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हिन्दी दिवस 2018: …जब ह‍िन्‍दी बोली अपने मन की बात

Hindi Diwas 2018, हिंदी दिवस 2018: सात समंदर पार से निगोड़ी अंग्रेजी आई, मेरी 'सौतन' बन गई। मेरा वैभव, मेरे नखरे, मेरा श्रृंगार सब छीन लिया। सालों घोर निराशा में रही। मेरे बच्चे को नौकरी नहीं मिलती, क्योंकि वे अंग्रेजी नहीं जानते।

Author September 14, 2018 3:25 PM
आज 14 सितंबर है। हिन्दी का दिन। हिन्दी दिवस। आज ही के दिन हिन्दी को संवैधानिक रूप से भारत की आधिकारिक भाषा का दर्जा मिला था।

मैं हिन्दी हूं। संस्कृत की बड़ी बेटी। भाषा की दुलारी। भरा-पूरा कुनबा है मेरा। मेरी बहनें तो पूछो मत। एक से बढ़कर एक। बड़ी तेवर वाली। तुरंत तुनक जाती हैं। तमिल, तेलुगु, मलयालम, पंजाबी…कितने के नाम गिनाऊं। पड़ोसन उर्दू से मेरी खूब छनी। उसकी मिठास तो मेरे अंदर मिसरी घोल देती। सबसे रोटी-बेटी का नाता है मेरा। देश के अलग-अलग कोने में बसी हैं मेरी बहनें। अपने संस्कार, अपनी पहचान लिये। जब देश आजाद हुआ, तो मुझे राजभाषा का दर्जा दे दिया गया। मेरी बहनें काफी नाराज हुईं, लेकिन उनके बिना मेरा वजूद है भला! उन्हें नहीं पता, वो कैसे मेरे रग-रग में शब्द बनकर दौड़ती हैं। जितने रंग भारत के हैं, उतने ही रंग मेरी, यानी हिन्दी के हैं। मैं कभी नहीं चाहती क‍ि अपनी बहनों के बीच बड़ी कहलाऊं। लेकिन ये जो कमबख्त राजनीति है ना, मेरे घर में आग लगाने से बाज नहीं आती। मेरे भी कुछ उद्दंड बच्चे हैं। कभी असम, तो कभी दक्षिण में रहने वाली मेरी बहन को चिढ़ाते रहते हैं। मैं साफ कह देती हूं, अपनी बहनों के साथ ऐसा बर्ताव मेरा संस्कार नहीं है। मौसी को सताओगे और मेरे बच्चे कहलाओगे! कभी नहीं हो सकता है।

सात समंदर पार से निगोड़ी अंग्रेजी आई, मेरी ‘सौतन’ बन गई। मेरा वैभव, मेरे नखरे, मेरा श्रृंगार सब छीन लिया। सालों घोर निराशा में रही। मेरे बच्चे को नौकरी नहीं मिलती, क्योंकि वे अंग्रेजी नहीं जानते। खैर मैं भी कहां हार मानने वाली थी। तन के खड़ी हो गई। आमने-सामने। सालों गुजरे, अंग्रेजी अपने ही तैश में रही। 1990 में दुनिया सिमटने लगी थी। जिधर देखो अंग्रेजी अपने जलवे दिखाती फिरती। मैं मन मसोस कर देखती रही। मेरी बहनें भी अंग्रेजी के साथ हो चलींं। क्या करें, सियासत है ही ऐसी। मैंने सब्र किया। पानी की धार देखी, अंग्रेजी की रफ्तार देखी। इस दौरान सिवा दुनिया देखने के अलावा मेरे पास कोई चारा नहीं था। वक्त गुजरा। हिन्दी पट्टी के लोग विदेश गए। बड़ा यश और धन कमाया। वहां वो जब भी मिलते, अपनी ही जुबान में बात करते। इस बीच सबने अंग्रेजी को काबू किया, उसके पर कतरे। ऐसी अंग्रेजी बोलते क‍ि विलायती बाबू भी चकराते! सच कहूं ऐसा देख मेरी आंखेंं भर जातींं। धीरे-धीरे मुझे लेकर उनके अंदर समाया कमतरी का एहसास जाता रहा। देश ने करवट बदला तो पैसे आने लगे।  गंगा-यमुना के किनारे रहने वाले लोगों ने खूब तरक्की की।

हिन्दुस्तान में बिजनेस करने आईं कंपनियों को लगा कि इस विशाल समूह के पास जाना है तो हिन्दी ही माध्यम बन सकती है। इस बीच मेरी जुबान में बनी फिल्मों ने मेरी प्रतिष्ठा वापस लाने में गजब का काम किया। दुनिया में लोग हिन्दी फिल्में देखते और हिन्दी से निकली कोमल भावनाओं को संंजोने लगे। अब मेरे अंदर आत्मविश्वास है। अब मुझे अंग्रेजी का डर नहीं। इधर अंग्रेजी ने मेरे कई शब्दों को अपने स‍िर-आंखों पर बिठाया है। अब कोई बैर नहीं। मैं अपनी बहनों से कहना चाहती हूं- तुम ये ना सोचना क‍ि मेरा विस्तार तुम्हारे अधिकार पर डाका है। बहन तुम मेरी बिंदिया हो। तुम्‍हारा खिलखिलाता चेहरा मुझमें बिजली सी स्फूर्ति भर देता है।

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