ताज़ा खबर
 

LAC पर कैसे होगी चीन की बोलती बंद? भारत के पूर्व विदेश सचिव ने बताए ये 3 रास्ते

Indo-China Conflict: पूर्व विदेश सचिव कंवल सिबल ने Jansatta.Com से एक्सक्लूसिव बातचीत में कहा कि ऐसे सेंसेटिव एरिया, जो हम मानते हैं कि टैक्टिकल इंपॉर्टेंस और एडवांटेज के हैं, उसपर हम काबू कर लें। फिर चीन बार्गेन को मजबूर होगा।

Author Updated: June 24, 2020 4:09 PM
LAC, Galwan Valley, India-China, PLA, Indian Armyभारत के पूर्व विदेश सचिव कंवल सिबल।

LAC पर चीनी सेना के साथ झड़प के बाद तनाव बरकरार है। हालांकि सेना के स्तर पर नए सिरे से बातचीत भी शुरू हो गई है और इस पूरे विवाद को हल करने और तनाव कम करने का प्रयास किया जा रहा है। इस पूरे मामले पर भारत के पूर्व विदेश सचिव कंवल सिबल ने Jansatta.Com से एक्सक्लूसिव बातचीत में कहा कि तनाव को हल करने का पहला तरीका यही है कि मिलिट्री लेवल पर बात हो।

दूसरा रास्ता डिप्लोमेटिक लेवल पर बातचीत का है,  उन्हें कहें कि वे अपनी अपनी पुरानी जगह पर वापस लौट जाएं। लेकिन इसका एक तीसरा हल भी है। वो यह कि ऐसे सेंसेटिव एरिया, जो हम मानते हैं कि टैक्टिकल इंपॉर्टेंस और एडवांटेज के हैं, उसपर हम काबू कर लें। फिर चीन के ऊपर रिस्पांसिबिलिटी डालें कि वे पीछे हटें। ऐसी स्थिति में चीन बार्गेन करने के लिए मजबूर होगा।

क्या है गलवान वैली का रणनीतिक महत्व?: कंवल सिबल कहते हैं कि गलवान वैली का रणनीतिक महत्व लिमिटेड है, लेकिन युद्ध की स्थिति में यह अहम साबित होगा। चीन को लगता है कि हमने जो नई सड़क बनाई है, वहां डिस्टर्बेंस के लिए गलवान वैली की हाइट्स पर कब्जा कर लें। युद्ध की स्थिति में ऊंचाई पर होने की वजह से वे दबाव डाल सकते हैं, लेकिन इन हाइट्स को भारतीय वायुसेना आसानी से ध्वस्त कर सकती है। इसमें कोई मुश्किल नहीं है। गलवान बहुत नैरो वैली है, अगर बड़े पैमाने पर युद्ध की स्थिति आई तो उन्होंने (चीन) जो भी जमा कर रखा है, उसे ध्वस्त करने में एयरफोर्स को समय नहीं लगेगा।

क्या नीतियां बदलने की जरूरत है? : चीन के साथ ताजा विवाद के बाद भारत की नीतियों पर भी सवाल उठ रहा है। इस सवाल के जवाब में कंवल सिबल कहते हैं कि चीन दुनिया का सेकेंड लार्जेस्ट इकॉनमी और बिगेस्ट एक्सपोर्टर है। हमारे और उनके बीच बॉर्डर का डिमार्केशन नहीं हुआ है। उनकी फौज एलएसी पर है, हमारी फौज वहां है। अगर चीन से हम अपने रिश्ते की बात करें तो अमेरिका, यूरोपियन यूनियन के तमाम देशों, जर्मनी और अन्य देशों के मुकाबले यह बहुत कमजोर है।

उनके रिलेशन बहुत घनिष्ठ हैं। चीन से अगर हम बात कर रहे हैं तो इसका यह मतलब यह नहीं है कि हम उनको कोई कन्सेशन दे रहे हैं। यह नॉर्मल डिप्लोमेसी है। ऐसा कतई नहीं है कि हिंदुस्तान के डिसीजन मेकर्स को यह मालूम नहीं है कि चीन किस किस्म का देश है। हमारा पूरा अनुभव रहा है उनके साथ।

चीनी उत्पादों का बायकॉट कितना संभव?: इस सवाल के जवाब में सिबल कहते हैं कि चीनी उत्पादों का बायकॉट कुछ हद तक संभव है। वह धूपबत्ती से लेकर हमारी मूर्तियां तक बेचता है। छोटे से लेकर बड़े इलेक्ट्रॉनिक आइटम्स यहां एक्सपोर्ट करता है। चीन ने हमारी छोटी-छोटी मैन्युफैक्चरिंग यूनिट्स को डंपिंग के जरिये डिस्ट्रॉय कर दिया है।

वह बड़े पैमाने पर सामान प्रोड्यूस करता है और बड़े-बड़े कॉन्ट्रैक्ट में अपना प्रॉफिट पूरा कर लेता है। एक्स्ट्रा माल जीरो प्रॉफिट पर यहां भेजते हैं। हमारे बिजनेसमैन और ट्रेडर्स को वहां से आर्डर प्लेस करना बंद करना चाहिए। माइंड चेंज करना चाहिए। खासकर क्रिटिकल आइटम्स से इसकी शुरुआत करनी चाहिए और कोशिश हो कि हम इसको लोकली प्रोड्यूस करें।

नेपाल से क्यों आई रिश्ते में दरार? कंवल सिबल कहते हैं कि पड़ोसी देशों में पाकिस्तान को छोड़ दें तो नेपाल सबसे अनरिलायबल देश रहा है। 1961 से ही भारत को तंग कर रहे हैं। हम कह सकते हैं कि ‘रोटी बेटी का रिश्ता है’ लेकिन मौजूदा सरकार की भारत के साथ कोई हमदर्दी नहीं है। हर रास्ता ढूंढते रहते हैं भारत को तंग करने का और चीन को नेपाल में लाने का। अब जो इन्होंने किया है वह बिल्कुल अस्वीकार्य है। अब निगोसिएशन का कोई स्पेस ही नहीं छोड़ा है। नेपाल की पोजीशन बिल्कुल वीक है, उन्हें यह समझना होगा।

Next Stories
1 India China Faceoff: 2014 के फॉर्म्युले से लद्दाख में तनाव खत्म करने की तैयारी में हैं भारत-चीन? जानें- तब क्या हुआ था
2 कोरोना संकट के बीच रुपया 75 पार, लगातार 18वें दिन तेल के दामों में बढ़ोतरी, दिल्ली में डीजल की कीमत पेट्रोल से भी महंगी
3 Patanjali CEO बोले, लाइसेंस के लिए नहीं किया कुछ गलत, प्रचार भी नहीं कराया; हमने तो दवा के प्रभाव बताए हैं
ये पढ़ा क्या?
X