ताज़ा खबर
 

MSP कानूनी तौर पर कैसे की जा सकती है बाध्य? समझिए, इसकी गारंटी से जुड़ा गणित

एमएसपी पर कानूनी गारंटी देना सरकार के लिए फिलहाल संभव नहीं है। बाजार के गणित को देखा जाए तो ऐसा करना एक तरह से नामुमकिन है। सरकार का खजाना भी उसे ऐसा करने की अनुमति नहीं देता है।

Author Edited By shailendra gautam नई दिल्ली | Updated: January 23, 2021 3:55 PM
किसान आंदोलन का एक दृश्य (फोटो सोर्सः एजेंसी)

किसानों और सरकार के बीच का गतिरोध खत्म होने का नाम नहीं ले रहा है। किसान अड़े हैं कि सरकार तीनों कृषि कानूनों को वापस लेकर एमएसपी पर कानून बनाए, लेकिन देखा जाए तो एमएसपी पर कानूनी गारंटी देना सरकार के लिए फिलहाल संभव नहीं है। बाजार के गणित को देखा जाए तो ऐसा करना एक तरह से नामुमकिन है।

सरकार का खजाना भी उसे ऐसा करने की अनुमति नहीं देता है। तभी विशेषज्ञ एमएसपी के बजाए किसानों की न्यूनतम आय सुनिश्चित करने पर जोर देते रहे हैं। केंद्र की योजना प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि हो या फिर तेलंगाना सरकार की योजना, इन सभी में किसानों की हालत सुधारने के लिए डायरेक्ट कैश ट्रांसफर किया जाता है।

वैसे देखा जाए तो एमएसपी को दो तरह से कानूनी तौर पर बाध्य बनाया जा सकता है। पहले में सरकार प्राइवेट बायर्स को बाध्य करे कि किसी भी फसल की खरीद एमएसपी से नीचे नहीं की जाएगी। मंडियों में लगने वाली बोली में इसे फ्लोर प्राइज के तौर पर लागू किया जा सकता है। गन्ना खरीद के मामले में उत्तर प्रदेश और हरियाणा की सरकारें इसी तरह से काम कर रही हैं। एमएसपी को गारंटी बनाने का दूसरा तरीका यह है कि सरकारें खुद उन सारे कृषि उत्पादों की खरीद करें, जिन्हें एमएसपी के दायरे में रखा गया है। 2019-20 की बात करें तो सरकार की अधिकृत एजेंसियों एफसीआई व अन्य ने एमएसपी पर 140834 करोड़ के धान और 75060 करोड़ रुपए के गेहूं की खरीद की थी।

हालांकि खेत में पैदा होने वाली सारी फसल बाजार में नहीं आ पाती। फसल का कुछ हिस्सा किसान अपने पास रख लेते हैं। इसे वो अपने लिए इस्तेमाल करते हैं। इसमें जानवरों का चारा और अगली फसल के लिए बीज भी होते हैं। अभी सरकार ने 23 कृषि उत्पादों को एमएसपी के दायरे में रखा है। 2019-20 की बात करें तो इन सभी उत्पादों को एमएसपी पर खरीदने में सरकार का खर्च 10.78 लाख करोड़ रुपए होता। इसमें गन्ने की कीमत शामिल नहीं है। गन्ने की एमएसपी पर खरीद का जिम्मा शुगर मिल के मालिकों पर होता है। इसे भी अन्य फसलों के साथ मिला दिया जाए तो 2019-20 के दौरान एमएसपी पर सारी फसलों की खरीद के लिए 2.7 लाख करोड़ रुपये की और जरूरत पड़ती। इतना बोझ सरकार की कमर तोड़ने वाला है।

सरकारी एजेंसियां मंडी में आने वाले सारे अनाज की खऱीद नहीं करतीं। जो अनाज मंडी में आता है अगर उसका एक चौथाई भी सरकार खरीद ले तो उससे बाजार भाव बहुत ऊंचा हो जाएगा। सरकार जो खरीद किसानों से करती है, उसमें से गेहूं और चावल रियायती दरों पर नेशनल फूड सिक्योरिटी एक्ट के तहत उपलब्ध कराती है। इसमें उसे भारी नुकसान होता है। सरकार के अपने बजट की बात करें तो वह उसे सालाना केवल 1 से 1.5 लाख करोड़ रुपए इस मद में उपलब्ध कराता है जिसे एमएसपी के तहत फसलों की खरीद पर खर्च किया जा सके। यानि सरकार के लिए एमएसपी पर सारा अनाज खरीदना तर्कसंगत नहीं है।

एमएसपी पर खरीद के लिए सरकार प्राइवेट बायर्स को ज्यादा बाध्य नहीं कर सकती है। गन्ना मिलों की हालत देखें तो इसका साफ अंदाजा हो जाता है। कानून के बावजूद शुगर मिल मालिक किसानों को गन्ने के मूल्य का भुगतान नहीं कर पा रहे हैं। वैसे भी प्राइवेट बायर्स उस कीमत पर फसलों की खरीद नहीं करेंगे, जो बाजार का गणित बिगाड़ दे। इसमें उन्हें नुकसान हो सकता है और वो इस कारोबार से अलग होते हैं तो इसका नुकसान किसानों को हो सकता है। वैसे भी एमएसपी पर खरीद का दायरा पहले से ही विवादों में है। इसके दायरे में न तो फल सब्जियां आती हैं और न ही दूध व उनसे बने उत्पाद। दूध और उससे बने उत्पादों की कुल कीमत उन तमाम फसलों से ज्यादा है जो एमएसपी के दायरे में रखी गई हैं।

Next Stories
1 लालू प्रसाद यादव की तबीयत में सुधार नहीं, रिम्स से दिल्ली AIIMS के लिए रेफर, हालत चिंताजनक
2 उत्तराखंडः राजभवन मार्च से रोका तो पुलिस पर भड़के किसान; MP में कांग्रेसियों पर पानी की बौछार, दिग्विजय समेत 20 गिरफ्तार
3 Kerala Karunya Lottery KR 483 Today Results: जारी हुए लॉटरी रिजल्ट, पहला का इनाम 80 लाख रुपये
ये पढ़ा क्या?
X