वैश्विक स्तर पर ऊर्जा संकट को ध्यान में रखते हुए सड़कों पर दौड़ने वाले वाहनों के बाद विमानों में भी टिकाऊ हवाई ईंधन (सैफ) के इस्तेमाल की कवायद तेज हो गई है। इससे ईंधन आयात के लिए दूसरे देशों पर निर्भरता कम होने के साथ ही कार्बन उत्सर्जन में सालाना टनों की कमी आएगी जो पर्यावरण के लिहाज से फायदेमंद है। किसानों की आय में भी इजाफा होगा क्योंकि मिश्रित ईंधन के लिए जरूरी इथनाल की मांग बढ़ेगी, जिसे पूरा करने के लिए उत्पादन में बढ़ोतरी का किसानों को फायदा मिल सकता है।

देश में दोपहिया और चार पहिया वाहनों के लिए एथनाल मिश्रित पेट्रोल की बिक्री शुरू होने के बाद एथनाल की मात्रा में धीरे धीरे बढ़ोतरी के बाद ई 85 ईंधन की बिक्री शुरू हो गई है। फ्लैक्स वाहनों को इस तरह बनाया गया है, जिसमें सौ फीसद पेट्रोल या शत-प्रतिशत इथेनाल का इस्तेमाल किया जा सकता है। वाहनों की तर्ज पर विमानों के लिए टिकाऊ विमान ईंधन (सैफ) के उत्पादन के लिए इथेनाल को मिश्रित किया जाएगा।

यूरोपीय देशों में बाद भारत में भी टिकाऊ विमान ईंधन ‘सैफ’ का 2027 से इस्तेमाल शुरू करने की योजना है। चिंतन रिसर्च फाउंडेशन के डा देबोजीत पालित के मुताबिक, इंटरनेटशनल सिविल एविएशन आर्गनाइजेशन (आइसीएओ) ने कहा, एटीएफ चूंकि जीवाश्म ईंधन है, इसलिए अंतरराष्ट्रीय मानकों के मुताबिक विमान ईंधन में सम्मिश्रण जरूरी है। शुरुआत में अंतरराष्ट्रीय उड़ानों के लिए एक एक फीसद इथेनाल का सम्मिश्रण किया जाएगा। इसे बढ़ाकर 2030 तक छह फीसद करने का लक्ष्य है।

विमान ईंधन के सम्मिश्रण, घरेलू के साथ-साथ अंतरराष्ट्रीय उड़ानों के लिए फायदेमंद होगा। इससे कार्बन उत्सर्जन में कमी, जीवाश्म ईंधन पर धीरे धीरे निर्भरता भी कम होगी। अंतरराष्ट्रीय मानकों के मुताबिक जैसे जैसे सम्मिश्रण में इथेनाल की मात्रा में बढ़ोतरी होगी, ऊर्जा क्षेत्र में दूसरे देशों पर निर्भरता कम होगी। इसके साथ ही ईंधन का बेहतरीन विकल्प भी सामने आएगा जो लंबे समय तक टिकाऊ और फायदेमंद हो सकता है। इसके लिए इथेनाल उत्पादन के स्रोतों को बढ़ाने के साथ ही गुणवत्ता पर अधिक ध्यान देना होगा। डा पालित के मुताबिक, फ्लेक्स वाहनों में जरूरत के मुताबिक इथेनाल का इस्तेमाल किया जा सकता है। ऐसे वाहनों के लिए अलग प्रौद्योगिकी का इस्तेमाल किया जाता है जो ईंधन में पेट्रोल, इथेनाल की मात्रा की सेंसर से पहचान कर, खुद ही सामंजस्य बनाने में सक्षम है।

ऊर्जा संकट को देखते हुए इस दिशा में पहल तेज कर दी गई है। चूंकि इथेनाल के उत्पादन के लिए गन्ना, जौ सहित अन्य फसलों का इस्तेमाल किया जाता है, इसलिए उत्पादन में बढ़ोतरी से किसानों को भी फायदा होगा। किसी भी वाहन या विमानों से होने वाले कार्बन उत्सर्जन में कमी से प्रदूषण कम होगा जो पर्यावरण के लिहाज से भी फायदेमंद होगा। इथेनाल सम्मिश्रित ईंधन, पेट्रोल की तुलना में किफायती भी है, इसलिए ऊर्जा सुरक्षा के साथ साथ कई और फायदे भी हैं।

सड़कों पर दौड़ने वाले वाहनों के बाद विमानों में भी टिकाऊ हवाई ईंधन (सैफ) के इस्तेमाल की कवायद तेज हो गई है। इससे ईंधन आयात के लिए दूसरे देशों पर निर्भरता कम होने के साथ ही कार्बन उत्सर्जन में सालाना टनों की कमी आएगी जो पर्यावरण के लिहाज से फायदेमंद है।

डा पालित के मुताबिक इसके लिए जैव ईंधन के उत्पादन में बढ़ोतरी करने की जरूरत होगी। लेकिन यह भी ध्यान रखना होगा कि इथेनाल का उत्पादन बढ़ाने के साथ साथ यह भी जरूरी है कि कृषि अवशेष या ऐसे कृषि उत्पादों का चयन करें जो इथेनाल के उत्पादन बढ़ाने के साथ साथ पानी की बचत करने में भी सक्षम है। कृषि अवशेषों से इथेनाल के वाणिज्यिक उत्पादन को बढ़ावा के लिए सभी पहलुओं का पूर्व आकलन किया जाना चाहिए। इंटरनेशनल एअर ट्रांसपोर्ट एसोसिएशन (आइटा) ने अनुमान जारी किए हैं कि 2026 में वैश्विक स्तर पर (सैफ) का उत्पादन करीब 24 लाख टन तक पहुंचने की उम्मीद है। जो एविएशन फ्यूल के इस्तेमाल का महज 0.8 फीसद है। इसपर एअरलाइंस को 4.3 अरब अमेरिकी डालर का खर्च आएगा।