Artificial Intelligence आधारित अकाउंटिंग सिस्टम, ब्लॉकचेन रिकॉर्डिंग, लाइव काउंटिंग मॉनिटरिंग और रियल-टाइम बैंक इंटीग्रेशन जैसी तकनीकों पर भी चर्चा हो रही है। अगर इन्हें बड़े स्तर पर अपनाया जाए तो इंसानी हस्तक्षेप कम होगा और विवाद की संभावना भी घटेगी।
धार्मिक ट्रस्ट के ऑडिट पर प्रैक्टिसनर चार्टेड अकाउंटेंट आशुतोष श्रीवास्तव से जनसत्ता से बात की और कुछ सवाल पूछे।
सवाल: धार्मिक ट्रस्ट का ऑडिट सामान्य ट्रस्ट से कितना अलग होता है?
जवाब: धार्मिक ट्रस्ट का ऑडिट सामान्य ट्रस्ट की तुलना में अधिक व्यापक और संवेदनशील होता है। इसमें नकद दान, चढ़ावा, वस्तु के रूप में प्राप्त दान और ऑनलाइन योगदान का सत्यापन करना पड़ता है। साथ ही धार्मिक ट्रस्टों पर लागू विशेष कानूनों, चैरिटी नियमों और कर छूट से जुड़े प्रावधानों का अनुपालन भी जांचा जाता है। ऑडिटर को यह भी देखना होता है कि किसी विशेष धार्मिक उद्देश्य के लिए मिले प्रतिबंधित फंड का उपयोग उसी उद्देश्य के लिए किया गया है या नहीं। मंदिर, मस्जिद या चर्च की आभूषणों, कलाकृतियों और पवित्र संपत्तियों का भौतिक सत्यापन भी महत्वपूर्ण हिस्सा होता है। इसके विपरीत, सामान्य निजी ट्रस्ट के ऑडिट में निवेश, लाभार्थियों को आय का वितरण और ट्रस्ट डीड के अनुपालन पर अधिक ध्यान दिया जाता है।
सवाल: ट्रस्ट के ऑडिट में सबसे बड़ा जोखिम क्या होता है?
जवाब : ट्रस्ट ऑडिट में सबसे बड़ा जोखिम धन के दुरुपयोग या गबन का होता है- खासकर तब जब आंतरिक नियंत्रण कमजोर हों और जिम्मेदारियों का स्पष्ट बंटवारा न हो। इसके अलावा बिना दर्ज किए गए दान, अनधिकृत खर्च, संबंधित पक्षों के साथ अपारदर्शी लेनदेन, कानूनी और कर संबंधी नियमों का उल्लंघन तथा पर्याप्त दस्तावेजों की कमी भी बड़े जोखिम माने जाते हैं। धार्मिक ट्रस्टों में नकद दान और चढ़ावे में मिली संपत्तियों का प्रबंधन सबसे संवेदनशील और उच्च जोखिम वाला क्षेत्र होता है।
सवाल: क्या सालाना ऑडिट रिपोर्ट सार्वजनिक होनी चाहिए?
जवाब : सामान्य तौर पर हां। विशेष रूप से उन धार्मिक और धर्मार्थ ट्रस्टों की वार्षिक ऑडिट रिपोर्ट सार्वजनिक की जानी चाहिए, जो आम लोगों से दान प्राप्त करते हैं। इससे पारदर्शिता बढ़ती है और श्रद्धालुओं का विश्वास मजबूत होता है। हालांकि, रिपोर्ट सार्वजनिक करते समय दानदाताओं की व्यक्तिगत जानकारी या सुरक्षा से जुड़ी संवेदनशील जानकारियों को गोपनीय रखा जा सकता है या उनका सीमित खुलासा किया जा सकता है।
सवाल: नकद दान में सबसे बड़ी चुनौती क्या होती है?
जवाब: सबसे बड़ी चुनौती यह सुनिश्चित करना है कि दान पेटी या अन्य माध्यमों से प्राप्त हर नकद राशि को प्राप्ति के समय से लेकर बैंक में जमा होने और लेखा पुस्तकों में दर्ज होने तक पूरी तरह और सही तरीके से रिकॉर्ड किया जाए। इस पूरी प्रक्रिया में पारदर्शिता बनाए रखना कठिन होता है क्योंकि नकद लेनदेन में मानवीय त्रुटि और धोखाधड़ी की आशंका सबसे अधिक रहती है।
सीए के अनुसार धार्मिक ट्रस्टों के ऑडिट में दान, पवित्र संपत्तियों और सार्वजनिक जवाबदेही पर विशेष जोर दिया जाता है। सबसे बड़ा जोखिम धन के दुरुपयोग का होता है, ऑडिट रिपोर्ट का सार्वजनिक प्रकटीकरण संस्थाओं में भरोसा बढ़ाता है और नकद दान आज भी ऑडिट का सबसे चुनौतीपूर्ण क्षेत्र बना हुआ है।
आस्था का सबसे बड़ा आधार विश्वास
मंदिर में दान करने वाला श्रद्धालु रसीद या लाभ के लिए पैसा नहीं देता। वह विश्वास के आधार पर दान करता है। इसलिए दान की सुरक्षा केवल वित्तीय अनुशासन का विषय नहीं बल्कि सामाजिक और धार्मिक जिम्मेदारी भी है। पारदर्शी व्यवस्था, नियमित ऑडिट, डिजिटल रिकॉर्ड, स्वतंत्र निगरानी और सार्वजनिक जवाबदेही ऐसी व्यवस्थाएं हैं जो किसी भी धार्मिक संस्था की विश्वसनीयता को मजबूत करती हैं।
आखिरकार सवाल केवल यह नहीं है कि दान पेटी में कितना पैसा आया बल्कि यह भी है कि दान पेटी से बैंक तक और बैंक से समाज के हित तक हर रुपये का सफर कितना सुरक्षित, पारदर्शी और जवाबदेह है। यही व्यवस्था श्रद्धालुओं के विश्वास को लंबे समय तक बनाए रख सकती है और यही किसी भी धार्मिक संस्था की सबसे बड़ी पूंजी है।
