पिछले कुछ महीनों में भारत में एथेनॉल को लेकर काफी चिंताजनक खबरें सामने आई हैं। एथेनॉल को लेकर कहा जा रहा है कि इसके उत्पादन में काफी पानी का इस्तेमाल होता है। बहस इस बात को लेकर हो रही है कि भारत जैसे देश में जहां पर पानी की समस्या बहुत ज्यादा है, गर्मी के सीजन में तो लोगों को पानी के टैंकर की लाइन में लगे हुए देखा जा सकता है, ऐसे में क्या सरकार को एथेनॉल के उत्पादन की दिशा में आगे बढ़ना चाहिए?
जब पहले से ही देश में इतना बड़ा जल संकट है तो एथेनॉल को लेकर आम लोगों का भी चिंतित होना लाजिमी है।
भारत में दुनिया की लगभग 17 प्रतिशत आबादी है और हमारे पास पानी के संसाधन सिर्फ चार प्रतिशत हैं और ऐसे में समझा जा सकता है कि भारत के लिए जल संकट वाकई कितना बड़ा खतरा है? वर्ल्ड बैंक के मुताबिक, जल संकट वह स्थिति है जहां पर प्रति व्यक्ति हर साल पानी की उपलब्धता 1000 घन मीटर से कम हो जाती है।
नीति आयोग के Composite Water Management Index (CWMI) के मुताबिक, भारत अपने इतिहास के सबसे भीषण जल संकट का सामना कर रहा है जिसमें लगभग 60 करोड़ लोग पानी के संकट का सामना कर रहे हैं।
नीति आयोग की रिपोर्ट
2018 में आई नीति आयोग की एक रिपोर्ट में कहा गया था कि 2030 तक भारत में पानी की मांग आपूर्ति के मुकाबले दोगुनी होने का अनुमान है। रिपोर्ट में कहा गया था कि झारखंड, हरियाणा, उत्तर प्रदेश और बिहार ऐसे राज्य हैं जहां पर पानी की उपलब्धता की स्थिति बेहद खराब है।
CWMI ने चेतावनी दी है कि 2030 तक दिल्ली, बेंगलुरु और चेन्नई सहित भारत के 21 प्रमुख शहरों में ग्राउंड वाटर का स्तर शून्य तक पहुंच सकता है।
भारत कुल 1,822 करोड़ लीटर एथेनॉल का उत्पादन कर सकता है और इसका बड़ा हिस्सा उन राज्यों से आना है जो पहले से ही जल संकट से जूझ रहे हैं। जैसे- महाराष्ट्र में 396 करोड़ लीटर की क्षमता वाली एथेनॉल बनाने वाली मशीनें हैं जबकि विदर्भ और मराठवाड़ा के किसान पीने के पानी के लिए संघर्ष कर रहे हैं।
अब लौटते हैं पुरानी बात पर कि एथेनॉल बनाने में कितना पानी इस्तेमाल होगा?
1 लीटर एथेनॉल बनाने के लिए तीन से चार लीटर पानी का इस्तेमाल होता है और यह पानी डिस्टिलेशन और प्लांट प्रोसेसिंग में इस्तेमाल किया जाता है लेकिन अगर आप इसमें फसल की सिंचाई में लगने वाले पानी को भी जोड़ेंगे तो यह आंकड़ा 1 लीटर एथेनॉल बनाने के लिए 1,000 से 10,000 लीटर पानी तक हो सकता है। इसलिए कितना पानी इस्तेमाल होगा, यह इस बात पर निर्भर करता है एथेनॉल बनाने के लिए किस फसल का इस्तेमाल किया जा रहा है।
एथेनॉल के औद्योगिक उत्पादन के दौरान जब इसकी ग्राइंडिंग, फर्मेंटेशन और डिस्टिलेशन किया जाता है तब इसमें कम पानी का इस्तेमाल होता है।
वेस्ट वर्जीनिया यूनिवर्सिटी में छपे एक लेख के मुताबिक, जब मक्का और गन्ने से एथेनॉल बनाया जाता है तो इसके जो प्लांट होते हैं, उनमें एक गैलन एथेनॉल बनाने के लिए तीन से चार गैलन पानी का इस्तेमाल होता है।
सेल्युलोजिक एथेनॉल को खेती का अवशेष, लकड़ी के टुकड़े और बची हुई चीजों से बनाया जाता है, इसमें एक गैलन एथेनॉल बनाने के लिए 6 से 10 गैलन पानी की जरूरत होती है ऐसा इसलिए क्योंकि इसकी प्रोसेसिंग बहुत जटिल होती है। मॉडर्न इंडस्ट्रियल डिस्टलरी में एक लीटर एथेनॉल बनाने के लिए तीन से पांच लीटर पानी का इस्तेमाल होता है।
जब आलोचक या पर्यावरण विशेषज्ञ एथेनॉल की इस बात के लिए आलोचना करते हैं कि इसे बनाने के लिए पानी का बहुत ज्यादा इस्तेमाल होता है तो वे ‘वर्चुअल वाटर’ की बात करते हैं। ‘वर्चुअल वाटर’ में फसल उगाने के लिए इस्तेमाल किया गया बारिश और सिंचाई का पूरा पानी शामिल होता है।
अगर चावल से एथेनॉल बनाया जाता है तो प्रति लीटर एथेनॉल बनाने के लिए 10,000 लीटर से ज्यादा पानी की जरूरत हो सकती है, क्योंकि धान की खेती के लिए बहुत ज्यादा सिंचाई की जरूरत पड़ती है।
गन्ने से एथेनॉल बनाना हो तो लगभग 3,000 से 4,000 लीटर पानी प्रति लीटर एथेनॉल बनाने के लिए चाहिए।
मक्का (कॉर्न) से एथेनॉल बनाना हो तो लगभग 1,000 से 4,600 लीटर पानी प्रति लीटर एथेनॉल बनाने के लिए चाहिए होता है।
GEMA का क्या कहना है?
एथेनॉल बनाने वाले उद्योग से जुड़े संगठन जैसे- Grain Ethanol Manufacturers Association (GEMA) का कहना है कि फसलों में इस्तेमाल किए जाने वाले बारिश के पानी को औद्योगिक पानी से जोड़कर बताना गलत है क्योंकि फसलों को खाने के लिए उगाया जाए या फिर ईंधन के लिए इसमें पानी तो इस्तेमाल होगा ही। GEMA का कहना है कि एक लीटर एथेनॉल के उत्पादन में 3-5 लीटर पानी का इस्तेमाल होता है।
दूसरी ओर, आलोचकों का कहना है कि गन्ना और धान जैसी फसलों को काफी पानी चाहिए और इससे ग्राउंडवाटर पर असर पड़ता है। उनका कहना है कि बायोफ्यूल कार्यक्रमों की पर्यावरणीय लागत का आकलन करते समय खेती में लगने वाले पानी को नजरअंदाज नहीं कर सकते।
एथेनॉल ब्लेंड ईंधन बना चिंता की वजह
देश में पेट्रोल में एथेनॉल ब्लेंड को बढ़ावा देने की सरकारी पहल का असर अब ग्राहकों को प्रभावित कर रहा है। यह ईंधन सिर्फ बाजार तक सीमित नहीं रह गया है बल्कि यह वाहन खरीदारों की सोच को भी प्रभावित करने लगा है। यहां क्लिक कर पढ़ें पूरी खबर।
