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चौबीस हाई कोर्ट में 443 न्यायाधीशों की कमी

हाई कोर्टों में न्यायाधीशों के पदों पर रिक्तियां बढ़ती जा रही हैं। तीन महीने पहले कॉलेजियम प्रणाली की वापसी होने के बाद भी इन पदों के लिए नए नामों की सिफारिश की जानी बाकी है

Author नई दिल्ली | January 18, 2016 11:47 PM
उच्चतम न्यायालय (सुप्रीम कोर्ट)

हाई कोर्टों में न्यायाधीशों के पदों पर रिक्तियां बढ़ती जा रही हैं। तीन महीने पहले कॉलेजियम प्रणाली की वापसी होने के बाद भी इन पदों के लिए नए नामों की सिफारिश की जानी बाकी है, जिनमें मुख्य न्यायाधीश के आठ पद भी शामिल हैं। कानून मंत्रालय द्वारा जुटाए गए नए आंकड़ों के मुताबिक 24 हाई कोर्टों में 1,044 न्यायाधीशों के मंजूर पदों में 443 रिक्तियां हैं। दूसरे शब्दों में हाई कोर्ट एक जनवरी की तारीख तक 610 न्यायाधीशों के साथ काम कर रहे थे। इलाहाबाद हाई कोर्ट में न्यायाधीशों के 86 पद रिक्त हैं जो किसी हाई कोर्ट में अधिकतम रिक्तियां हैं। इसके बाद मद्रास हाई कोर्ट का स्थान है जहां 38 रिक्तियां हैं। मद्रास हाई कोर्ट में मंजूर पदों की संख्या 60 से बढ़ाकर 75 कर दी गई है जो 21 दिसंबर 2015 से प्रभावी है।

बंबई और पंजाब व हरियाणा हाई कोर्टों में 35-35 रिक्तियां हैं। हालांकि त्रिपुरा हाई कोर्ट में कोई रिक्ति नहीं है जबकि मेघालय हाई कोर्ट में एक रिक्ति है जबकि उसकी क्षमता चार न्यायाधीशों की है। सिक्किम हाई कोर्ट में तीन न्यायाधीशों की मंजूर क्षमता है जिसमें एक न्यायाधीश की कमी है। सुप्रीम कोर्ट में मंजूर क्षमता 31 न्यायाधीशों की है जिनमें पांच न्यायाधीशों के पद रिक्त हैं। गौरतलब है कि पिछले साल 13 अप्रैल और 16 अक्तूबर के बीच सुप्रीम कोर्ट व हाई कोर्टों में नियुक्ति पर कोई प्रणाली नहीं थी। राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग अधिनियम और एक संवैधानिक संशोधन अधिनियम को 13 अप्रैल को अधिसूचित किया गया था लेकिन शीर्ष न्यायालय ने 16 अक्तूबर को इसे असंवैधानिक घोषित कर दिया।

राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग कानून शीर्ष न्यायालय द्वारा रद्द किए जाने के बाद कॉलेजियम प्रणाली के अस्पष्ट होने की शिकायतों के बीच इसकी समीक्षा करने का फैसला किया गया। चूंकि कॉलेजियम प्रणाली वापस आ गई, इसलिए शीर्ष न्यायालय कॉलेजियम ने संकेत दिया कि नई कार्यप्रणाली (एमओपी) को अंतिम रूप दिए जाने तक कोई नई नियुक्ति की सिफारिश नहीं की जाएगी। यह दस्तावेज न्यायाधीशों की नियुक्ति को दिशानिर्देशित करने के लिए है।

सरकार इसे अंतिम रूप दे रही है जिसे देश के प्रधान न्यायाधीश की अध्यक्षता वाली शीर्ष न्यायालय का कॉलेजियम मंजूरी देगा। दो एमओपी हैं। एक तो देश के प्रधान न्यायाधीश और सुप्रीम कोर्ट के अन्य न्यायाधीशों के लिए है जबकि दूसरा हाई कोर्टों के मुख्य न्यायाधीश और अन्य न्यायाधीशों के लिए। चूंकि कॉलेजियम ने किसी नए नाम की सिफारिश नहीं की, इसलिए आंध्र प्रदेश (तेलंगाना), कर्नाटक, बंबई, गुवाहाटी, गुजरात, पटना, पंजाब व हरियाणा और राजस्थान के हाई कोर्ट कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीशों के सहारे काम कर रहे हैं।

इस बीच, इस महीने चार हाई कोर्टों के 29 न्यायाधीशों को सेवा विस्तार दिया गया। आमतौर पर अतिरिक्त न्यायाधीश दो साल के लिए नियुक्त किए जाते हैं और बाद में उन्हें स्थानीय न्यायाधीश के पद पर पदोन्नत किया जाता है। सुप्रीम कोर्ट ने पिछले साल 16 अक्तूबर को एक ऐतिहासिक फैसले के तहत एनजेएसी अधिनियम को रद्द कर दिया था जिसे दो दशक से अधिक पुराने कॉलेजियम प्रणाली की जगह लाया गया था। यह उच्च न्यायापालिका में न्यायाधीशों की नियुक्ति करती है।
फैसले के तहत कॉलेजियम प्रणाली को जारी रहने में सक्षम बना दिया और इसने एनजीएसी को अमल में लाने वाले संविधान के 99 वें संशोधन को असंवैधानिक करार दिया था।

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