Jammu-Kashmir News: जम्मू-कश्मीर विधानसभा में इस हफ्ते ध्यानाकर्षण प्रस्ताव के दौरान बोलते हुए हंदवाड़ा के विधायक सज्जाद लोन ने एक अहम सवाल उठाया। वह यह था कि जम्मू-कश्मीर में गरीबों की गिनती कैसे होती है? उन्होंने कहा, “गरीब व्यक्ति की परिभाषा क्या है? हमें गरीब और गरीबी की एक समान परिभाषा की जरूरत है।”

उन्होंने कहा, “गरीबी की मौजूदा परिभाषा के अनुसार, ईडब्ल्यूएस के लिए जारी किए गए 92% सर्टिफिकेट जम्मू क्षेत्र से हैं और 8% कश्मीर क्षेत्र से हैं। इसका लगभग मतलब यह है कि जम्मू-कश्मीर में 92% गरीब लोग जम्मू क्षेत्र में रहते हैं और केवल 8% कश्मीर क्षेत्र में रहते हैं।”

सज्जाद लो ने बहस को फिर से दी हवा

लोन की बातों ने जम्मू-कश्मीर में उस बहस को फिर से हवा दी है जो अक्टूबर 2024 में उमर अब्दुल्ला सरकार के सत्ता में आने के बाद से चल रही है, शिक्षा और नौकरियों में आरक्षण को तर्कसंगत बनाने की बहस। यह बहस मार्च 2024 में जम्मू-कश्मीर आरक्षण नियमों में बदलाव के बाद और तेज हो गई। इन बदलावों के तहत अलग-अलग कैटेगरी के लिए सरकारी नौकरियों में आरक्षण का हिस्सा बढ़ाया गया, जिसमें अनुसूचित जनजाति सूची में और समुदायों को शामिल करने के बाद अनुसूचित जनजाति (ST) कोटा को 10% से बढ़ाकर 20% करना भी शामिल है। इन परिवर्तनों से सरकारी नौकरियों में कुल आरक्षण का हिस्सा 43% से बढ़कर लगभग 70% हो गया, जिससे 30% सीटें योग्यता के आधार पर उम्मीदवारों के लिए रह गईं।

इस कदम के खिलाफ ओपन-मेरिट वाले छात्रों ने विरोध किया। उनका तर्क था कि कोटा सिस्टम को तर्कसंगत बनाने की जरूरत है। इसके बाद उमर अब्दुल्ला सरकार ने इस पॉलिसी की समीक्षा के लिए एक कैबिनेट उप-समिति बनाई। कमेटी ने एससी और एसटी कोटा में कोई बदलाव किए बिना, मुख्य रूप से ‘पिछड़े इलाकों के निवासी’ और ‘आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग’ कैटेगरी के तहत मिलने वाले कोटे में कटौती करके, आरक्षित और ओपन-मेरिट कैटेगरी के बीच 50:50 का बंटवारा फिर से लागू करने की सिफारिश की।

सरकार ने आरक्षण पर अपनी कैबिनेट उप-समिति की रिपोर्ट लोक भवन को सौंप दी

मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने कहा है कि सरकार ने आरक्षण पर अपनी कैबिनेट उप-समिति की रिपोर्ट लोक भवन को सौंप दी है, लेकिन अभी तक कोई जवाब नहीं मिला है। विधानसभा में लोन के सवाल के उत्तर के अनुसार, सरकार ने पिछले दो सालों में 7580 रिक्त पदों को भरा है। ईडब्ल्यूएस आरक्षण 10% निर्धारित होने के कारण, इनमें से 758 पद ईडब्ल्यूएस उम्मीदवारों के लिए आरक्षित होंगे। लोन ने कहा कि सरकार के ईडब्ल्यूएस मानदंडों के आधार पर, इनमें से 697 पद जम्मू क्षेत्र के उम्मीदवारों को और 61 पद कश्मीर के उम्मीदवारों को मिलने चाहिए थे।

लेकिन बहस जारी रहने के साथ ही, लोन अब यह सवाल उठा रहे हैं कि क्या ईडब्ल्यूएस मानदंड जम्मू-कश्मीर में गरीबी के वितरण को सही ढंग से दर्शाते हैं। 30 सितंबर को खत्म हुए जम्मू-कश्मीर विधानसभा के सत्र के दौरान अपने संबोधन में, हंदवाड़ा विधायक ने ईडब्ल्यूएस कैटेगरी के तहत प्रमाण पत्र जारी करने में कश्मीर डिवीजन के साथ भेदभाव का आरोप लगाया।

लोन ने सरकारों की ओर से आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों की पहचान करने के लिए इस्तेमाल किए जाने वाले एक अन्य उपाय की ओर भी इशारा किया। इसमें पीएचएच और अंत्योदय अन्न योजना राशन कार्ड शामिल है। कश्मीर क्षेत्र में 37.71 लाख पीएचएच/एएवाई राशन कार्ड हैं, जबकि जम्मू में यह संख्या 29.81 लाख है। लोन ने कहा कि अगर इस मापदंड का इस्तेमाल ईडब्ल्यूएस के रोजगारों के वितरण को निर्धारित करने के लिए किया जाता, तो 758 में से 417 रोजगार कश्मीर को और 341 जम्मू को मिलते।

लोन के अनुसार, ये दोनों मापदंड जम्मू-कश्मीर में गरीबी की बिल्कुल अलग-अलग तस्वीर पेश करते हैं। उन्होंने कहा, “इस परिभाषा के अनुसार, 55% गरीब कश्मीर में और 45% जम्मू में रहते हैं। लेकिन ईडब्ल्यूएस मानदंड की परिभाषा के अनुसार, 92% गरीब जम्मू क्षेत्र में और 8% कश्मीर में रहते हैं।” उन्होंने आगे कहा, “सरकार गरीबों के लिए करोड़ों रुपये की सब्सिडी कैसे खर्च कर सकती है और फिर नौकरी के लिए आवेदन करते समय उनकी गरीबी को कैसे नकार सकती है?” लोन ने कहा कि यही असमानता अभी तक भरी जाने वाली 49,672 रिक्तियों में भी दोहराई जाएगी।

लोन ने कहा, “ईडब्ल्यूएस आरक्षण के 10% कोटे का मतलब है कि 4967 नौकरियां ईडब्ल्यूएस के लिए आरक्षित होंगी।” उन्होंने सरकारी नौकरियों के वितरण में क्षेत्रीय असमानता की ओर भी इशारा किया। उन्होंने कहा, “4967 (ईडब्ल्यूएस) नौकरियों में से 4569 नौकरियां जम्मू क्षेत्र को और लगभग 398 नौकरियां कश्मीर क्षेत्र को मिलेंगी। पीएचएच/एएवाई राशन कार्ड के मानदंडों के अनुसार, 2235 नौकरियां जम्मू क्षेत्र को और 2732 नौकरियां कश्मीर क्षेत्र को मिलेंगी।”

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जम्मू-कश्मीर विधानसभा में सोमवार को मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला के पूर्ण राज्य का दर्जा बहाल करने के प्रस्ताव पर सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच तीखी बहस हुई। बीजेपी विधायकों ने प्रस्ताव में राज्य के 5 अगस्त 2019 से पहले के दर्जे का जिक्र किए जाने पर आपत्ति जताई। यहां क्लिक कर पढ़ें पूरी खबर…