Parliament Number Game: पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के बाद एक तरफ जहां टीएमसी में बगावत हुई तो दूसरी ओर शिवसेना उद्धव गुट के 6 सांसद शिवसेना शिंदे गुट में शामिल हो गए। एक तरफ एनडीए मजबूत हो रहा है, तो दूसरी ओर विपक्षी दल बिखरना यह संकेत दे रहा है कि बीजेपी अपने एनडीए गठबंधन के लिए दो-तिहाई बहुमत हासिल करने और संविधान संशोधन के लिए पूरी ताकत झोंक रही है।
टीएमसी और शिवसेना के अतिरिक्त सांसदों का समर्थन हासिल करने के बाद बीजेपी संसद के आगामी मानसून सत्र में परिसीम संबंधी संविधानिक संशोधन विधेयक और महिला आरक्षण कानून को लागू करने से संबंधित प्रस्ताव को पारित करवाने का प्रयास करती है। इतना ही नहीं, सरकार 17 जुलाई को 130वां संवैधानिक संशोधन विधेयक भी पेश कर सकती है। इसमें गंभीर अपराधों के लिए 30 दिनों तक गिरफ्तारी या हिरासत में रहने के बाद मंत्रियों को पद से हटाने का प्रावधान शामिल है।
विपक्ष ने आक्रामकता से किया था विधेयकों का विरोध
बता दें कि परिसीमन और मंत्रियों के हटाए जाने से संबंधित विधेयकों का विपक्षी दलों विरोध किया है। साथ ही विपक्ष ने अप्रैल में लोकसभा और राज्य विधानसभाओं के आकार को बढ़ाने के सरकार के प्रयासों को विफल कर दिया था। एनडीए सरकार के पास दो तिहाई बहुमत न होने के चलते दोनों विधेयक पारित नहीं हो पाए थे, क्योंकि वें संविधान संशोधन से संबंधित हैं, उनके लिए दो तिहाई बहुमत के समर्थन की अनिवार्यता है।
संविधान संशोधन और दो-तिहाई की अनिवार्यता
संविधान का अनुच्छेद 368 कहता है कि संविधान में संशोधन की पहल केवल संसद के किसी भी सदन में इस उद्देश्य से विधेयक पेश करके ही की जा सकती है, और जब विधेयक प्रत्येक सदन में उस सदन की कुल सदस्यता के बहुमत से और उस सदन के उपस्थित और मतदान करने वाले सदस्यों के कम से कम दो-तिहाई बहुमत से पारित हो जाए।
इसका मतलब ये हुआ कि संविधान संशोधन के लिए दो शर्तें पूरी होनी चाहिए। ऐसे विधेयक को लोकसभा में कम से कम 273 सांसदों का समर्थन चाहिए, जिसकी कुल सदस्यता 545 है। इसके अलावा उपस्थित और मतदान करने वाले सदस्यों में से दो-तिहाई का समर्थन आवश्यक है। यदि वर्तमान लोकसभा के सभी 540 सांसद उपस्थित हों और मतदान करें, तो इसके पक्ष में कम से कम 360 वोटों की आवश्यकता होगी।
एनडीए के सांसदों की संख्या
अप्रैल में संविधान के 131वें संशोधन विधेयक, 2026 पर मतदान के दौरान लोकसभा के 540 मौजूदा सांसदों में से 528 ने भाग लिया था। इनमें से 298 ने इसके पक्ष में, 230 ने इसके विरोध में मतदान किया और 11 सांसद अनुपस्थित रहे।
सूत्रों के अनुसार, अनुपस्थित सांसदों में सात टीएमसी, दो कांग्रेस और जेल में बंद सात निर्दलीय सांसदों में से दो शामिल थे। हालांकि एनडीए ने पहली शर्त पूरी कर ली, लेकिन उसे दो-तिहाई बहुमत (352) नहीं मिल पाया। एनडीए के 293 वोटों का विवरण इस प्रकार है।
- बीजेपी: 240
- टीडीपी: 16
- जेडी(यू): 12
- शिवसेना शिंदे गुट: 7
- लोक जनशक्ति पार्टी: 5
इसके अलावा जनता दल (सेक्युलर), जनसेना पार्टी, आरएलडी के दो दो सांसद, आजसू, अपना दल (एस), असम गण परिषद, हिंदुस्तानी अवाम मोर्चा, एनसीपी (अब सुनेत्रा पवार के नेतृत्व में), और सिक्किम क्रांतिकारी मोर्चा के कुल मिलाकर सात सांसद हैं।
दलबदल से कितनी बदली स्थिति?
एनडीए के 293 सांसदों से इतर अब सवाल यह है कि हाल ही में जो दल-बदल हुई है, उससे नंबर गेम कितना बदला है। इसको लेकर सबसे पहले बात टीएमसी की करतें हैं। इसके 20 बागी सांसदों ने दलबदल विरोधी कानून से बचने के लिए पार्टी से अलग होकर नेशनलिस्ट सिटिजन्स पार्टी ऑफ इंडिया नामक एक कम चर्चित संगठन में विलय कर लिया।
दूसरी ओर महाराष्ट्र के सीएम एकनाथ शिंदे के नेतृत्व वाली शिवसेना में, पूर्व सीएम उद्धव ठाकरे के गुट वाली शिवसेना यूबीटी से बगावत करके 6 सांसद शामिल हो गए थे। इन दोनों पार्टियों की टूट के चलते वर्तमान में एनडीए का नंबर लोकसभा में 318 से 319 सांसदों तक का हो गया है, जो कि 360 के आंकड़े से अभी भी 41 से 42 कम है।
डीएमके की भी मदद ले सकती है BJP
हालांकि, बीजेपी दो तिहाई तक पहुंचने के लिए अभी तमिलनाडु में हाल ही में सत्ता से बाहर हुए डीएमके से समर्थन की कोशिश भी कर सकती है। तमिलनाडु में डीएमके की चुनावी हार के बाद कांग्रेस ने टीवीके का समर्थन कर डीएमके से गठबंधन तोड़ दिया था। इसके चलते डीएमके, कांग्रेस से काफी नाराज है। डीएमके के नेता हाल ही में हुई इंडिया गठबंधन की बैठक में भी शामिल नहीं हुए थे।
डीएमके के लोकसभा में 22 सांसद हैं। ऐसे में बीजेपी और एनडीए के कई घटक दल पर्दे के पीछे से डीएमके को अप्रोच कर सकते हैं। सूत्र बताते हैं कि डीएमके में कुछ गुट बीजेपी के साथ विशेष मुद्दों पर बातचीत करने के लिए तैयार भी हैं, यद्यपि अभी इस मुद्दे पर कोई आधिकारिक बयान इस संबंध में सामने नहीं आया है। डीएमके के अलावा कुछ निर्दलीय सांसद भी हैं, जो कि एनडीए के लिए दो तिहाई बहुमत में अहम भूमिका निभा सकते हैं।
विपक्ष को लगा है बड़ा झटका
एनडीए से इतर अगर बात विपक्षी दलों की करें तो दलबदल होने से पहले इंडिया गठबंधन की कुल संख्या 225 थी। इसमें कांग्रेस के 98, समाजवादी पार्टी के 37, टीएमसी के 28, डीएमके के 22, शिवसेना (यूबीटी) के 9, एनसीपी (शरदचंद्र पवार) के 8, वामपंथी दलों के 8, आरजेडी के 4, आईयूएमएल, झारखंड मुक्ति मोर्चा और आप के तीन-तीन और नेशनल कॉन्फ्रेंस के दो सांसद शामिल थे। टीएमसी और शिवसेना (यूबीटी) में विभाजन के बाद सांसदों के इस गुट में 26 सीटें कम हो गई हैं, और डीएमके को लेकर भी अनिश्चितता बनी हुई है।
मानसून सत्र में फिर पेश हुए बिल तो क्या होगा?
एक अहम सवाल यह भी है कि अगर संसद के मानसून सत्र में एक बार फिर से केंद्र की मोदी सरकार संविधान संशोधन और दो तिहाई अनिवार्यता वाले विधेयक पेश करती है, तो मतदान की स्थिति क्या होगी। इसको लेकर अभी का नंबर गेम बताता है कि एनडीए को अभी भी दो तिहाई के काफी दूरी तय करनी है। वह जगन मोहन रेड्डी के नेतृत्व वाली वाईएसआरसीपी जैसी पार्टी का समर्थन हासिल कर सकता है, जिसके पास 4 सांसद हैं।
इसके अलावा बीजेपी यह भी कोशिश कर सकती है कि शरद पवार के गुट वाली एनसीपी, या डीएमके जैसी विपक्षी पार्टियों से कोई सेटिंग हो जाए, जिससे वो विधेयक की वोटिंग प्रक्रिया से दूरी बना लें। इन राजनीतिक दलों की संख्या 30 तक जाती हैं। अगर ये सांसद उपस्थित नहीं होते हैं, तो लाजमी तौर पर दो-तिहाई बहुमत का आंकड़ा 360 से नीचे आ सकता है। अगर ऐसा होता है तो निर्दलीय सांसदों की भूमिका महत्वपूर्ण हो जाती है। हालांकि, उनमें से अमृतपाल सिंह और शेख अब्दुल राशिद वर्तमान में जेल में हैं।
उदाहरण के लिए अगर डीएमके और एनसीपी (एसपी) मतदान से दूर रहते हैं, तो दो-तिहाई बहुमत घटकर 330 रह जाएगा, जिससे एनडीए को 11 वोटों की कमी रह जाएगी। सैद्धांतिक रूप से वाईएसआरसीपी और मतदान करने वाले पांच निर्दलीय उम्मीदवारों के समर्थन से एनडीए को केवल दो वोटों की आवश्यकता होगी।
राज्यसभा की क्या है स्थिति?
लोकसभा से अलग अगर बात राज्यसभा की करें तो वर्तमान में 245 में से 242 सीटें भरी हुई हैं, जिससे पहली शर्त को पूरा करने के लिए 123 वोट और सभी सदस्यों की उपस्थिति और मतदान की स्थिति में विशेष बहुमत के लिए 161 वोट पर्याप्त हैं। बीजेपी के पास अकेले 114 सांसद हैं, जिनमें अप्रैल में शामिल हुए AAP के सात सांसद भी शामिल हैं। अपने बाकी सहयोगियों के साथ, NDA के पास लगभग 140 सांसद हैं। गैर-NDA पार्टियों के पास 100 से कुछ अधिक सांसद हैं।
वोटिंग से परहेज का क्या है अर्थ?
संसद में ‘मतदान से परहेज करने’ का सीधा सा मतलब यह है कि कोई सांसद सदन में उपस्थित तो है, लेकिन वह किसी प्रस्ताव या विधेयक के पक्ष या विपक्ष में अपना वोट नहीं देना चाहता। नियमों के मुताबिक, ऐसे सांसद केवल अपनी उपस्थिति दर्ज कराते हैं, उनके इस फैसले को ‘उपस्थित और मतदान’ नहीं माना जाता क्योंकि ‘मतदान’ शब्द का इस्तेमाल सिर्फ ‘हाँ’ या ‘ना’ कहने वालों के लिए होता है।
इसका सबसे बड़ा फायदा यह है कि सांसदों को अपनी असहमति या तटस्थता दिखाने के लिए सदन से बाहर जाने की जरूरत नहीं पड़ती; वे अंदर बैठकर भी वोट डालने से मना कर सकते हैं।
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संविधान के 13वें संशोधन विधेयक का प्रस्ताव संसद की संयुक्त समिति यानी जेपीसी के पास है। इसमें मंत्रियों को हिरासत में लिए जाने पर, 30 दिन बाद उन्हें पद से हटाने का प्रावधान भी है। 17 जुलाई को जेपीसी की कमेटी इस प्रस्ताव पर रिपोर्ट पारित कर सकती है। सूत्र बताते हैं कि जेपीसी की रिपोर्ट में, सबसे विवादित प्रावधान को बरकरार रखे जाने की संभावना है। पढ़िए पूरी खबर…
