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978 करोड़ खर्च कर चंद्रयान-2 की सफल लॉन्चिंग, लेकिन भारत के लिए कैसे बनेगा लाभकारी?

‘चंद्रयान-2’ मिशन भारत के लिए इसलिए भी बेहद महत्वपूर्ण है क्योंकि चांद के दक्षिणी ध्रुव क्षेत्र में अभी तक कोई देश नहीं पहुंचा है।

978 करोड़ खर्च कर चंद्रयान-2 की सफल लॉन्चिंग। फोटो: ISRO

भारत ने अपने दूसरे चंद्र मिशन ‘चंद्रयान-2’ का सोमवार को यहां सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र (एसडीएससी) से सफलतापूर्वक प्रक्षेपण किया। इस पूरे प्रोजेक्ट की लागत 978 करोड़ रुपए है। अमेरिका, रूस और चीन के बाद भारत चौथा देश है जो चांद तक पहुंच गया है। हालांकि जर्मनी जापान और फ्रांस सरकार भी ऐसा कर सकती है लेकिन उनका मानना है कि टैक्स भरने वाली जनता के पैसों को ऐसे मिशन पर खर्च नहीं करना चाहिए। हालांकि भारत किसी भी सूरत में किसी देश से पीछे नहीं रहना चाहता इसलिए समय-समय पर अंतरिक्ष मिशन लॉन्च करता रहता है। यह इसरो का यह अब तक का सबसे जटिल और सबसे प्रतिष्ठित मिशन है। यदि सब कुछ सही रहता है तो रूस, अमेरिका और चीन के बाद भारत, चांद की सतह पर ‘सॉफ्ट लैंडिंग’ करने वाला चौथा देश बन जाएगा। ‘चंद्रयान-2’ मिशन भारत के लिए इसलिए भी बेहद
महत्वपूर्ण है क्योंकि चांद के दक्षिणी ध्रुव क्षेत्र में अभी तक कोई देश नहीं पहुंचा है।

अब सवाल यह है कि यह भारत के लिए कैसे लाभकारी है? कहा जा रहा है कि यह मिशन पूरे सौर मंडल के विकास को समझने में हमारी मदद कर सकता है। चंद्रमा 3.5 अरब वर्ष पुराना है लेकिन आखिर चंद्रमा कैसे अस्तित्व में आया इसके पीछे क्या थ्योरी रही होगी ये इस मिशन के जरिए इन जानकारियों को पाने के लिए एक कदम बढ़ाया जा रहा है। अब सवाल यह है कि दक्षिणी ध्रुव क्षेत्र में ‘सॉफ्ट लैंडिंग’ क्यों करवाई जा रही है? दरअसल आजतक कोई भी देश इसपर लैंडिंग नहीं करवा पाया है। यहां पर बहुत सारी बर्फ जमी हुई है। अगर भारत यहां पर पहुंचता है तो वहां मौजूदा पानी के मौजूदगी के अन्य सबूतों को एकत्रित कर सकता है। मालूम हो कि इससे पहले 2008 में भी चंद्रयान-1 को लॉन्च किया गया था इसमें हमने दुनिया के सामने ये जानकारी रखी थी कि चंद्रमा की सतह पर ‘पानी’ मौजूद है चाहे वह मॉल्यूकुलर फॉर्म में ही क्यों न हो।

भारत जैसा विकासशील देश क्यों इतनी रकम खर्च कर रहा है? भारत जैसा देश को गगनयान मिशन पर 10 हजार करोड़ रुपए खर्च कर रहा है उसका चांद की बारीकियों को जानने के लिए 978 करोड़ रुपए का एक प्रोजेक्ट लॉन्च करना तकनीक की जरूररत को दर्शाता है। भारत ने ऐसा करके यह दिखाया है कि तकनीक ही सर्वोपरि है। हालांकि 2008 में मनमोहन सिंह की सरकार में चंद्रयान-1 को लॉन्च किया गया था। इसमें भारत ने दुनिया के सामने कई अहम जानकारियां रखी थीं। इनमें चंद्रमा की सतह पर ‘पानी’ मौजूद है यह भी भारत ने दुनिय को बताया।

स्वदेशी तकनीक से निर्मित ‘चंद्रयान-2’ में कुल 13 पेलोड हैं। आठ ऑर्बिटर में, तीन पेलोड लैंडर ‘विक्रम’ और दो पेलोड रोवर ‘प्रज्ञान’ में हैं। लैंडर ‘विक्रम’ का नाम भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान कार्यक्रम के जनक डॉ. विक्रम ए साराभाई के नाम पर रखा गया है। दूसरी ओर, 27 किलोग्राम वजनी ‘प्रज्ञान’ का मतलब संस्कृत में ‘बुद्धिमता’ है। ऑर्बिटर, चंद्रमा की सतह का निरीक्षण करेगा और पृथ्वी तथा ‘चंद्रयान-2’ के लैंडर ‘विक्रम’ के बीच संकेत प्रसारित करेगा। लैंडर ‘विक्रम’ को चंद्रमा की सतह पर भारत की पहली सफल लैंडिंग के लिए डिजाइन किया गया है। ‘प्रज्ञान’ नाम का रोवर आर्टिफिशियल इन्टेलिजेन्स संचालित 6-पहिया वाहन है।

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