दिल्ली में आम आदमी पार्टी (AAP) के प्रमुख अरविंद केजरीवाल को हराने के महीनों बाद भाजपा ने अब पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी को सत्ता से बेदखल कर दिया है। तीन बार की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी अपनी ही सीट हार गईं और उनकी पार्टी टीएमसी काफी पीछे रहे गई।

2011 में पश्चिम बंगाल की पहली महिला मुख्यमंत्री बनने के बाद से वह सोमवार तक राजनीतिक रूप से दबदबा बनाए रखीं। लेकिन जैसे-जैसे मतगणना आगे बढ़ती गई ममता का किला गिरता चला गया, यहां तक की वह अपनी भी सीट नहीं बचा सकीं और भाजपा नेता सुवेंदु अधिकारी से हार गईं।

हालांकि, यह पहली बार नहीं था जब सुवेंदु अधिकारी ने ममता बनर्जी को हराया था। उन्होंने 2021 में नंदीग्राम में भी उन्हें हराया था, लेकिन इस बार की हार कहीं ज्यादा महत्वपूर्ण है, क्योंकि भाजपा अब पश्चिम बंगाल में सरकार बनाने जा रही है।

पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में भाजपा ने 206 सीटों पर जीत हासिल की। जबकि ममता की टीएमसी 81 सीटों पर ही सिमट गई। भवानीपुर से सुवेंदु अधिकारी ने ममता बनर्जी को 15,114 वोटों से हराया। सुवेंदु के खिलाफ यह उनकी लगातार दूसरी हार है। 2021 विधानसभा चुनाव में सुवेंदु नंदीग्राम से ममता के खिलाफ जीते थे।

2021 में सुवेंदु अधिकारी ने बनर्जी को 1,950 से अधिक वोटों से हराया था । हालांकि, टीएमसी के 215 सीटों के बहुमत ने उन्हें भवानीपुर उपचुनाव जीतने के बाद मुख्यमंत्री के रूप में वापसी करने का मौका दिया। मुख्य चुनावों में सुवेंदु अधिकारी ने 1.10 लाख वोट हासिल किए, जबकि बनर्जी को 1.08 लाख वोट मिले। बाद में ममता ने भवानीपुर से उपचुनाव लड़ा और 85,263 वोट प्राप्त किए।

2011 में ममता शुरू में चुनाव नहीं लड़ा था और वे 2009 में चुनी गई लोकसभा सांसद थीं, लेकिन मुख्यमंत्री पद बरकरार रखने के लिए, उन्हें छह महीने के भीतर विधानसभा उपचुनाव जीतना था। दोनों बार, 2021 और 2011 में भवानीपुर उनके लिए मददगार साबित हुआ।

भवानीपुर 2011 से ममता बनर्जी की पसंदीदा सीट रही है। उन्होंने 2011 में 73,635 वोटों से और 2016 में 65,520 वोटों से चुनाव जीता था।

2011 में उन्होंने नंदिनी मुखर्जी को 54,213 वोटों के अंतर से हराया, जबकि 2016 में उन्होंने कांग्रेस की दीपा दासमुंशी को 25,301 वोटों से हराया। 2021 में उन्होंने भाजपा की प्रियंका तिबरेवाल को 58,835 वोटों के अंतर से हराया।

2021 में जब ममता बनर्जी ने पश्चिम बंगाल में लगातार तीसरी बार मुख्यमंत्री पद की शपथ ली, तो वह दिल्ली में शीला दीक्षित के बाद ऐसा करने वाली भारत की दूसरी महिला बनीं।

पश्चिम बंगाल में भाजपा की जीत से राज्य में पार्टी पहली बार सरकार बनाएगी। यह जीत लगभग तीन दशकों के अंतराल के बाद 2025 के दिल्ली विधानसभा चुनावों में भाजपा की शानदार जीत के कुछ ही महीनों बाद मिली है।

वहीं, दिल्ली की बात करें तो नई दिल्ली विधानसभा से तीन बार विधायक रह चुके आम आदमी पार्टी के राष्ट्रीय संयोजक अरविंद केजरीवाल 2025 के चुनावों में भी 4,000 वोटों के अंतर से अपनी सीट हार गए थे। भाजपा के परवेश साहिब सिंह वर्मा को 30,088 वोट मिले, जबकि केजरीवाल को 25,999 वोट मिले थे।

केजरीवाल ने 2013 में इस सीट से पहला चुनाव जीता था। जिसमें उन्होंने तत्कालीन मुख्यमंत्री शीला दीक्षित को 25,846 वोटों के अंतर से हराया था। उन्हें 44,269 वोट मिले थे। 2015 में यह अंतर बढ़कर 57,213 वोट हो गया और बाद में 2020 में घटकर 46,758 वोट रह गया, जिसमें उनकी जीत का अंतर 21,697 वोटों का था।

2025 में अरविंद केजरीवाल न केवल अपनी सीट हार गए, बल्कि 2015 और 2020 में दो बार भारी बहुमत हासिल करने के बाद उनकी आम आदमी पार्टी ने भी बहुमत खो दिया। इन दोनों वर्षों में आम आदमी पार्टी ने दिल्ली विधानसभा की कुल 70 सीटों में से 60 से ज्यादा सीटें जीती थीं।

वहीं, राज्यसभा में आम आदमी पार्टी (AAP) की कुल 10 सीटों में से दो-तिहाई यानी सात सांसद 24 अप्रैल को भाजपा में शामिल हो गए। इनमें राघव चड्ढा, संदीप पाठक, अशोक कुमार मित्तल, हरभजन सिंह, राजिंदर गुप्ता, विक्रमजीत सिंह साहनी (सभी पंजाब से) और स्वाति मालीवाल (दिल्ली से) शामिल हैं।

पश्चिम बंगाल और दिल्ली में आरएसएस (RSS) की भूमिका को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। आरएसए ने मुख्य रूप से जमीनी स्तर पर हिंदुत्व विचारधारा के प्रसार, मतदाता जागरूकता और भाजपा के लिए संगठनात्मक ढांचे को मजबूत करने में रही है। बंगाल में संघ ने छोटे समूहों (दो लाख बैठकें) के माध्यम से मतदाता जागरूकता अभियान चलाकर टीएमसी विरोधी वोटों को एकजुट करने और ग्रामीण क्षेत्रों में पैठ बढ़ाने में अहम भूमिका निभाई।

बंगाल में RSS की भूमिका

जमीनी स्तर पर पकड़: संघ ने ग्रामीण, आदिवासी और सीमावर्ती क्षेत्रों में अपनी पहुंच बढ़ाकर भाजपा की चुनावी रणनीति को जमीनी फीडबैक प्रदान किया।

मतदाता जागरूकता: चुनाव के दौरान, स्वयंसेवकों ने निडर होकर वोट देने की अपील की और सुरक्षा का आश्वासन देकर मतदाताओं को प्रेरित किया।

संगठनात्मक विस्तार: ‘शताब्दी वर्ष’ कार्यक्रमों के माध्यम से बुद्धिजीवी वर्ग में पैठ बढ़ाई और टीएमसी सरकार के खिलाफ असंतोष को संगठित किया।

दिल्ली में RSS की भूमिका

वैचारिक आधार: दिल्ली जैसे शहरी क्षेत्र में RSS का फोकस चरित्र निर्माण और हिंदू एकता के माध्यम से हिंदू राष्ट्र की अवधारणा को मजबूत करना रहा।

सामाजिक नेटवर्क: दिल्ली के विभिन्न इलाकों में शाखाओं के माध्यम से स्थानीय स्तर पर स्वयंसेवकों का मजबूत नेटवर्क तैयार करना।

राजनीतिक समन्वय: भाजपा को रणनीतिक सलाह और चुनाव के दौरान जमीनी कार्यकर्ता उपलब्ध कराना।

ऐसे में पश्चिम बंगाल और दिल्ली की बात करें तो दोनों जगह आरएसएस जमीनी स्तर पर काम किया और हिंदू एकता पर जोर दिया। जिसमें वो सफल रही। दोनों ही राज्यों में आरएसएस ने हिंदू समुदाय को एकजुट करने के लिए सामाजिक और सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित किए। ऐसे में आरएसएस बंगाल में टीएमसी को चुनौती देने के लिए एक निर्णायक जमीनी शक्ति के रूप में उभरा।

दिल्ली में सत्ता परिवर्तन और बंगाल में सेंधमारी के साथ भाजपा ने उन दो नेताओं को हरा दिया है जो कभी अपने राजनीतिक गढ़ों में अजेय प्रतीत होते थे। इससे भारत के राजनीतिक मानचित्र पर प्रमुख विपक्षी गढ़ों की सूची सिकुड़ गई है। पार्टी ने बंगाल की जीत के बाद पंजाब इकाई द्वारा ‘नेक्स्ट पंजाब’ का नारा जारी करके यह संकेत दे दिया है कि वह आगे कहां विस्तार करना चाहती है।

आरजी कर से लेकर ‘सिंडिकेट’ तक: ममता बनर्जी की हार के पांच बड़े कारण

पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी को भारी हार का सामना करना पड़ रहा है। ऐसे में उन प्रमुख कारकों पर ध्यान केंद्रित हो रहा है जो तीन दशक लंबे कम्युनिस्ट शासन को समाप्त करने के 15 साल बाद उनकी हार का कारण बने। पढ़ें पूरी खबर।