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देश भर के स्कूलों में 8वीं तक हिंदी अनिवार्य करने की तैयारी में सरकार!

NEP के लिए गठित 9 सदस्ययी के कस्तूरीरंगन कमेटी ने कई महत्वपूर्ण बदलाव की बात अपनी रिपोर्ट में कही है। इनमें देश भर के शिक्षण संस्थानों में गणित और विज्ञान विषयों का एक समान सिलेबस लागू करना शामिल है।

Author Updated: January 10, 2019 12:54 PM
केंद्रीय एचआरडी मिनिस्टर प्रकाश जावड़ेकर। (इंडियन एक्सप्रेस फाइल फोटो)

केंद्र सरकार देश भर के स्कूलों के पाठ्यक्रम में बड़े बदलाव की तैयारी में है। द इंडियन एक्सप्रेस के मुताबिक सरकार ‘न्यू एजुकेशन पॉलिसी’ (NEP) के तहत हिंदी समेत तीन भाषाओं को कक्षा 8वीं तक अनिवार्य बनाने की सिफारिश की गई है। NEP के लिए गठित 9 सदस्ययी के कस्तूरीरंगन कमेटी ने कई महत्वपूर्ण बदलाव की बात अपनी रिपोर्ट में कही है। इनमें देश भर के शिक्षण संस्थानों में गणित और विज्ञान विषयों का एक समान सिलेबस लागू करना शामिल है। इसके अलावा आदिवासी भाषाओं का देवनागरी लिपी में लिखने-पढ़ने और हुनर के आधार पर शिक्षा को विकसित करने की सिफारिश की गई है। सूत्रों के मुताबिक इससे संबंधित रिपोर्ट को कमेटी ने मानव संसाधन एवं विकास मंत्रालय (एचआरडी) को पिछले महीने ही सौंप दी थी।

द इंडियन एक्सप्रेस के साथ बातचीत में एचआरडी मंत्री प्रकाश जावड़ेकर ने कहा, “कमेटी की रिपोर्ट तैयार है और सदस्यों ने मुलाकात के लिए समय मांगा है। मैं संसद सत्र पूरा होने के बाद रिपोर्ट को देखूंगा।” इस पॉलिसी को लेकर सरकार को अभी आगे भी महत्पूर्ण फैसले करने हैं। जिनमें नई शिक्षा नीति के प्रावधानों को जनता के बीच साझा किया जाएगा और उनका फीडबैक लिया जाएगा। हालांकि, प्रकाश जावड़ेकर ने देश भर में 8वी कक्षा तक हिंदी भाषा को ‘अनिवार्य’ बनाने की बात से इनकार किया है। उन्होंने कहा कि राष्ट्रीय शिक्षा नीति में ऐसा कोई भी प्रावधान नहीं है।

सूत्रों का कहना है, “सामाजिक विज्ञान को लेकर स्थानीय सामग्री का होना आवश्यक है। लेकिन, अलग-अलग राज्यों के बोर्ड में 12वीं तक गणित और विज्ञान के विषयों में अतंर समझ से परे है। गणित और विज्ञान को किसी भी भाषा में पढ़ाया जा सकता है। लेकिन, उनका सिलेबस एक समान होना चाहिए।” द इंडियन एक्सप्रेस के मुताबिक नेशन एजुकेशन पॉलिसी के तहत अवधी, भोजपुरी, मैथली आदि लोकल भाषाओं को भी कक्षा 5वीं तक पाठ्यक्रम में शामिल करने का विचार है।

सूत्रों के मुताबिक, “नई शिक्षा नीति को भारतीय प्रधान बनाने की कोशिश की गई है। इसमें आदिवासी भाषाओं को देवनागरी लिपी में लिखिने-पढ़ने का माध्यम बनाने की भी बात है। क्योंकि, आदिवासी भाषाओं की कोई लिपी नहीं है। अगर कोई लिखित संदर्भ है भी तो वह मिशनरियों के प्रभाव की वजह से रोमन लिपी में है। इसके अलावा तीन भाषाओं के फॉर्मूले के तहत हिंदी को ‘आवश्यक रूप’ से देश के सभी स्कूल में कक्षा 8वीं तक अनिवार्य बनाने की बात है। फिलहाल, तमिलनाडु, कर्नाटक, तेलंगाना, आंध्र प्रेदश, गोवा, पश्चिम बंगाल और असम सरीखे गैर-हिंदी भाषी राज्यों में हिंदी अनिवार्य विषय नहीं है।

सूत्रों का कहना है कि प्रस्तावित नई शिक्षा नीति की चर्चा आरएसएस से संबंधित संस्था शिक्षा समूह के साथ भी 20 दिसंबर, 2018 को की गई। पिछले साल अक्टूबर में अपनी नीति को स्पष्ट करते हुए आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत ने विजयदशमी के दिन कहा था, “नई शिक्षा नीति को लागू करने का वक्त बीतता जा रहा है।” मार्च 2015 में आरएसएस की अखिल भारतीय प्रतिनिधि सभा (ABPS) ने एक रिजॉल्यूशन पारित करके मातृ भाषाओं में प्राथमिक शिक्षा लागू करने के लिए कहा था। गौरतलब है कि नई शिक्षा नीति(NEP) 1986 में लाई गई थी।

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