असम समेत 5 राज्यों के विधानसभा चुनाव का बिगुल बज चुका है। असम में एक ही चरण में सभी सीटों पर 9 अप्रैल को वोटिंग होगी। सत्तारूढ़ भाजपा और मुख्य विपक्षी कांग्रेस को अपनी-अपनी ताकत पर भरोसा है, वहीं उनके सामने कुछ चुनौतियां भी हैं जिनसे निपटना होगा। एनडीए अपने सरकार के रिकॉर्ड और संगठनात्मक ताकत के भरोसे उतरेगा। हालांकि तीसरी बार सत्ता में वापसी की कोशिश कर रही भाजपा को सत्ता विरोधी लहर और स्थानीय शिकायतों जैसी सामान्य चुनौतियों का सामना करना पड़ेगा।

मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा के नेतृत्व में भाजपा कल्याणकारी योजनाओं और शांति समझौतों पर जोर देते हुए अपनी राजनीतिक पहुंच बढ़ा रही है। हिमंता बिस्वा सरमा की मुखर राजनीतिक शैली और पूरे राज्य में उनकी व्यापक उपस्थिति भी इसकी ताकत में से हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह और अन्य वरिष्ठ भाजपा नेताओं के लगातार दौरों से भी पार्टी को अपनी ‘डबल इंजन सरकार’ की रणनीति को मजबूत करने में मदद मिलने की उम्मीद है।

भाजपा के सामने क्या चुनौतियां?

हालांकि भाजपा के सामने कुछ चुनौतियां भी हैं, जिनमें सत्ता विरोधी लहर खासकर उन निर्वाचन क्षेत्रों में जहां मौजूदा विधायकों के प्रति स्थानीय लोगों में असंतोष है। सरकार के अतिक्रमण रोधी अभियानों और अवैध घुसपैठियों के बारे में बयानबाजी की विपक्ष द्वारा आलोचना किए जाने के बीच पार्टी को अल्पसंख्यक मतदाताओं के कुछ वर्गों, विशेष रूप से बांग्ला भाषी मुसलमानों की नाराजगी का भी सामना करना पड़ सकता है।

वहीं मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस के लिए बीजेपी के खिलाफ सत्ता-विरोधी लहर मददगार साबित हो सकती, लेकिन रास्ते में कई बाधाएं हैं जिनसे निपटने के लिए वह असम जातीय परिषद, मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (सीपीआईएम) और ऑल पार्टी हिल लीडर्स कॉन्फ्रेंस (APHLC) के साथ गठबंधन करके भाजपा का मुकाबला करने की योजना बना रही है। कांग्रेस को अल्पसंख्यक मतदाताओं, विशेषकर बांग्ला भाषी मुसलमानों का समर्थन हासिल हो सकता है।

प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष गौरव गोगोई 2024 में भाजपा द्वारा अपने उम्मीदवार के समर्थन में पूरी मशीनरी लगाए जाने के बावजूद जोरहाट लोकसभा सीट जीतने में सफल रहे और पार्टी द्वारा उन्हें मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार के रूप में फिर से पेश करना और जोरहाट विधानसभा सीट से उम्मीदवार बनाना पार्टी के मनोबल को काफी बढ़ाएगा। मुख्य विपक्षी पार्टी के लिए चुनौतियां भी कम नहीं हैं। कांग्रेस एक दशक से सत्ता से दूर है और उसे कई झटके लगे हैं।

सहयोगी दलों के साथ समन्वय कांग्रेस के लिए चुनौती

मौजूदा मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा कांग्रेस छोड़कर ही भाजपा में शामिल हुए थे। हाल में पार्टी के पूर्व अध्यक्ष भूपेन बोरा और तीन अन्य विधायक भी बीजेपी में शामिल हो गए, जबकि दो अन्य रायजोर दल में शामिल हो गए। विपक्षी दल में एकता का अभाव जमीनी स्तर पर उसे नुकसान पहुंचा सकता है। राज्य विधानसभा चुनाव में सत्तारूढ़ भाजपा और विपक्षी कांग्रेस के गठबंधन सहयोगी दलों की अहम भूमिका रहने की संभावना है।

भाजपा के अलावा राज्य में एनडीए के घटक दलों में असम गण परिषद (विधानसभा में 9 सीट), यूनाइटेड पीपुल्स पार्टी लिबरल (7 सीट) और बोडोलैंड पीपुल्स पार्टी (3 सीट) शामिल हैं। वहीं कांग्रेस के साथ मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (सीपीआईएम), असम जातीय परिषद (AJP) और ऑल पार्टी हिल लीडर्स कॉन्फ्रेंस (APHLC) ने सीटों के बंटवारे पर सहमति जताई है और आगामी चुनाव में ये दल संयुक्त रूप से प्रचार करेंगे। सीपीआईएम का विधानसभा में एक सदस्य है, जबकि AJP और APHLC का कोई सदस्य नहीं है। पिछले विधानसभा चुनाव में ऑल इंडिया यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फंट (AIUDF) ने 16 सीट हासिल कीं और रायजोर दल के अध्यक्ष अखिल गोगोई ने सदन में पार्टी से एकमात्र सीट जीती। हालांकि उन्होंने निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में चुनाव लड़ा था। पढ़ें 5 राज्यों के चुनाव के लिए ये है बीजेपी का प्लान

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चुनाव आयोग ने पांच राज्यों में होने वाले चुनाव की तारीखों का ऐलान कर दिया है। असम, पुडुचेरी, बंगाल, केरल और तमिलनाडु में विधानसभा चुनाव होने वाले हैं। असम, केरल और पुडुचेरी में एक चरण में चुनाव होंगे, जबकि बंगाल में दो चरणों में चुनाव होंगे। 4 मई 2026 को नतीजें आएंगे। चुनाव आयोग ने इस बार वोटिंग के दिन बूथ पर वोटर्स के लिए खास तरीकों की सुविधाओं की घोषणा की है। पढ़ें पूरी खबर