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तख्त हाल और मिसाल

सर्वोच्च पद पर होना और अपने जीवन और आचरण में भी सर्वोच्च आंका जाना दो जुदा बातें हैं। लोकतांत्रिक ढांचे में सर्वोच्च पदों की तो खासियत ही यह है कि इन पदों पर कोई भी आसीन हो सकता है। लोकतंत्र की इस देन ने हर जगह प्रेरक सुलेख लिखे हैं।

Prime Ministerब्रिटिश प्रधानमंत्री बोरिस जॉनसन। फाइल फोटो।

सर्वोच्च पद पर होना किसी भी लोकतांत्रिक या संवैधानिक व्यवस्था में बड़ी उपलब्धि है। पर इस पद पर पहुंच कर ही जीवन की सार्थकता और सर्वोच्चता नहीं हासिल हो जाती। हाल में कुछ अपुष्ट हवालों से खबर आई कि ब्रिटेन के प्रधानमंत्री बोरिस जॉनसन अपना पद छोड़ सकते हैं। खैर, जॉनसन ने तो अपना पद नहीं छोड़ा पर इस बहाने दुनिया भर में किसी भी व्यवस्था के सर्वोच्च पद पर आसीन लोगों के जीवन और कार्यों को लेकर नया विमर्श जरूर शुरू हो गया। इसी विमर्श को भारतीय संदर्भ में आगे बढ़ा रहे हैं सुशील कुमार सिंह।

सर्वोच्च पद तक पहुंचना बड़ी बात है। पर बात यहीं खत्म नहीं होती। सर्वोच्च पद पर होना और अपने जीवन और आचरण में भी सर्वोच्च आंका जाना दो जुदा बातें हैं। बात करें लोकतांत्रिक ढांचे में सर्वोच्च पदों की तो इसकी तो खासियत ही यह है कि इन पदों पर कोई भी आसीन हो सकता है। लोकतंत्र की इस देन ने हर जगह प्रेरक सुलेख लिखे हैं।

फिर चाहे उत्तरी गोलार्द्ध में रचे-बसे यूरोप के देश हों या अमेरिका या फिर दक्षिणी गोलार्द्ध के एशियाई देश समेत अफ्रीकी व लैटिन अमेरिकी मुल्क ही क्यों न हों। हर जगह शासन और समाज के बीच से जीवन और आदर्श की नई ऊंचाई को छूने वाले नायक आपको मिल जाएंगे।

हतप्रभ करने वाली खबर

कोरोना कालखंड एक अच्छा खासा वक्तले चुका है। दुनिया सेहत की समस्या के साथ खराब अर्थव्यवस्था के दौर से भी गुजर रही है। परोपकार, लोक कल्याण और जन भावना से प्रेरित कई काज भी इन दिनों बढ़त लिए हुए हैं। पर इनकी सीमाएं भी हैं। सीमाएं तो उन सत्ताधारियों की भी हैं जिन्हें सर्वोच्च होने का एहसास है।

जापान में शिंजो आबे ने खराब स्वास्थ के कारण प्रधानमंत्री के पद पर बने रहना सही नहीं समझा। सौंपे गए सर्वोच्च दायित्व का बेहतर निर्वहन न कर पाने की स्थिति में उन्होंने इस्तीफा देना ठीक समझा। वहीं एक खबर यह भी आई कि ब्रिटेन के मौजूदा प्रधानमंत्री बोरिस जॉनसन अपना पद छोड़ने का मन बना रहे हैं। वैसे खुद जॉनसन की तरफ से इस खबर की पुष्टि नहीं हुई। पर विभिन्न जानकारियों और सू्त्रों के हवाले से इस खबर को लेकर चर्चा खूब हुई।

बताया गया कि ब्रितानी प्रधानमंत्री अपने पद से हटने का मन इसलिए बना रहे हैं क्योंकि उन्हें लगता है कि जो वेतन उन्हें प्रधानमंत्री के तौर पर मिलता है उससे उनके परिवार का गुजारा नहीं हो पाता है। दुविधा और सुविधा का साझा आकलन करें तो एक व्यक्ति को इतने बड़े पद पर होने के बावजूद आर्थिक चुनौतियों से जूझना पड़ रहा है।

साफ है कि प्रधानमंत्री का पद वह कर्तव्य है जो अभिलाषा, महत्वाकांक्षा और बरसों की इच्छा की पूर्ति से परे है। इतना ही नहीं, यह लोकतंत्र में एक जन सेवक के रूप में अवधि विशेष के लिए मिला उत्तरदायित्व है, जिसे ईमानदारी और समर्पण से निभा कर दूसरों के लिए छोड़ देना है।

तार्किक और आर्थिक सोच

खबरों में तो ऐसी कोई फिलहाल सुगबुगाहट नहीं है पर आने वाले दिनों में यदि ब्रिटिश प्रधानमंत्री जॉनसन वाकई अपने पद से हटते हैं तो यह कई लोगों के लिए कौतुहल का ही विषय होगा कि परिवार का भरण-पोषण जैसा मसला क्या इतना बड़ा हो सकता है कि एक व्यक्ति देश के सर्वोच्च पद को छोड़ दे, अपने राजनीतिक भविष्य को दांव पर लगा दे।

यह कौतुहल भारत जैसे देश में और बड़ा होगा जहां सांसद, विधायक और मंत्री जैसे पद पर पहुंचना एक व्यक्ति के पूरे परिवार के लंबे सुखद भविष्य की गारंटी है। प्रधानमंत्री के तौर पर जॉनसन एक साल में 1 करोड़ 44 लाख रुपए वेतन पाते हैं। पड़ताल बताती है कि कम वेतन का दर्द उनका नाजायज नहीं है।

प्रधानमंत्री से पहले उनकी यही कमाई एक स्तंभकार के तौर पर लगभग दोगुनी थी। ‘डेली मिरर’ में कॉलम लिखने के लिए उन्हें 22 लाख रुपए महीने मिलते थे। इसके अलावा महीने में मात्र व्याख्यान के लिए उनकी डेढ़ करोड़ की कमाई अलग से होती थी। वैसे बोरिस जॉनसन की ही कमाई नहीं ब्रिटेन के कई पूर्व प्रधानमंत्रियों और अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपतियों की कमाई भी आसमान छूती है।

कहां से होती है कमाई

आंकड़े यह भी बता रहे हैं कि ब्रिटेन में अधिकतर प्रधानमंत्रियों की कमाई पद से हटने के बाद औसतन अधिक रहती है और इसका मुख्य कारण व्याख्यान के लिए उनको बुलावा है या परमार्शदाता के रूप में उनकी विभिन्न सेवाएं हैं।

जॉनसन से पहले प्रधानमंत्री थेरेसा हुआ करती थीं। उनकी एक साल की कमाई इन दिनों साढ़े आठ करोड़ रुपए से अधिक है। मुमकिन है कि जॉनसन को लगता हो कि पद छोड़ने के बाद कम से कम दोगुना तो वे कमा ही सकते हैं। ब्रिटेन के पूर्व प्रधानमंत्री डेविड कैमरन तो एक व्याख्यान के लिए ही एक करोड़ रुपए से अधिक        वसूलते हैं।

इसी श्रेणी में एक दशक पहले ब्रिटेन के ही प्रधानमंत्री रहे टोनी ब्लेयर ने व्याख्यान और परामर्श सेवाएं देकर 210 करोड़ रुपए कमाए हैं। जन सेवकों की पर्याप्त मात्रा में एक कुबेरी कारोबारी की भांति कमाई यह जताती है कि प्रधानमंत्री के तौर पर देश का काम करो और पूर्व प्रधानमंत्री होने पर अपने कौशल का उपयोग कर कमाई करो। पर
भारत में क्या यही बात लागू है?

भारत में मामला बिल्कुल उलट है। यहां नेता पद पर रहते हुए सर्वाधिक कमाई करता है और ऐसा आंकड़ा चुनाव लड़ने के समय चुनाव आयोग के समक्ष जमा कराए गए दस्तावेज में आसानी से देखा जा सकता है। 2019 में दोबारा चुनाव लड़ने वाले अलग-अलग दलों के 200 से अधिक सांसदों की संपत्ति में करोड़ों का अंतर देखने को मिला था। मौजूदा समय में राज्यसभा के 203 सांसद करोड़पति हैं और लोकसभा में 543 के मुकाबले 475 करोड़पति हैं।

लीक और सीख

यदि समाज शिक्षित और कौशल से भरा हो तो कमाई के स्थान पर कमाई और जन सेवा के स्थान पर जन सेवा का रास्ता आसानी से पकड़ा जा सकता है। लेकिन यह तभी संभव है जब राजनीतिक और सामाजिक मूल्य स्फीति के शिकार न हों।

दो बार अमेरिका के राष्ट्रपति रहे बराक ओबामा ने 2016 में पद से हटने के बाद व्याख्यान पर अपना ध्यान केंद्रित किया। इन दिनों नेटफ्लिक्स के लिए फिल्मों के निर्माण में वे दिलचस्पी ले रहे हैं। अमेरिका में पद से हटने के बाद राष्ट्रपति जैसी शख्सियतें आमतौर पर काफी व्यस्त हो जाती हैं और यह जानना-समझना रोचक हो जाता है कि आखिर वे करते क्या हैं।

हमारे देश में एक नौकरशाह 60 बरस में सेवानिवृत्त हो जाता है। यह देश का एक पढ़ा-लिखा और मजबूत तबका है मगर अपने अनुभवों से देश को वह कितना लाभ देता है इसके आंकड़े बहुत आशा से भरे नहीं हैं। जबकि अमेरिका जैसे देशों में बड़े पद पर रहने के बावजूद काम करना मानो एक ‘शगल’ है। अमेरिका में जब कोई राष्ट्रपति वाइट हाउस से विदाई लेता है तो उसे मोटी पेंशन मिलती है। यही नहीं, जीवन भर के लिए कई प्रकार के लाभ भी मिलते हैं।

किताबों और भाषणों से भी इनकी कमाई ठीक-ठाक हो जाती है। पूर्व राष्ट्रपति बिल क्लिंटन की आत्मकथा ‘माई लाइफ’ हो या जॉर्ज बुश की किताब ‘डिसीजन प्वांइट’, सभी ने अपने लेखक को अकूत आमदनी कराई है। और पीछे चलें तो रिचर्ड निक्सन जिन्हें वॉटरगेट कांड के कारण राष्ट्रपति का पद छोड़ना पड़ा था उन्होंने भी राजनीति पर कई किताबें लिखी। इसके अलावा गेराल्ड फोर्ट सेवानिवृत्ति के बाद गोल्फ और स्कीइंग के साथ बहुराष्ट्रीय कंपनियों में सक्रिय रहे। इसी तर्ज पर रोनाल्ड रीगन की आत्मकथा की धूम रही। व्याख्यान की दुनिया में भी उनकी खूब व्यस्तता रही।

भविष्य का भारत

विकासशील देशों में राजनीति का स्वभाव और चलन विकसित देशों से बिल्कुल अलग है। दोनों तरह के देशों में आर्थिक दरकार और सरोकार के मतलब भी जुदा हैं। साथ ही विकास की जिस वैश्विक समझ को स्वीकार करने के लिए आज हम मजबूर हैं, उसमें जीवन का अर्थ और दर्शन अब किसी तरह का संयम या त्याग नहीं बल्कि सीधे-सीधे भौतिक अर्जन-उपार्जन है।

भारत में राष्ट्रीय आंदोलन का शील काफी ऊंचा रहा पर यह ऊंचाई स्वाधीनता के कुछ ही दशकों बाद ढलान पर आ गई। समाज और राजनीति के कई व्याख्याकार मानते हैं कि भारत जैसे विकासशील देश में राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक परिवर्तन का अभी शक्तिशाली दौर आना बाकी है।

इसे हम इस रूप में भी समझ सकते हैं कि पहली और तीसरी दुनिया के बीच की दीवार अभी कुछ दिन और रहेगी। भारत अभी उस दौर से कुछ दूर है जब हमारे यहां भी नौकरशाही से लेकर राजनीति तक एक ऐसी कार्यशैली देखने को मिले, जिसमें बड़े से बड़े शख्स के मूल्यांकन का आधार उसकी सर्वोच्चता नहीं बल्कि देश और समाज के लिए उपयोगिता होगी।

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